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खराब मौसम के कारण रुद्रपुर नहीं पहुंच सके PM, फोन से किया रैली को संबोधित

खराब मौसम के कारण रुद्रपुर नहीं पहुंच सके PM, फोन से किया रैली को संबोधित

सांकेतिक तस्वीर

पीएम मोदी ने उत्तराखंड की जनता से 2019 के लिए आशीर्वाद मांगा. उन्होंने कहा कि पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी, यहीं के काम आए इसके लिए सरकार काम कर रही है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुवार को उत्तराखंड के दौरे पर थे. प्रधानमंत्री को गुरुवार को ऊधमसिंह नगर के रुद्रपुर में एक रैली को संबोधित करना था. खराब मौसम के चलते वह कालागढ़ से रुद्रपुर के रैली स्‍थल तक नहीं पहुंच पाए. पीएम ने फोन के जरिए रैली को संबोधित किया. रैली में न पहुंच पाने के लिए पीएम मोदी ने रुद्रपुर की जनता से माफी मांगी.

पीएम मोदी ने कहा कि उन्हें कल शाम को ही बताया गया था कि यदि आप सुबह-सुबह उत्तराखंड पहुंच जाएंगे तो ठीक नहीं तो मौसम की खराबी के कारण वहां नहीं पहुंच पाएंगे. इसीलिए मैं सुबह 6 बजे तक उत्तराखंड में आ गया था. जिम कॉर्बेट में एक कार्यक्रम में मुझे भाग लेना था.

पीएम मोदी ने कहा कि हमने किसान क्रेडिट कार्ड को और फायदेमंद बनाया. प्रधानमंत्री ने कहा कि हमने विकास को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया. पीएम मोदी ने कहा कि सहकारी किसान योजनाओं से किसानों को फायदा होगा. इस योजना से हजारों युवाओं को रोजगार मिलेगा. किसान पेंशन योजना से गरीब किसान मजबूत होंगे.

पीएम मोदी ने उत्तराखंड की जनता से 2019 के लिए आशीर्वाद मांगा. उन्होंने कहा कि पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी, यहीं के काम आए इसके लिए सरकार काम कर रही है.

पीएम के संबोधन के दौरान मंच पर केंद्रीय मंत्री थावर चंद्र गहलोत, प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू, केंद्रीय राज्य मंत्री अजय टम्टा, सांसद भगत सिंह कोश्यारी, अरविंद पांडेय, यशपाल आर्य आदि मौजूद रहे.

बताते चलें कि उत्तराखंड दौरे पर पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुवार को खराब मौसम के चलते चार घंटे देहरादून के जौली ग्रांट एयरपोर्ट पर ही फंसे रहे. मौसम साफ होने पर वह लगभग हेलिकॉप्टर से कालागढ़ के लिए रवाना हुए.

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रंग लाई महिलाओं की मेहनत, बंजर जमीन पर उगा दिए रोजमेरी और डेंडिलियन के पौधे

रंग लाई महिलाओं की मेहनत, बंजर जमीन पर उगा दिए रोजमेरी और डेंडिलियन के पौधे

रुद्रप्रयाग के कोट मल्ला गांव को पर्यावरणविद जगत सिंह चौधरी 'जंगली' की वजह से देशभर में पहचान मिली है.

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रुद्रप्रयाग जिले के कोट मल्ला गांव में पर्यावरणविद जगत सिंह जंगली और कृषि विभाग की मदद से महिलाओं की कोशिश रंग लाई है. महिलाओं ने 50 नाली बंजर भूमि पर रोजमेरी और डेंडिलियन के औषधीय पौधों की खेती शुरू कर दी है. इस पहल से उनकी आय का जरिया तलाशा गया है.

कृषि विभाग ने कोट मल्ला में इस कार्य की शुरूआत की है. 10 लाख 97 हजार रुपये की लागत से कृषि एवं मनरेगा के तहत कोट मल्ला में रोजमेरी और डेंडिलियन का पौधारोपण किया गया.

