भिलंगना और बालगंगा घाटी के लोगों की नियति है आपदा का दंश झेलना

टिहरी जिले का सीमान्त क्षेत्र घनसाली आपदा की दृष्टि से सबसे संवेदनशील क्षेत्र बनता जा रहा है. हर साल प्राकृतिक आपदा से यहां भारी नुकसान होता है. इसके बावजूद प्रशासन विशेष ध्यान नहीं देता है. आदपा के बाद राहत कार्य जरूर किए जाते हैं, लेकिन आपदा से निपटने के पूर्व इंतजामों के नाम पर सिर्फ हवाई दावे ही किए जाते हैं.

Saurabh Singh | News18 Uttarakhand
Updated: June 6, 2018, 1:28 PM IST
भिलंगना और बालगंगा घाटी के लोगों की नियति है आपदा का दंश झेलना
फाइल फोटो.
Saurabh Singh | News18 Uttarakhand
Updated: June 6, 2018, 1:28 PM IST
भिलंगना और बालगंगा नदियों के किनारों पर बसा घनसाली जिला मुख्यालय नई टिहरी से दूरस्थ होने के चलते पिछड़ेपन का शिकार रहा है. आपदा की दृष्टि से तो घनसाली का नंबर जिले में सबसे ऊपर है. आपदा की दृष्टि से अति संवेदनशील घनसाली के भिलंगना और बालगंगा घाटी के लोगों की तो आपदा का दंश झेलना नियति बन चुका है. हर वर्ष आपदा के कहर के चलते यहां हजारों हेक्टेयर उपजाऊ भूमि तबाह हो जाती है. सैकड़ों पशु आपदा की भेंट चढ़ जाते हैं और लोगों के आशियाने तो ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं.

आपदा के बाद शासन प्रशासन हरकत में आता है और राहत कार्य शुरू किए जाते हैं, लेकिन वो सिर्फ नाममात्र के ही होते हैं. आपदा प्रभावितों का दर्द कम नहीं होता है. आपदा से निपटने और तैयारियों को लेकर प्रशासन द्वारा दावे तो बहुत किए जाते हैं. प्राकृतिक आपदा होने पर प्रशासन की तैयारियों की पोल खुल जाती है. जिसका खामियाजा आपदा प्रभावितों को भुगतना पड़ता है.

भिलंगना और बालगंगा घाटी के केमर, ग्यारह गांव हिंदाऊ, नैलचामी, बासर, आरगढ़ और गोनगढ़ पट्टियां तो एसी है जहां के लोग अब हल्की बारिश में ही अपने घरों से बाहर निकल जाते हैं और पूरी रात जागकर काटते हैं. वर्षों से ग्रामीणों द्वारा पूरे घनसाली क्षेत्र को आपदा की दृष्टि से संवेदनशील चिन्हित करने की मांग की जा रही है, लेकिन कुछ नहीं हुआ.

जिला  प्रशासन आपदा की दृष्टि से घनसाली को अति संवेदनशील तो मान रहा है और आपदा से निपटने के दावे कर रहा है, लेकिन इन दावों के हवा तब निकल जाती है जब प्रकृति अपना कहर बरपाती है.
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