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राज्य स्थापना से लेकर आज तक जगह बनाने के लिए जूझ रही यूकेडी!

Ram anuj | ETV UP/Uttarakhand
Updated: November 8, 2016, 1:42 PM IST
राज्य स्थापना से लेकर आज तक जगह बनाने के लिए जूझ रही यूकेडी!
यूकेडी अध्यक्ष पुष्पेश त्रिपाठी

देहरादून उत्तराखंड राज्य का गठन लम्बे संघर्षो और शहादत की बुनियाद पर हुआ है. जिसमें उत्तराखंड क्रांति दल की भूमिका भी अहम रही है. मगर राज्य गठन के 16 सालों के बाद भी यूकेडी प्रदेश में एक सशक्त क्षेत्रीय दल के तौर पर नहीं उभर सकी है. उत्तराखंड क्रांति दल यानी यूकेडी का गठन 25 जुलाई 1979 को मसूरी में हुआ.

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देहरादून उत्तराखंड राज्य का गठन लम्बे संघर्षो और शहादत की बुनियाद पर हुआ है. जिसमें उत्तराखंड क्रांति दल की भूमिका भी अहम रही है. मगर राज्य गठन के 16 सालों के बाद भी यूकेडी प्रदेश में एक सशक्त क्षेत्रीय दल के तौर पर नहीं उभर सकी है.

उत्तराखंड क्रांति दल यानी यूकेडी का गठन 25 जुलाई 1979 को मसूरी में हुआ. यूकेडी उत्तराखंड राज्य के जनसंघर्षों की एक उपज है. अलग राज्य की मांग को लेकर पार्टी ने लेकर जन आन्दोलन चलाया. पार्टी के इस मूवमेंट से उत्तराखंड राज्य आन्दोलन की मांग लगातार तेज होती गई. चाहे 2 अक्टूबर 1994 का मामले हो या फिर मसूरी गोलीकांड का मामला हो या फिर रामपुर तिराहा या फिर खटीमा गोलीकांड. पार्टी हर मोर्चे पर राज्य आन्दोलन में मजबूती के साथ खड़ी रही.

जब राज्य आन्दोलन 1996 में पूरे चरम पर था तो यूकेडी ने विधान सभा चुनाव का बहिष्कार कर दिया. इसके बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस, भाजपा के साथ दूसरे दलों का दामन थाम लिया. 9 नवम्बर, 2000 को उत्तराखंड राज्य का गठन हो गया. फिर पार्टी की पहचान एक आन्दोलनकारी संगठन तक सिमट कर रह गई.

पुष्पेश त्रिपाठी, अध्यक्ष यूकेडी का कहना है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों की हमेशा कोशिश रही है कि चुनाव में धन, बल का इस्तेमाल करके किसी तरह से प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो सकें . यही वजह है कि वे सरकार के गठन में यूकेडी का समर्थन लेते हैं. मगर चुनाव के पहले वे क्षेत्रीय दलों से परहेज करते हैं. इस तरह से देखा जा सकता है कि प्रदेश की सत्ता कांग्रेस और भाजपा के हाथों में रहती है.

2002 के विधान सभा चुनाव में यूकेडी को चार, 2007 में तीन और 2012 के विधान सभा चुनाव में महज एक सीट ही जीत सकी. पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल चुनाव में धन बल का इस्तेमाल करते हैं, जिसकी वजह से यूकेडी प्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ नहीं बना सकी.

पार्टी चाहे जो दलील दे, मगर हकीकत यह भी है कि पार्टी अब 6 गुटों में बट चुकी है. नेतृत्व का अभाव है. पार्टी जनता के बीच कोई ठोस विजन नहीं पेश कर सकी है. जिसकी वजह से पार्टी का लगातार ग्राफ गिरता जा रहा है

चन्द्रशेखर कापड़ी, सचिव यूकेडी का कहना है कि राज्य आन्दोलन के दौरान लोगों का समर्थन जरुर मिला है, लेकिन चुनाव में पार्टी को जनादेश नहीं मिलता है. यूकेडी के वरिष्ठ नेता बीडी रतूडी का कहना है कि सत्ता हासिल करना पार्टी का लक्ष्य नहीं था, पार्टी का लक्ष्य था कि हर कीमत पर राज्य का गठन किया जा सकें. एक वजह यह भी रही पार्टी को आंदोलन में तो जनसमर्थन मिला बाद में नहीं.
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वरिष्ठ पत्रकार शंकर सिंह भाटिया का कहना है कि राज्य गठन के बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच सत्ता का जमकर संघर्ष हुआ और दोनों ही दल आर्थिक रुप से मजबूत दल है. यूकेडी 2002 और 2007 के चुनाव में जनता के विश्वास पर खरा उतरने में कामयाब नहीं हो सकी. धीरे धीरे पार्टी के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों ने पार्टी का दामन छोड़ दिया और पार्टी नेतृत्व के अभाव में यूकेडी अपनी सशक्त भूमिका नहीं बना सकी.

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First published: November 8, 2016, 1:42 PM IST
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