बता दें कि रुद्रप्रयाग के कोट मल्ला गांव को पर्यावरणविद जगत सिंह चौधरी \’जंगली\’ की वजह से देशभर में पहचान मिली है. उन्होंने 40 वर्षों में करीब 60 से ज्यादा प्रजातियों के डेढ़ लाख से अधिक पेड़ उगाकर कोट मल्ला के अंतर्गत पड़ी बंजर भूमि को हरा-भरा कर दिया.

सीमा सुरक्षा बल से सेवानिवृत्त जगत सिंह ने 1974 में अपने गांव कोट मल्ला में बांज, बुरांश, आंवला, रिंगाल, पान, देवदार, आर्किड प्रजाति के कई पौधे लगाकर न सिर्फ गांव में चारा, ईंधन आदि की समस्या को दूर किया बल्कि उनकी मुहिम के कारण गांव में सूखे पड़े जलस्रोत भी पानी से भर गए. जब जलस्रोत में फिर से पानी भरने लगा तो इसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा था, तब जगत सिंह ने इस समस्या को रुद्रप्रयाग के तत्कालीन जिलाधिकारी मंगेश घिल्डियाल से साझा किया. जिलाधिकारी ने 30 हजार लीटर की क्षमता वाला पानी का टैंकर बनाने की स्वीकृति दी. मार्च 2021 में टैंक का निर्माण पूरा हो गया.

जगत सिंह जंगली ने इस जमीन को रोजगार से जोड़ने के लिए प्रशासन से निवेदन किया. जिसके बाद कृषि विभाग की मदद से यहां रोजमेरी और डेंडिलियन के पौधे लगाए गए, जिनकी कीमत बाजार में 300 रुपये से लेकर 400 रुपये प्रति किलो तक होती है.

उत्तराखंड का स्विट्जरलैंड है तुंगनाथ-चोपता, धर्म और खूबसूरती का बेजोड़ संगम

उत्तराखंड का स्विट्जरलैंड है तुंगनाथ-चोपता, धर्म और खूबसूरती का बेजोड़ संगम

चोपता 12 से 14 हजार फीट की ऊंचाई पर बसा हुआ है और यह गढ़वाल-हिमालय के सबसे सुंदर स्थानों में से एक है.

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उत्तराखंड वैसे तो धार्मिक और कई खूबसूरत जगहों के लिए जाना जाता है, मगर राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में ऊखीमठ से लगभग 45 किलोमीटर दूर तुंगनाथ और चोपता में धर्म और खूबसूरती का ऐसा संगम है, जो हर किसी का मन मोह लेता है. चोपता 12 से 14 हजार फीट की ऊंचाई पर बसा हुआ है और यह गढ़वाल-हिमालय के सबसे सुंदर स्थानों में से एक है.

जनवरी-फरवरी के महीनों में आमतौर पर बर्फ की चादर ओढ़े इस जगह की सुंदरता जुलाई-अगस्त के महीनों में देखते ही बनती है. इन महीनों में यहां मीलों तक फैले मखमली घास के मैदान और उनमें खिले फूलों की सुंदरता हर किसी का दिल जीत लेती है. यही वजह है कि पर्यटक इसकी तुलना स्विट्जरलैंड से भी करते हैं.

तुंगनाथ मंदिर पहुंचने के लिए चोपता से तीन किलोमीटर की चढ़ाई पर पैदल चलकर पहुंचा जाता है. तुंगनाथ मंदिर पंचकेदारों में से एक है और दुनिया का सबसे ज्यादा ऊंचाई (3600 मीटर) पर बना शिव मंदिर है. यहां भगवान भोलेनाथ की भुजाओं की विशेष पूजा की जाती हैं क्योंकि इस स्थान पर शिवजी भुजा के रूप में विद्यमान हैं.

ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया गया था. बताया जाता है कि महाभारत में हुए नरसंहार की वजह से भोलेनाथ पांडवों से नाराज हो गए थे. पार्वती माता ने विवाह से पहले भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए यहां तपस्या भी की थी.

