मदर्स डे स्पेशलः उत्‍तराखंड को COVID-19 से बचाने के लिए कोरोना से जंग लड़ रहीं ये 8 माताएं
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मदर्स डे स्पेशलः उत्‍तराखंड को COVID-19 से बचाने के लिए कोरोना से जंग लड़ रहीं ये 8 माताएं
उत्‍तराखंड की 8 कोरोना फाइटर माताएं.

कोरोना (Corona) की इस महामारी (Epidemic) के खिलाफ जारी इस जंग में उत्तराखंड स्‍वास्‍थ्‍य विभाग की महानिदेशक डॉ. अमिता उप्रेती (Dr. Amita Upreti) अग्रणी भूमिका निभा रहीं है.

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देहरादून. कोरोना महामारी के खिलाफ जारी जंग में उत्‍तराखंड की आठ माताओं की बेहद अहम भूमिका है. उत्‍तराखंड की इन आठ माताओं ने न केवल सूबे की स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यवस्‍था को अपने कंधो पर ले रखा है, बल्कि सूबे को COVID-19 के प्रकोप से बहुत हद तक बचाने में कायमाब भी रही हैं. आएये, मदर्स डे स्‍पेशल पर हम आपको रूबरू कराते हैं उत्‍राखंड की 8 कोरोना वारियर माताओं से.

डॉ. अमिता उप्रेती, स्वास्थ्य महानिदेशक
उत्तराखंड में स्वास्थ्य की बागडोर डीजी हेल्थ के तौर पर डॉ. अमिता उप्रेती संभाल रही हैं. लेकिन राज्य में कोरोना के 67 मामले सामने आने के बाद इन दिनों उन्हें पानी पीने की भी फुरसत नहीं है. दो बेटियों और एक बेटे की  स्वास्थ्य महानिदेशक मां इन दिन-रात बैठकों से लेकर राज्य के 13 जिलों में हो रहे इंतजामों के काम में व्यस्त हैं. इसलिए दोनों शादीशुदा बेटियों से फोन पर बात करने की भी फुरसत नहीं. हालांकि उनकी एक बेटी भी दिन-रात मरीजों की सेवा में व्यस्त हैं क्योंकि वो भी एक डॉक्टर हैं. डॉ. अमिता बताती हैं कि मीटिंग्स और कई लोगों से मिलने की वजह से वो घर में रह रहे बेटे से भी दूर-दूर से ही मुलाकात कर पाती हैं. पिछले डेढ़ महीने से एक तरह से वो खुद को क्वारंटीन किए हुए हैं. डॉ. अमिता की व्‍यस्‍तता को देखते हुए आजकल उनके पति और प्रदेश के पूर्व स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. एलएम उप्रेती अपने हाथों से नास्ता बनाकर उन्हें परोस रहे हैं.



डॉ. मीनाक्षी जोशी, सीएमओ, देहरादून


राजधानी देहरादून की सीएमओ डॉ. मीनाक्षी दो बच्चों की मां है. डॉ. मीनाक्षी खुद तो कोविड-19 पर निगाह रख ही रही हैं. साथ ही उनकी डॉक्टर बेटी भी मरीजों की सेवा में लगी हैं. बेटी कोविड हॉस्पिटल में तब्दील कर दिए गए दून मेडिकल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. लिहाजा मां और बेटी दोनों क्वारंटीन जैसी परिस्थिति में है. डॉ. मीनाक्षी के बेटे इन दिनों बंगलूरु से देहरादून आए हैं. लेकिन  मां-बेटे का दूर-दूर से ही मिलना हो रहा है. डॉ. मीनाक्षी बताती हैं कि देहरादून में वो जिस जगह उनका घर है उसके ठीक सामने उनकी बहन का घर है. जो पूरी तरह से खाली है. इसलिए उन्होंने अपने रहने का इंतजाम वहीं कर रखा है. ताकि हमारी वजह से परिवार को कोई दिक्कत न हो. क्योंकि देहरादून में कोरोना के 34 मरीज सामने आए हैं.

डॉ. सरोज नैथानी, सीएमओ, हरिद्वार
तीर्थ नगरी हरिद्वार में की सीएमओ डॉ. सरोज नैथानी के 24 घंटे कोरोना तैयारियों में ही बीत रहे हैं. खास बात ये है कि उनकी दोनों बेटियां और पति भी डॉक्टर हैं. इस तरह से पूरा का पूरा परिवार ही कोरोना मरीजों की केयर में लगा हुआ है. डॉ. सरोज बताती हैं कि उनके पति आर्मी में डॉक्टर हैं. जबकि उनकी एक बेटी देहरादून तो दूसरी आस्ट्रेलिया में हैं. लेकिन डॉ. सरोज एक खास बात बताती हैं कि कोविड से पहले उनके बच्चे कभी उनसे वीडियो कॉल पर बात नहीं करते थे. लेकिन जब से कोविड-19 ने दस्तक दी है. उनकी विदेश में रह रही बेटी से लेकर देहरादून वाली बेटी और दामाद तक उन्हें वीडियो कॉल करते हैं. और झींक और खांसी तक की जानकारी लेते हैं. क्योंकि हरिद्वार में 8 कोरोना के मरीज सामने आ चुके हैं.

