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चैत्र के बजाय माघ में ही खिले बुरांश के फूल, जलवायु परिवर्तन बना कारण
Uttarkashi News in Hindi

Jagmohan Singh Chauhan | News18 Uttarakhand
Updated: January 16, 2019, 3:52 PM IST
चैत्र के बजाय माघ में ही खिले बुरांश के फूल, जलवायु परिवर्तन बना कारण
बुरांश का जूस हृदय रोगियों के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है.

जलवायु परिवर्तन और शीतकाल में देर से बारिश होने के चलते बुरांश का फूल समय से पहले जनवरी माह में ही खिलने लगा है.

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उत्तरकाशी में चैत्र माह में खिलने वाले उत्तराखंड के राज्य वृक्ष बुरांश के फूल इस बार माघ महीने में ही अपना सौंदर्य बिखेरने लगे हैं. जानकार और पर्यावरण प्रेमी इसका कारण्‍  जलवायु परिवर्तन को मान रहे हैं. इनका मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ही कई वनस्पति विलुप्ति के कगार पर हैं. बुरांश अमूमन समुद्र की सतह से पांच से आठ हजार फीट की ऊंचाई वाले भूभाग में होता है. यह चैत्र माह यानी मार्च से अप्रैल महीने में खिलता है. करीब 15 से 20 दिनों के अंदर फूल खिलने की प्रक्रिया संपन्न होती है. बुरांश का जूस हृदय रोगियों के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है. कुछ सालों से मौसम में परिवर्तन के कारण इस वनस्पति फूल की मात्रा में भारी कमी देखी जा रही है.

इस बारे में प्रो. पीएस परमार ने कहा कि इन फूलों के समय से पहले खिलने के पीछे जलवायु परिवर्तन ही सबसे बड़ी वजह है. हमारा पर्यावरण खराब हो रहा है. ईको सिस्टम में बदलाव आने के कारण ही इनमें समय से पहले फूल खिल रहे हैं. उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण ही ये एनडेंजर्ड स्पीशीज़ बनते जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि ऐसी कई सारी वनस्पतियां अब विलुप्ति के कगार पर हैं. अगर इन वनस्पतियों को अनुकूल तापमान और वातावरण नहीं मिलेगा, तब उनका जीवित रहना संभव नहीं हो पाएगा. जलवायु परिवर्तन सहित अन्य कारणों से ये वनस्पतियां विलुप्त हो जाएंगी.

बता दें कि जलवायु परिवर्तन और शीतकाल में देर से बारिश होने के चलते बुरांश का फूल समय से पहले जनवरी माह में ही खिलने लगा है. इस समय पर्यावरण का तापमान छह डिग्री सेल्सियस के हिसाब से बढ़ रहा है. मौसम में आ रहे बदलावों के कारण हमारी वनस्पतियां भी इससे प्रभावित हो रही हैं, जो एक चिंता का कारण है. इसका असर फसल चक्र पर पड़ने के साथ ही जीव-जंतुओं पर भी पड़ रहा है. पहाड़ी इलाकों में वनस्पतियां धीरे-धीरे विलुप्त होने लगी हैं. जरूरत है कि इन पर शोध कर इन्हें बचाया जाए.



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First published: January 16, 2019, 12:29 PM IST
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