उत्तराखंड में दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर

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धारत्तुर परकोटा शैली में बने होने के चलते इस भव्य मंदिर के गर्भ गृह पर बाहर से 16 कोने हैं और भीतर से 8 कोने हैं.

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ओंकारेश्वर मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के ऊखीमठ में स्थित एक प्रमुख तीर्थ स्थल है. पुरातात्विक सर्वेक्षणों के अनुसार, प्राचीन धारत्तुर परकोटा शैली में निर्मित विश्व का यह एकमात्र मंदिर है, हालांकि पहले काशी विश्वनाथ और सोमनाथ मंदिर में भी धारत्तुर परकोटा शैली उपस्थित थी लेकिन बाद में आक्रमणकारियों ने इन मंदिरों को नष्ट कर दिया था.

धारत्तुर परकोटा शैली में बने होने के चलते इस भव्य मंदिर के गर्भ गृह पर बाहर से 16 कोने हैं और भीतर से 8 कोने हैं. यह मंदिर चारों ओर से प्राचीन भव्य भवनों से घिरा हुआ है, जिनकी छत पठाल निर्मित है. मंदिर में प्रवेश करने के लिए बाहरी भवन पर एक विशाल सिंहद्वार बना हुआ है, जो मंदिर में प्रवेश का एकमात्र मार्ग है.

1300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर में सर्दियों के दौरान केदारनाथ और मध्यमहेश्वर की डोली को रखा जाता है और छह माह तक ऊखीमठ में ही इनकी पूजा की जाती है. हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, माना जाता है कि इस मंदिर में बाणासुर की बेटी उषा और भगवान कृष्ण के पोते अनिरुद्ध  का विवाह हुआ था.

मंदिर से जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा है कि मंधाता, एक सम्राट और भगवान राम के पूर्वज, जिन्होंने सभी सांसारिक सुखों को त्याग दिया था और एक पैर पर खड़े होकर 12 वर्षों तक तपस्या की थी. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें ओमकार यानी ओम की ध्वनि के रूप में दर्शन दिए और उन्हें आशीर्वाद दिया. तब से मंदिर को ओंकारेश्वर मंदिर के रूप में जाना जाता है.

बता दें कि ओंकारेश्वर अकेला मंदिर न होकर मंदिरों का समूह है. इस समूह में वाराही देवी मंदिर, पंचकेदार लिंग दर्शन मंदिर, पंचकेदार गद्दी स्थल, भैरवनाथ मंदिर, चंडिका मंदिर, हिमवंत केदार वैराग्य पीठ, विवाह वेदिका और अन्य मंदिरों समेत संपूर्ण कोठा भवन शामिल हैं. वहीं ऊखीमठ मंदिर पंच केदारों का गद्दी स्थल भी है, जहां पंच केदारों की दिव्य मूर्तियां एवं शिवलिंग स्थापित हैं.

उत्तराखंड में भी है काशी विश्वनाथ मंदिर, जानिए क्यों पड़ा इस जगह का नाम गुप्तकाशी?

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दोषों से मुक्ति पाने के लिए पांडवों ने पूजा-अर्चना की और भगवान शंकर के दर्शन के लिए निकल पड़े.

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उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में 1319 मीटर की ऊंचाई पर विख्यात काशी विश्वनाथ मंदिर, पवित्र धाम केदारनाथ मार्ग पर गुप्तकाशी कस्बे में स्थित है. यह केदारनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव भी है. यह तीन प्रमुख काशियों उत्तरकाशी, काशी (वाराणसी) और गुप्तकाशी में से एक है. मान्यता है कि कौरवों और पांडवों में जब युद्ध हुआ तो पांडवों ने कई व्यक्तियों और अपने भाइयों का भी वध कर दिया था तो उसी वध के कारण उन्हें बहुत सारे दोष लग गए थे.