डॉ. शैलजा भट्ट, सीएमओ, ऊधम सिंह नगर
ऊधम सिंह नगर जिले में कोरोना के 13 मामले आ चुके हैं. ऐसे में यहां कोरोना कन्युनिटी ट्रांसफर में तब्दील न हो इसके लिए जिले की सीएमओ डॉ. शैलजा भट्ट परिवार को छोड़ मेहनत में लगी हैं. डॉ. शैलजा बताती हैं कि जब से कोरोना लॉक डाउन हुआ है वो अपने घर नहीं गई. डॉ. शैलजा ने अपने दफ्तर को ही घर बना डाला है. डॉ. शैलजा बताती हैं कि रोजान इतने लोगों से मिलना होता है कि घर जाने से भी डर लगता है. खास बात ये है कि उनकी दो बेटियों में से एक एमसीएच कर रही हैं तो दूसरी सोशल साइंस में ग्रेजुएश. दोनों बेटियां घर आई हुई हैं. वो बताती हैं कि उनकी बेटियां बड़ी हैं लिहाजा रोजाना कॉल या वीडियो चैट के जरिए बच्चों से बात हो जाती है. डॉ. शैलजा हंसते हुए बताती हैं कि उनकी बेटियां उनको लेकर चिंतित रहती हैं. और रोजाना मुझे समझाती हैं कि कोरोना से बचने के लिए क्या-क्या सावधानी बरतनी हैं.

डॉ. भारती राणा, सीएमओ, नैनीताल
नैनीताल जिले में अभी तक कोरोना के 10 मामले सामने आ चुके हैं. जिसमें ज्यादातर लोग तबलीग से जुड़े हैं. डॉ. भारती राणा एक बेहद सख्त किस्म की सीएमओ हैं. उनके बारे में चर्चा रहती है कि उन्होंने हर डॉक्टर और कर्मचारी जिम्मेदारी तय की हुई है. कुछ भी गड़बड़ हुई तो लिखित जवाब लेना तय है. इसलिए कर्मचारी अनुशासित काम करने पर मजबूर हैं. लेकिन इसके उलट डॉ. भारती दो बेटों की मां हैं. लेकिन डॉ. भारती बताती हैं कि उनका एक बेटा देहरादून में है जबकि दूसरा पूणे में है. देहरादून में रह रहे बेटे से तो वो दो महीने पहले मिल लीं थी. लेकिन पूणे में पढ़ाई कर रहे छोटे बेटे से उनकी मुलाकात छह महीने से नहीं हुई. डॉ. भारती बताती हैं कि वैसे तो उनका आधिकारिक आवास नैनीताल में है. लेकिन कोरोना के प्रकोप को देखते हुए वो हल्द्वानी में ही रह रही हैं. कैंप ऑफिस में बने दफ्तर के चार कमरों में से एक कमरे को डॉ. भारती ने अपना आवास बना डाला है. डॉ. भारती कहती हैं कि छोटे बेटे की चिंता रहती है क्योंकि वो लॉक डाउन के कारण पूणे में ही फंसा रह गया. लेकिन इस चिंता के बाजजूद सुबह से शाम तक लोगों को कोरोना न हो इसकी फिक्र ज्यादा रहती है.

डॉ. साविता ह्यांकी, सीएमओ, अल्मोड़ा
अल्मोड़ा की सीएमओ डॉ. सविता बताती हैं कि कोरोना के दौर में मीटिंग्स और मॉनीटरिंग का काम चार गुना हो गया है. ऐसे में उनका बेटा और पति किचन से लेकर सब चीजें मैनेज करने में मदद करते हैं. डॉ. सविता बताती हैं कि परिवार को बचपन से ही ऐसे मैनेज करने की आदत है. हमारे लिए कोरोना में बरते जा रहे प्रिकॉशन नए नहीं है. क्योंकि हॉस्पिटल में काम करते हुए ये हमारी दिनचर्या का हिस्सा है. लेकिन अब ज्यादा केयरफुल रहना पड़ रहा है. हां इतना जरूर है कि इन दिनों पति और बेटे किचन की कमान अपने हाथ में थाम रखी है.

डॉ. मीनू रावत, सीएमओ, टिहरी
टिहरी में कोरोना का भले ही कोई मामला अभी तक सामने न आया हो लेकिन अलर्टनेस यहां भी कम नहीं है. डॉ. मीनू रावत सीएमओ के तौर पर जिले की स्वास्थ्य सेवाओं की कमान संभाले हुए हैं. क्योंकि दूसरे राज्यों में ​फंसे जिले को लोगों के आने का सिलसिला भी शुरु हो गया है इसलिए इनकी सही स्क्रीनिंग सीएमओ के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. डॉ. मीनू बताती हैं कि मुंबई से एमबीए कर रही बेटी इन दिनों घर आ चुकी हैं. जबकि बेटा फीलीपींस से एमबीबीएस कर रहा है. और फीलीपींस में ही है. इसलिए उसकी चिंता  बनी रहती है. डॉ. मीनू के पति भी सरकारी डॉक्टर हैं. लिहाजा दोनों पति-पत्नी मिलकर मरीजों की सेवा में जुटे हैं.

डॉ. उषा गुंज्याल, सीएमओ, पिथौरागढ़
सीमांत जिले पिथौरागढ़ के लिए राहत की बात ये है कि यहां कोरोना का अभी तक कोई मामला सामने नहीं आया है. लेकिन इसके बावजूद खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सका. डॉ. उषा बताती हैं कि एक गृहणी के तौर पर तो केवल परिवार की जिम्मेदारी होती है. लेकिन जब आप सीएमओ जैसे पद पर हों तो जिले में रहने वाला हर शख्स हमारे परिवार का हिस्सा बन जाता है. इसलिए इस समय परिवार की चिंता कम लोगों की चिंता ज्यादा रहती है. मैं अपने एक बेटे को भी समय नहीं दे पाती.

 

 
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