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जानिए कैसे गढ़वाली गीतों से पहाड़ के कल्चर को किया जा रहा है प्रोटेक्ट

जानिए कैसे गढ़वाली गीतों से पहाड़ के कल्चर को किया जा रहा है प्रोटेक्ट

यहां पर्यटक स्थलों और मठ-मंदिरों में गढ़वाली जय मां उफराई, पंछी परदेशी, सिल्की टनाटन एलबमों की शूटिंग की जा रही है.

यहां पर्यटक स्थलों और मठ-मंदिरों में गढ़वाली जय मां उफराई, पंछी परदेशी, सिल्की टनाटन एलबमों की शूटिंग की जा रही है.

यहां पर्यटक स्थलों और मठ-मंदिरों में गढ़वाली जय मां उफराई, पंछी परदेशी, सिल्की टनाटन एलबमों की शूटिंग की जा रही है.

    यहां पर्यटक स्थलों और मठ-मंदिरों में गढ़वाली जय मां उफराई, पंछी परदेशी, सिल्की टनाटन एलबमों की शूटिंग की जा रही है.

    शूटिंग देखने के लिये स्थानीय लोग काफी तादाद में उमड़ रहे हैं. इन एलबमों के जरिए विलुप्त हो रही पहाड़ की संस्कृति के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है. एलबमों में पहाड़ के थडिया जागर, लोकगीत, भजन, चाछड़ी आदि शामिल हैं.

    एलबमों की शूटिंग जिला मुख्यालय के संगम, तूना, मठियाणाखाल, बौंठा, तिलणी के साथ ही कर्णप्रयाग, बालपाटा बुग्याल, घाट, रूपकुंड सहित अन्य क्षेत्रों में की जा रही है. उक्त एलबमों में स्वर लन्नू परदेशी, दिगम्बर बिष्ट, मंजू पाण्डेय, मीना राणा और हरीश रावत ने दिया है. जबकि गीतकार दीवान सिंह रावत हैं.

    गीतकार दीवान सिंह ने बताया कि पहाड़ की संस्कृति धीरे-धीरे समाप्त हो रही है. युवा पीढ़ी पहाड़ की पौराणिक संस्कृति और रीति-रिवाजों को पीछे छोड़ रही है. गीतों के माध्यम से संस्कृति को बचाने का प्रयास किया जा रहा है.

    उन्होंने बताया कि सभी एलबमों के गीतों की शूटिंग भी पहाड़ के पर्यटक और धार्मिक स्थलों में की जा रही है.

    Tags: Shooting, Uttarakhand news

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