उत्तराखंड पुलिस: मित्र होने के दावा खोखला, ये है हकीकत

यूं तो उत्तराखंड पुलिस किसी न किसी मामले को लेकर सुर्खियां में रहती है. उत्तराखंड की पुलिस लोगों के साथ मित्रता निभा रही है या फिर लोगों के साथ दोहरा मापदण्ड अपना रही है. पुलिस जवानों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के मकसद से साल 2008- 2009 में पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन किया गया. तब से लगातार पुलिस जवानों के खिलाफ शिकायत दर्ज हो रही है.

Ram anuj | ETV UP/Uttarakhand
Updated: October 8, 2016, 3:31 PM IST
उत्तराखंड पुलिस: मित्र होने के दावा खोखला, ये है हकीकत
DGP MA Ganapati
Ram anuj | ETV UP/Uttarakhand
Updated: October 8, 2016, 3:31 PM IST
यूं तो उत्तराखंड पुलिस किसी न किसी मामले को लेकर सुर्खियां में रहती है. उत्तराखंड की पुलिस लोगों के साथ मित्रता निभा रही है या फिर लोगों के साथ दोहरा मापदण्ड अपना रही है.

पुलिस जवानों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के मकसद से साल 2008- 2009 में पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन किया गया. तब से लगातार पुलिस जवानों के खिलाफ शिकायत दर्ज हो रही है.

प्राधिकरण की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में कुल 373 मामले दर्ज हुए, जिसमें 75 शिकायते ऊधमसिंहनगर की अकेले थी. पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा शिकायतें पुलिस जवानों के खिलाफ ऊधमसिंहनगर से दर्ज हो रही हैं. जबकि 2015 में 440 शिकायतें दर्ज हुई, जिसमें 93 शिकायतें ऊधमसिंहनगर की हैं.

वहीं 2016 में अब तक 303 मामले दर्ज हुए हैं . जिसमें ऊधमसिंहनगर के 79 मामले शामिल हैं. दूसरे नम्बर पर देहरादून और तीसरे नम्बर पर हरिद्वार जिला है, जहां पुलिस जवानों की कार्यप्रणाली के खिलाफ मामले दर्ज हो रहे हैं. जबकि बागेश्वर, उत्तरकाशी, चमोली जैसे जिलों में सबसे कम शिकायते दर्ज हो रही है.

प्राधिकरण के अध्यक्ष अजयसिंह नबियाल का कहना है कि जिन मामलों के बारे में फैसले होते है उनके बारे में पीएचक्यू को पत्र लिखा जाता है, वही राम सिंह मीणा, एडीजी प्रशासन का कहना है कि प्राधिकरण के मामलों की जांच होती है. फिर कार्रवाई भी की जाती है, जबकि शिकायत कर्ताओं का कहना है कि उन्हें इंसाफ के लिए साल भर भटकना पडता है.

दरअसल प्राधिकरण के लिए सरकार हर साल 1 करोड़ 20 लाख रुपये से अधिक खर्च कर रही है. रिकार्ड के मुताबिक एक मामले के निदान में प्राधिकरण के करीब 32 हजार रुपये खर्च हो रहे हैं. वही प्राधिकरण जब पुलिस जवानों के खिलाफ फैसला सुनाता है, तो कार्रवाई के लिए पीएचक्यू को पत्र भेजा जाता है. फिर पीएचक्यू स्तर से मामले की जांच होती है या तो पुलिस जवान बच जाते हैं या फिर कोर्ट की शरण लेते है.

2016 में कुल 17 पुलिस जवानों के खिलाफ प्राधिकरण ने फैसला सुनाया है. मगर 4 पुलिस कर्मियों के खिलाफ ही अभी तक कार्रवाई है. बाकी मामले लंबित है.
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वही शिकायतकर्ताओं का कहना है कि तारीख पर तारीख लगती रहती है. इंसाफ के लिए के लिए वे साल भर भटकते रहते हैं. अब पुलिस अधिकारियों को समझना होगा कि मित्र पुलिस होने का दावा आखिर अधिकारी किसके लिए करते हैं, पब्लिक के लिए या फिर किसी और के लिए.

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First published: October 8, 2016, 3:31 PM IST
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