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खुद मज़दूरी कर जुटाते थे किताबें, आज गरीब बच्चों के लिए चलाते हैं शिक्षण केंद्र

Rajesh Dobriyal | News18 Uttarakhand
Updated: January 21, 2019, 7:06 PM IST

चंदानी ने खुद मज़दूरी कर, किताबें उधार मांग कर पढ़ाई की और आज उत्तराखंड से पलायन रोकने के लिए बने पलायन आयोग में शोध अधिकारी हैं.

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रुद्रप्रयाग के रहने वाले जीबी चंदानी का बचपन बेहद गरीबी में बीता है. 9 लोगों के परिवार में तो कभी-कभी खाने तक के लाले पड़ जाते थे. उन्हें पढ़ाने का खर्च उठाने के लिए माता-पिता को कई बार सोचना पड़ा था. चंदानी ने खुद मज़दूरी कर, किताबें उधार मांग कर पढ़ाई की और आज उत्तराखंड से पलायन रोकने के लिए बने पलायन आयोग में शोध अधिकारी हैं. इसके साथ ही वह गरीब बच्चों के लिए एक शिक्षण केंद्र चलाते हैं जहां योग्य अध्यापक इन बच्चों को पढ़ाते हैं ताकि उनकी पढ़ाई न छूटे और वह अच्छी नौकरी पा सकें.

जीबी चंदानी यानि गजपाल भूषण चंदानी की कहानी, पढ़िए उन्हीं की ज़ुबानी..

मेरा नाम गजपाल भूषण चन्दानी है मैं ग्राम व पोस्ट तिलवाड़ा, जनपद रूद्रप्रयाग, उत्तराखंड का रहने वाला हूँ. मैं अपने स्तर से गांव में जी.बी.सी. शिक्षण केन्द्र चलाता हूं, जहां गरीब परिवार के बच्चों को अनुभवी अध्यापकों की देख-रेख में निशुल्क पढ़ाया जाता है.

यहां पर बच्चों से समूह (ग) परीक्षा हेतु तैयारी करवाई जाती है जिससे उनका परिवार गरीबी रेखा से ऊपर उठ सके और वह गांव के अन्य गरीबों की मदद कर सकें. सेन्टर पर छात्रों के सुविधा के लिए बायोमैट्रिक अटेंडेंस, शौचालय, बैठने की उचित व्यवस्थाओं सहित हर स्तर की पुस्तकें उपलब्ध हैं, जिन्हें वे अपने निर्धारित समय से पढ़ सकते हैं.

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जीबीसी में पढ़ते बच्चे


अभी तक सेन्टर से कई बच्चे समूह (ग) की परीक्षाओं में निकले हैं. इनमें अम्बिका, शालिनी पंवार, अमित कण्डारी, मोहित, दीपक शामिल हैं.

शुरुआत में मेरी धर्मपत्नी भुवनेश्वरी चन्दानी इसके लिए तैयार नहीं थी और इसे पैसे और समय की बर्बादी मानती थीं. लेकिन मेरे लगातार लगे रहने पर वह भी प्रेरित हुईं और आज खुद मेरे इस कार्य में सहयोग करती हैं क्योंकि वो स्वयं भी शिक्षिका के पद पर डायट में कार्यरत हैं.
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जीबी चंदानी की पत्नी भुवनेश्वरी चन्दानी भी अब जीबीसी शिक्षण केंद्र में मदद करती हैं.


आज भी वो वक्त मुझे अच्छी तरह याद है जब मेरे माता पिता को मुझे पढ़ाने के लिए कई बार सोचना पड़ता था क्योंकि मेरे परिवार में कुल 9 जन थे. साथ ही इतनी गरीबी कि दो वक्त की रोटी जुटा पाना भी बहुत मुश्किल था. मेरे पिता बड़ी मुश्किल से मेरे दो भाइयों को पढ़ा पा रहे थे. आखिरकार मेरे पिता ने मुझे पढ़ने के लिए भेज ही दिया. जब किताबों के लिए पैसे नहीं होते थे तो मैं स्वयं भी मजदूरी कर अपने लिए किताबें खरीद लेता था.

जैसे-जैसे मैं ऊंची कक्षा में जाता रहा किताबें बढ़ती गईं और पिता के लिए उन्हें खरीदना भी मुश्किल होता रहा. कई बार तो मैं बिना किताबों के ही क्लास में चला जाता. अध्यापक किताबों के बारे में पूछते तो मैं अपनी मजबूरी बता देता और कई बार अध्यापक मुझे अपनी स्वयं की किताबें दे देते, जिन्हें मैं पढ़कर वापस कर देता. यह सिलसिला यूं ही चलता रहा और मैंने प्रथम श्रेणी में हाईस्कूल ओर इण्टर की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली.

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जीबीसी में बच्चों के लिए विभिन्न विषयों की किताबें भी उपलब्ध हैं.


आज मै जहाँ भी हूँ उसके लिए मैं अपने माता-पिता को कभी नहीं भूल पाता हूं. लगता है कि मेरे पिता हमेशा मेरे साथ हैं. साथ ही उन गुरुजनों का तहेदिल से आभार प्रकट करता हूँ जिन्होंने मुझे सहयोग किया. इण्टर के बाद शिक्षा विभाग में अध्यापक के रूप में नौकरी शुरू कर दी और फिर आगे की पढ़ाई पूरी की.

अध्यापक के रूप में छह साल की सेवा के बाद मैं ग्राम विकास अधिकारी बन गया और इस पद पर 18 साल काम किया. वर्तमान में उत्तराखंड के ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग में शोध अधिकारी के पद पर काम कर रहा हूं.

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जीबीसी से पढ़ने वाले कई बच्चे सरकारी नौकरियों में निकले हैं.


मैं सभी देशवासियों से अनुरोध करता हूँ कि यदि आपके पास कुछ ऐसी पुस्तकें पड़ी हो जो आपके किसी काम की नहीं हैं तो आप सेन्टर के पते पर भेजने का कष्ट करें. हो सकता है कि किसी गरीब छात्र का भविष्य बन जाए, जिसके लिए मैं और ऐसे छात्र सभी देशवासियों का तहेदिल से धन्यवाद करेंगे.

पता : जी.बी.सी. शिक्षण केन्द्र तिलवाड़ा, ग्राम /पोस्ट तिलवाड़ा, जनपद रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड-246475.

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First published: January 21, 2019, 1:37 PM IST
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