पांडवों को उन्हीं दोषों के निवारण करने के लिए भगवान शिव से माफी मांगते हुए उनका आशीर्वाद लेना था, लेकिन भोलेनाथ पांडवों से रुष्ट हो गए थे क्योंकि उस युद्ध के दौरान पांडवों ने भगवान शिव के भी भक्तों का वध कर दिया था.

उन्हीं दोषों से मुक्ति पाने के लिए पांडवों ने पूजा-अर्चना की और भगवान शंकर के दर्शन के लिए निकल पड़े. भगवान शिव हिमालय के इसी स्थान पर ध्यान मग्न थे और जब भगवान को पता चला कि पांडव इसी स्थान पर आ रहे हैं तो वह यहीं नंदी का रूप धारण कर अंतर्ध्यान हो गए या यूं कहें गुप्त हो गए, इसलिए इस जगह का नाम गुप्तकाशी पड़ा.

वहीं यहां शिव-पार्वती को समर्पित अर्द्ध नारीश्वर मंदिर भी स्थित है. गुप्तकाशी में मणिकर्णिका कुंड भी है. माना जाता है कि मणिकर्णिका कुंड में गिरने वालीं दो जलधाराएं गंगा और यमुना के रूप में विराजमान होती हैं.

उत्तराखंड में इस जगह है भगवान कार्तिकेय का मंदिर, जानिए इसके इतिहास से जुड़ी कहानी

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उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित कार्तिक स्वामी मंदिर भगवान शिव के बड़े पुत्र, कार्तिकेय को समर्पित है.

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कार्तिक स्वामी मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में रुद्रप्रयाग-पोखरी मार्ग पर कनक चौरी गांव के पास 3050 मीटर की ऊंचाई पर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है. कार्तिक स्वामी मंदिर भगवान शिव के बड़े पुत्र, कार्तिकेय को समर्पित है, जिन्होंने अपने पिता भगवान शंकर के प्रति समर्पण के प्रमाण के रूप में अपनी अस्थियों की पेशकश की थी. माना जाता है कि यह घटना यहीं हुई थी.

चमोली : जानवरों में तेजी से फैल रहा खुरपका, अब तक कई पशुओं की मौत

चमोली : जानवरों में तेजी से फैल रहा खुरपका, अब तक कई पशुओं की मौत

चमोली जिले के गौचर में खुरपका नामक संक्रामक बीमारी की वजह से पशुओं की मौत हो रही है. 

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चमोली जिले के गौचर में खुरपका नामक संक्रामक बीमारी की वजह से पशुओं की मौत हो रही है. गौचर के श्री कृष्णा गौ सदन की गायों में तो यह रोग बीते एक सफ्ताह से काफी तेजी से फैल रहा है. यहां लगभग 100 से अधिक जानवरों को रखा गया है, जिसमें से इस बीमारी के कारण हर रोज किसी न किसी पशु की मौत हो रही है. पशुओं के शवों को सदन में ही जेसीबी द्वारा गड्ढा खोदकर दफनाया जा रहा है.

कैसे मिलेगा बेहतर इलाज? 1 अदद ट्रामा सेंटर को तरस रहा रुद्रप्रयाग

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रुद्रप्रयाग चारधाम यात्रा का मुख्य पड़ाव होने के साथ ही आपदा के लिहाज से भी बेहद संवेदनशील है.

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विडम्बना तो देखिए रुद्रप्रयाग जिले को बने हुए 23 वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आज तक जिला मुख्यालय में ट्रामा सेंटर स्थापित नहीं हो सका है. जिसके कारण दुर्घटना में घायल मरीजों का उपचार जिला चिकित्सालय में किया जाता है. यहां घायलों को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, कई बार तो घायल मरीजों को काफी दूर श्रीनगर-गढ़वाल ले जाने की भी नौबत आ जाती है. रुद्रप्रयाग चारधाम यात्रा का मुख्य पड़ाव होने के साथ ही आपदा के लिहाज से भी बेहद संवेदनशील है.

