उत्तराखंड में मानव तस्करी क्यों: FIR तक नहीं दर्ज होती यहां

Manish Kumar | News18India
Updated: September 17, 2017, 3:36 PM IST
उत्तराखंड में मानव तस्करी क्यों: FIR तक नहीं दर्ज होती यहां
प्रतीकात्मक तस्वीर
Manish Kumar | News18India
Updated: September 17, 2017, 3:36 PM IST
उत्तराखण्ड में मानव अंगों की तस्करी के खुलासे के बाद हड़कम्प मचा हुआ है. पुलिस को आशंका है कि किडनी निकाले जाने के जिस रैकेट का खुलासा किया गया है उसके तार विदशों से भी जुड़े हुए हैं.

किडनी रैकेट का खुलासा तो हो गया है लेकिन, इस कांड ने अपने पीछे कई सवाल छोड़ दिया है. मसलन, आखिर उत्तराखण्ड को इस काम के लिए क्यों चुना गया.

जवाब मुश्किल नहीं है. बहुत हद तक इस मामले में उत्तराखण्ड पुलिस और स्वास्थ्य महकमे की लापरवाही जिम्मेदार है. न्यूज़ 18 तीन ऐसे मामलों का खुलासा करने जा रहा है जो मानव तस्करी से जुड़े हैं लेकिन, पुलिस और स्वास्थ्य महकमे की लापरवाही से सभ4 मामलों पर पर्दा पड़ा हुआ है और आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं.

पहला मामला- झारखण्ड की दो नाबालिग बहनों के मामले में आरोपियों को बचाने की साजिश.

कुछ दिनों पहले ही झारखण्ड की एक नाबालिग लड़की को देहरादून से बरामद किया गया था. पूछताछ के बाद उसने जो खुलासा किया उसे सुनकर सभी दंग रह गए.

उसने बताया कि उसके पापा टिहरी के एक डॉक्टर दम्पत्ति डॉक्टर ललित जैन और डॉक्टर सुचेता जैन के यहां छोड़ आए थे. वह घर के सारे काम करती थी. उसी ने खुलासा किया कि उसकी बड़ी बहन अभी भी डॉक्टर दम्पत्ति के चंगुल में फंसी हुई है. इस खुलासे के बाद उसकी बहन को बरामद किया गया.

डॉक्टर दम्पत्ति से मुक्ति पाने के बाद दोनों बहनों ने बाल कल्याण समिति के सामने जो बयान दिया उसे सुनकर सबका कलेजा फट गया. दोनों बहनों ने बताया कि किस तरह डॉक्टर उनका यौन शोषण करते थे. दोनों ने समिति को दिए बयान में बताया कि जब वे नहाने जाया करती थीं, डॉक्टर जैन हमेशा उनके बाथरूम में घुस आते थे.

हैरान करने वाली बात तो ये है कि इस मामले में टिहरी पुलिस ने आरोपियों को बचाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी. जिन्हें सलाखों के पीछे होना चाहिए था वे डॉक्टर दम्पत्ति अब भी आजाद हैं.

हैरान करने वाली बात ये है कि इस गम्भीर मामले में पुलिस ने बहुत मामूली धाराओं में मामला दर्ज किया. यहां तक कि मानव तस्करी का मुकदमा भी दर्ज नहीं किया गया है और न ही पॉक्सो एक्ट के तहत ही मामला दर्ज किया गया है. लिहाजा पुलिस के रहमोकरम पर डॉक्टर दम्पत्ति आजाद हैं.

दूसरा मामला- देहरादून से बरामद दो नेपाली लड़कियों के मामले में एफआईआर तक नहीं.

लगभग तीन महीने पहले देहरादून स्थित ऑर्डिनेन्स फैक्ट्री के अफसर राजेश रायपा के घर से दो नेपाली लड़कियों को बरामद किया गया था. दोनों बहनों से बन्धुआ मजदूरी करायी जा रही थी.

बाल कल्याण समिति और पुलिस की छापेमारी में लड़कियों के साथ मारपीट के सबूत भी सामने आए थे. दोनों को पिथौरागढ़ के रास्ते नेपाल से लाया गया था. आपको हैरानी होगी कि इस अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी और बाल शोषण के मामले में आज कई महीने बीतने के बाद भी कोई एफआईआर तक दर्ज नहीं की गई है. आरोपी अफसर खुलेआम घूम रहा है.

तीसरा मामला- बंधुआ मजदूरी की शिकार असम की लड़की के मामले में भी एफआइआर नहीं.

असम की रहने वाली नाबालिग लड़की को पहले तो नोएडा में किसी अंकल के घर बंधुआ मजदूरी के लिए पहुंचाया गया फिर उसके रिश्तेदारों ने उसे नेशविला रोड में रहने वाले देहरादून के दूसरे अंकल के पास छोड़ दिया.

गैराज में सोने को मजबूर ये लड़की किसी तरह एक स्थानीय निवासी से मिली जिन्होंने उसे मसूरी के विधायक गणेश जोशी के पास भेज दिया. विधायक ने पुलिस को इत्तला दी तो पूरा मामला खुला.

पकड़ी गयी लड़की ने खुलासा किया कि दीपा और करन नाम के उसके रिश्तेदार असम से लड़कियों को लाने का काम करते हैं. उनके द्वारा बहला फुसलाकर लायी गई लड़कियां कई शहरों में आज भी बंधुआ मजदूरी कर रही हैं. बताने की जरूरत नहीं कि ये मामला भी मानव तस्करी का है लेकिन, देहरादून पुलिस की कार्रवाई इस मामले में भी संदिग्ध है.

 
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