अटल आयुष्मान योजना को ऐसे पलीता लगा रहे उत्तराखंड के अस्पताल, प्रशासन ने नहीं की कोई बड़ी कार्रवाई

उत्तराखंड सरकार ने 23 लाख परिवारों को फायदा पहुंचाने की नीयत से सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना यानी अटल आयुष्मान योजना की शुरुआत की. लेकिन राज्य में ये स्कीम विवादों में घिरी रही. मरीज़ों के इलाज के नाम पर अस्पतालों और डाक्टरों ने जमकर फर्जीवाड़ा किया.

Deepankar Bhatt
Updated: July 6, 2019, 11:50 AM IST
अटल आयुष्मान योजना को ऐसे पलीता लगा रहे उत्तराखंड के अस्पताल, प्रशासन ने नहीं की कोई बड़ी कार्रवाई
अटल आयुष्मान योजना को ऐसे पलीता लगा रहे राज्य के अस्पताल
Deepankar Bhatt
Deepankar Bhatt
Updated: July 6, 2019, 11:50 AM IST
 

25 दिसंबर 2018 को उत्तराखंड सरकार ने सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना यानी अटल आयुष्मान योजना की शुरुआत की. योजना का मकसद 23 लाख परिवारों को फायदा पहुंचाना था, जिसके जरिए एक साल में एक परिवार को 5 लाख का इलाज मुफ्त मिलने की सुविधा थी. अटल आयुष्मान योजना को 6 महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, पर आम लोगों के इलाज से ज्यादा ये हेल्थ स्कीम विवादों में घिरी रही. मरीज़ों के इलाज के नाम पर अस्पतालों और डाक्टरों ने जमकर फर्जीवाड़ा किया. क्लेम के लिए मरीज़ों को ज्यादा दिन भर्ती दिखाया गया, अस्पतालों की क्षमता से ज्यादा मरीज़ों का इलाज किया गया. हद तो तब हो गई जब क्लेम के कागज़ों में ऐसे डाक्टरों से इलाज दिखाया गया है, जिनका उस मर्ज से कोई लेना देना ही नहीं है.

12 अस्पतालों को नोटिस
अटल आयुष्मान योजना में 4 जुलाई को काशीपुर के एम पी मेमोरियल अस्पताल को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. अस्पताल प्रशासन से पूछा गया है कि क्यों ना अस्पताल को अटल आयुष्मान स्कीम से हटा दिया जाए. इससे पहले भी योजना में फ्रॉड को लेकर 12 अस्पतालों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, हालांकि बाद में इनमें से सिर्फ 2 अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई हुई.

डॉक्टरों और अस्पतालों ने ऐसे किया फर्जीवाड़ा
काशीपुर के जिस एमपी मेमोरियल हॉस्पिटल को नोटिस भेजा गया. वहां अटल आयुष्मान योजना के नाम पर खूब फर्जीवाड़ा हुआ. जैसे 85 मामलों में मरीज जितने दिन भर्ती रहे उससे ज्यादा दिन के लिए उन्हें भर्ती दिखाया गया, ताकि क्लेम की बड़ी रकम अस्पताल के खाते में आ सके. 42 दिन ऐसे रहे जब अस्पताल के आईसीयू में क्षमता से ज्यादा मरीजों का इलाज किया गया. इससे बड़ी हैरानी की बात ये कि करीब 8 महीनों में कुल 1773 डाइलिसिस किए गए. और सभी मामलों में डॉक्टर संतोष श्रीवास्तव को दिखाया गया, जो ना तो नैफ्रोलॉजिस्ट हैं, ना ही एमडी हैं और ना ही डाइलिसिस के डॉक्टर हैं.

मरीज़ों की जान को खतरा, अस्पताल हो रहे मालामाल
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साफ है सबसे बड़ा खतरा मरीज की जान को है, और कमाई भी मरीज के नाम पर ही हो रही है. पर अबतक राज्य स्वास्थ्य अभिकरण की तरफ से कोई कड़ी कार्रवाई देखने को नहीं मिली है. मरीजों के इलाज के नाम पर हरिद्वार, देहरादून और ऊधमसिंहनगर जिले के कई अस्पताल अटल आयुष्मान योजना से मोटी कमाई कर रहे हैं. लेकिन इन तमाम चीज़ों के बावजूद शासन-प्रशासन की ओर से अभी तक कोई कार्रवाई न होना संदेहों को जन्म देता है.

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First published: July 6, 2019, 11:50 AM IST
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