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गैरसैंण सत्र से पहले राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण देने पर फिर शुरू हुई सियासत

गैरसैंण सत्र से पहले राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण देने पर फिर शुरू हुई सियासत

उत्तराखंड के देहरादून के गैरसैंण सत्र से पहले राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण के मुद्दे में एक बार फिर उबाल आया है. हाईकोर्ट की रोक के बाद सरकार जहां एक्ट लाकर आंदोलनकारियों को आरक्षण की व्यवस्था करने की बात कह रही है लेकिन कानून के जानकार इस पर भी सवाल उठा रहे हैं.वहीं आंदोलनकारी इसे नौकरशाही द्वारा उलझाया गया मामला बता रहे हैं.

उत्तराखंड के देहरादून के गैरसैंण सत्र से पहले राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण के मुद्दे में एक बार फिर उबाल आया है. हाईकोर्ट की रोक के बाद सरकार जहां एक्ट लाकर आंदोलनकारियों को आरक्षण की व्यवस्था करने की बात कह रही है लेकिन कानून के जानकार इस पर भी सवाल उठा रहे हैं.वहीं आंदोलनकारी इसे नौकरशाही द्वारा उलझाया गया मामला बता रहे हैं.

उत्तराखंड के देहरादून के गैरसैंण सत्र से पहले राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण के मुद्दे में एक बार फिर उबाल आया है. हाईकोर्ट की रोक के बाद सरकार जहां एक्ट लाकर आंदोलनकारियों को आरक्षण की व्यवस्था करने की बात कह रही है लेकिन कानून के जानकार इस पर भी सवाल उठा रहे हैं.वहीं आंदोलनकारी इसे नौकरशाही द्वारा उलझाया गया मामला बता रहे हैं.

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    उत्तराखंड के देहरादून के गैरसैंण सत्र से पहले राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण के मुद्दे में एक बार फिर उबाल आया है. हाईकोर्ट की रोक के बाद सरकार जहां एक्ट लाकर आंदोलनकारियों को आरक्षण की व्यवस्था करने की बात कह रही है लेकिन कानून के जानकार इस पर भी सवाल उठा रहे हैं.वहीं आंदोलनकारी इसे नौकरशाही द्वारा उलझाया गया मामला बता रहे हैं.

    उत्तराखंड राज्य बनने के बाद साल दो हजार चार में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने राज्य आंदोलनकारियों को नौकरियों में दस फीसदी आरक्षण की व्यवस्था दी. इसके अनुपालन में शासन का रवैया ढुल मुल रहा जिस पर आंदोलनकारियों के दबाव में साल दो हजार दस में भाजपा सरकार ने सभी चिन्हित आंदोलनकारियों के लिए ये व्यवस्था लागू कर दी.

    साल दो हजार तेरह में हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी और तभी से इस पर भ्रम की स्थिति बनी हुई है. सरकार ने अब एक्ट बनाने का भरोसा आंदोलनकारियों को दिया है लेकिन कानून के जानकार इसे खारिज कर रहे हैं.

    वरिष्ठ अधिवक्ता सूरत सिंह नेगी का कहना है कि संविधान की मूल भावना के विपरीत बताते हुए कोर्ट ने इसपर रोक लगाई है इसलिए एक्ट कैसे बनाया जा सकता है.

    कानून के जानकार जो भी कह रहे हों लेकिन राज्य आंदोलन से जुड़े लोग इस मुद्दे को नौकरशाही द्वारा उलझाने की बात कह रहे हैं. राज्य आंदोलनकारी मंच के अध्यक्ष प्रदीप कुकरेती का कहना है कि कोर्ट ने तो शासनादेश संख्या बारह सौ उन्हत्तर पर फैसला दिया जबकि आंदोलनकारियों को आरक्षण का लाभ तो शासनादेश संख्या बारह सौ सत्तर के अंतर्गत दिया जा रहा था.

    प्रदीप कुकरेती कहते हैं कि कोर्ट में सरकार सही तरीके से मामले की पैरवी नहीं कर रही इसीलिए आंदोलनकारियों को आरक्षण का मसला सुलझ नहीं रहा. प्रदीप कुकरेती का कहना है कि अगर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है तो सरकार इसे भी स्पष्ट कर दे.

    Tags: Harish rawat

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