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इस खास मकसद से देवभूमि में खुला सेंटर ऑफ बाल्टिक स्ट्डीज

इस खास मकसद से देवभूमि में खुला सेंटर ऑफ बाल्टिक स्ट्डीज

देव संस्कृति यूनिवर्सिटी हरिद्वार में खुलेगा अध्ययन केंद्र

देव संस्कृति यूनिवर्सिटी हरिद्वार में खुलेगा अध्ययन केंद्र

उत्तराखण्ड के राज्यपाल डॉ. कृष्ण कांत पाल ने रविवार को देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार में सेंटर ऑफ बाल्टिक स्टडीज का उद्घाटन किया. इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में अपने सम्बोधन में राज्यपाल ने भारतीय व बाल्टिक देशों की संस्कृति की समानता पर प्रकाश डाला. इस अवसर पर उन्होंने कहा कि बाल्टिक संस्कृति में भी पृथ्वी व प्रकृति के देवी-देवताओं की पूजा की जाती है.

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    उत्तराखण्ड के राज्यपाल डॉ. कृष्ण कांत पाल ने रविवार को देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार में सेंटर ऑफ बाल्टिक स्टडीज का उद्घाटन किया. इस मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में अपने सम्बोधन में राज्यपाल ने भारतीय व बाल्टिक देशों की संस्कृति की समानता पर प्रकाश डाला.
    इस अवसर पर उन्होंने कहा कि बाल्टिक संस्कृति में भी पृथ्वी व प्रकृति के देवी-देवताओं की पूजा की जाती है.

    इन देशों में पूजा का पवित्र तरीका आज भी जारी है. उन्होंने बताया कि 14वीं सदी में लिथुएनिया के राजा ने आदेशित किया था कि लुथियाना को सहनशीलता की धरती पर होना चाहिए.
    राज्यपाल ने कहा कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार में इस सेंटर के स्थापित होने से न सिर्फ हमारी और बाल्टिक देशों की संस्कृतियों को मजबूती मिलेगी, बल्कि हमारी विरासत के लिये अनुसंधान को भी प्रोत्साहित करेगा.

    उन्होंने कहा कि बाल्टिक सेंटर के माध्यम से संयुक्त प्रकाशनों, सीखने के संसाधनों, अनुसंधानिक गतिविधियों और छात्रों के आदान-प्रदान को भी संयुक्त रूप से बढ़ावा मिलेगा. राज्यपाल ने कहा कि भारतीय सभ्यता सबसे पुरानी और सतत सभ्यता है.

    अन्य सभी सभ्यताओं में अंतराल रहा है, कुछ पूरी तरह विलुप्त हो गयी है और कुछ पुनर्जीवित हुई हैं. लेकिन केवल भारतीय सभ्यता ही है जो पिछले पाँच हजार वर्षों से भी अधिक समय से जीवित है. भारतीय सभ्यता का अद्भुत लचीलापन उपनिषदों के प्रतिपादित कुछ शाश्वत सत्यों पर आधारित है, जो सदैव वैध रहेंगे.

    उन्होंने कहा कि पन्द्रहवीं व सोलहवीं सदी में आदि शंकराचार्य व गुरूनानक, संतकवि तुलसीदास, कबीर, मीराबाई, सूरदास, चैतन्य महाप्रभु ने भी बहुत सी चुनौतियों से उबरकर हमारा मार्गदर्शन किया है. बाद में 19वीं सदी में स्वामी रामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द के अतिरिक्त हमारे पास ब्रहम समाज, आर्य समाज व प्रार्थना समाज भी थे.

    राज्यपाल डॉ.केके पॉल ने कहा कि पूरे वैश्विक समाज को विश्वशांति का संदेश भारत द्वारा दिया गया है. आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि सभी लोगों के मध्य तथा धर्म और विज्ञान के बीच सामंजस्य स्थापित हो.

    Tags: Uttarakhand news

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