त्रियुगीनारायण में हुआ था शिव-पार्वती का विवाह, मंदिर में त्रेतायुग से जल रही दिव्य लौ

त्रियुगीनारायण में हुआ था शिव-पार्वती का विवाह, मंदिर में त्रेतायुग से जल रही दिव्य लौ

मंदिर के अंदर प्रज्वलित अग्नि कई युगों से जल रही है, इसलिए इस स्थल का नाम त्रियुगी हो गया यानी अग्नि जो तीन युगों से जल रही है.

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त्रियुगीनारायण मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के त्रियुगीनारायण गांव में स्थित पवित्र और विशेष पौराणिक मंदिर है. मंदिर के अंदर प्रज्वलित अग्नि कई युगों से जल रही है, इसलिए इस स्थल का नाम त्रियुगी हो गया यानी अग्नि जो तीन युगों से जल रही है. इस स्थान को विष्णु द्वारा त्रेतायुग में देवी पार्वती के शिव से विवाह के स्थल के रूप में जाना जाता है और इस प्रकार यह एक लोकप्रिय तीर्थस्थल है. विष्णु ने इस दिव्य विवाह में पार्वती के भ्राता का कर्तव्य निभाया था, जबकि ब्रह्मा इस विवाहयज्ञ के पुरोहित बने थे. उस समय सभी संत-मुनियों ने इस समारोह में भाग लिया था. विवाह स्थल के नियत स्थान को ब्रहम शिला कहा जाता है, जो कि मंदिर के ठीक सामने स्थित है. इस मंदिर के महात्म्य का वर्णन स्थल पुराण में भी मिलता है. इस मंदिर की एक विशेष विशेषता एक सतत आग है, जो मंदिर के सामने जलती है. माना जाता है कि लौ दिव्य विवाह के समय से जलती आ रही है. इस प्रकार, मंदिर को अखंड धूनी मंदिर भी कहा जाता है. आने वाले यात्री इस हवनकुण्ड की राख को अपने साथ ले जाते हैं और मानते हैं कि यह उनके वैवाहिक जीवन को सुखी बनाएगी. मंदिर के सामने ब्रह्मशिला को दिव्य विवाह का वास्तविक स्थल माना जाता है. मन्दिर के अहाते में सरस्वती गङ्गा नाम की एक धारा का उद्गम हुआ है. इससे इसके पास के सारे पवित्र सरोवर भरते हैं. सरोवरों के नाम रुद्रकुंड, विष्णुकुंड, ब्रह्मकुंड व सरस्वती कुंड हैं. रुद्रकुंड में स्नान, विष्णुकुंड में मार्जन, ब्रह्मकुंड में आचमन और सरस्वती कुंड में तर्पण किया जाता है.

चमोली में मिठाई की दुकान में लगी आग, एक के बाद एक फटे 9 सिलेंडर

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आग की चपेट में 11 अन्य दुकानें भी आ गईं. दुकानों में आग लगने से चमोली बाजार में अफरा-तफरी का माहौल बन गया.

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बद्रीनाथ हाइवे पर चमोली मुख्य बाजार में मिठाई की दुकान में अचानक आग लग गई. आग की चपेट में 11 अन्य दुकानें भी आ गईं. दुकानों में आग लगने से चमोली बाजार में अफरा-तफरी का माहौल बन गया. वहीं मिठाई की दुकान में रखे करीब 9 सिलेंडरों में एक के बाद एक विस्फोट होने से आग और विकराल हो गई, जिसके कारण दुकान में रखा लाखों का सामान जलकर खाक हो गया.

कोरोना महामारी की वजह से पिछले दो साल से चारधाम यात्रा बंद पड़ी हुई है, जिससे स्थानीय कारोबारियों और होटल व्यवसाय से जुड़े लोगों के सामने परिवार पालने की समस्या खड़ी हो चुकी है. यात्रा बंद होने से लोगों के सामने अब भुखमरी तक की नौबत आ गई है. ऐसे में केदारघाटी की जनता में सरकार के खिलाफ आक्रोश बना हुआ है.

Uttarakhand: मंदाकिनी नदी में गिरी कार, मच गई चीख-पुकार; ड्राइवर की मौत

Uttarakhand: मंदाकिनी नदी में गिरी कार, मच गई चीख-पुकार; ड्राइवर की मौत

Uttarakhand Flood 2021 Monsoon Weather Update: उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग (Rudraprayag) में मंदाकिनी नदी में एक कार गिर गई. हादसे में कार चालक की मौत हो गई. तो वहीं पिथौरागढ़ (Pithoragarh) में भी धारचूला के गलाती नाले में गिरने से एक शख्स की जान चली गई.

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रुद्रप्रयाग/पिथौरागढ़. उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग (Rudraprayag) के अगस्त्यमुनि गंगानगर इलाके में बड़ा हादसा हुआ. गुरुवार सुबह एक कार मंदाकिनी नदी (Mandakini River) में जा गिरी. हादसे के दौरान कार में एक व्यक्ति सवार था. हादसे की जानकारी मिलते ही मौके पर स्थानीय पुलिस और आपदा प्रबंधन की टीम पहुंची. काफी मशक्कत के बाद भी कार सवार शख्स को बचाया न जा सका. लोगों की मदद से शव को मंदाकिनी में गिरी कार से निकाल लिया गया. बताया जा रहा है कि गंगानगर में पठालीधार-बसूकेदार को जोड़ने वाले पुल के पास कार को मोड़ने के समय ये हादसा हुआ. मंदाकिनी नदी में जलस्तर बढ़ा होने के कारण रेस्क्यू में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

मिली जानकारी के मुताबिक, अगस्त्यमुनि के गंगानगर में गुरुवार सुबह एक कार मंदाकिनी नदी में गिर गई. बताया जा रहा है कि कार मोड़ने के दौरान ये हादसा हुआ. काफी मशक्कत के बाद पुलिस और एसडीआरएफ की टीम ने रस्सियों की मदद से नदी में उतरी और शव को बरामद किया.

पिथौरागढ़ में बड़ा हादसा

बरसात के दिनों पहाड़ों में हर तरफ आसमानी आफत बरस रही है. लगातार हो रही भारी बारिश के कारण धारचूला में गलाती नाला भी पूरे ऊफान पर है. इस नाले में एक कच्चा पुल मौजूद था. इसी कच्चे पुल की मदद से गोपाल सिंह अपने घर लौट रहा था. लेकिन पुल ने साथ नहीं दिया और गोपाल ऊफनते नाले में समा गया. देऱ शाम भी एसडीआरएफ ने गोपाल को तलाशने के लिए सर्च ऑपरेशन चलाया. मगर अंधेरा काफी होने के चलते ऑफरेशन रोकना पड़ा. सुबह होने पर एसडीआऱएफ ने फिर मोर्चा संभाला. लेकिन पानी के बहाव तेज होने के कारण शव तक पहुंचना मुश्किल हो रहा था.  आखिरकार रस्सियों की मदद से एसडीआऱएफ के जवान शव तक पहुंचे. तेज बहाव के बीच  शव को निकालना भी किसी चुनौती से कम नहीं था. लेकिन पूरी तरह ट्रेंड जवानों ने शव को पानी से निकाला.

शव को पार पहुंचाने के लिए एक बार फिर एसडीआऱएफ  ने रस्सियों की मदद ली. रस्सियों में लटकाकर शव का दूसरे छोर पर पहुंचाया गया. करीब 6 घंटे तक चले सर्च ऑपरेशन ने देखने वालों की धड़कनों को थाम सा दिया था. घटना के बाद नाराज ग्रामीणों ने घंटों एसडीएम धारचूला का घेराव किया. ग्रामीणों ने गोपाल के शव का अंतिम संस्कार भी नहीं किया. गलाती से क्षेत्र पंचायत सदस्य देवेन्द्र बिष्ट का कहना है कि गांव के लोग सालों से पक्का पुल बनाने की मांग कर रहे हैं. लेकिन शासन-प्रशासन को कोई परवाह नहीं है.

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