पत्रकार पर हाथ उठाने वाले पहले नेता नहीं हैं उत्तराखंड विधायक चैंपियन

पहले भी भड़कते रहे हैं नेता, थप्पड़ भी मरा था कांसीराम ने लेकिन बुला कर धमकाने और पीटने की कोशिश करने वाले ‘चैंपियन’ ही हैं, नेताओं को खुद ही इस पर सोचना होगा

RajKumar Pandey | News18Hindi
Updated: June 14, 2019, 6:23 PM IST
पत्रकार पर हाथ उठाने वाले पहले नेता नहीं हैं उत्तराखंड विधायक चैंपियन
कांसीराम ने भी एक मौके पर पत्रकार को थप्पड़ मारा था
RajKumar Pandey
RajKumar Pandey | News18Hindi
Updated: June 14, 2019, 6:23 PM IST
उत्तराखंड के विधायक प्रणव चैंपियन पहले नेता नहीं हैं जिन्होंने पत्रकार पर हाथ उठाया. इससे पहले भी कई नेता, पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार कर चुके हैं. उन्हें पीट भी चुके हैं. अभी रेलगाड़ी के पटरी से उतरने के मामले की पड़ताल करने वाले पत्रकार की पिटाई का मामला चल ही रहा था कि न्यूज 18 के एक संवाददाता राजीव तिवारी पर चैंपियन ने हाथ उठा दिया. बीएसपी नेता कांसीराम भी एक संवाददाता को थप्पड़ मार चुके हैं. हां चैंपियन की हरकत और दूसरे नेताओं की घटना में ये फर्क जरूर है कि उत्तराखंड के इस विधायक ने बाकायदा राजीव को फोन करके बुलाया, धमकाया और फिर मारने के लिए हाथ भी उठाया.

पहले भी सवालों पर भड़कते रहे हैं नेता



पहले की ज्यादातर घटनाओं में ये हुआ कि पत्रकार के किसी सवाल से अचानक कोई भड़क गया और उलझ पड़ा. या फिर कांसीराम मामले में ये हुआ था कि पत्रकार उनकी प्रतिक्रिया चाहते थे. इससे मामले की शुरूआत हुई और कांसीराम ने थप्पड़ मार दिया. चैंपियन का मामला तो बिल्कुल अलग है. चैंपियन के बारे में राजीव तिवारी ने एक खबर की थी. खबर ये थी कि चैंपियन के काफिल में एक निजी वाहन चलता है जिस पर पुलिस लिखा है.

खबर से नाराज थे चैंपियन

पुलिस लिखे इस निजी वाहन को उस समय भी नहीं हटाया गया जब राज्यपाल उत्तराखंड सदन आने वाली थी. ये वाहन उत्तराखंड सदन में खड़ा था. उत्तराखंड सदन दिल्ली के जिस इलाके में पड़ता है उससे बिल्कुल सटा हुआ इलाका विदेशी दूतावासों का है. यानी वहां दूसरे देशों के राजदूत रहते हैं और उनके दफ्तर है. अगर ये दूतावास से सटा न भी होता तो दिल्ली में किसी निजी वाहन पर पुलिस लिख कर चलाना, एक गंभीर मामला है.

कानून बनाने वालों में है चैंपियन

गंभीर इस कारण से इस तरह के वाहन अगर चलाने की छूट दी जाएगी तो उसके क्या क्या नतीजे हो सकते हैं, हमने देखा है. फिर ये काम अगर कोई विधायक करता है तो निश्चित तौर पर इसे हल्क नहीं कहा जाएगा. विधायकों से उम्मीद की जाती है कि कानून बनाने वाला होने के कारण वे कानून का सम्मान करेंगे. लेकिन चैंपियन को क्या कहा जा सकता है.
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फोन करके बुलाया फिर धमकाया
रिपोर्टर राजीव तिवारी के मुताबिक उन्हें किसी का फोन आया कि चैंपियन जी उनसे मिलना चाहते है. वे जब उत्तराखंड सदन पहुंचे तो वहां कई हथियारबंद लोग थे. राजीव के पहुंचने के बाद चैंपियन ने अपनी पिस्तौल मंगाई. फिर तिवारी से कहा कि जो उनके खिलाफ खबर करता है वे उसे गोली मार देते हैं. उन्होंन खुद को राजा भी बताया.

अब भी राज परिवार की सोच

अब आजादी के सात दशक बाद भी अगर अपने आप को इस लोकतंत्र में कोई अपने को राजा समझ रहा है तो उसकी समझ पर ये एक बड़ा सवाल है. हालांकि मामले के मीडिया में आने के बाद चैंपियन की ओर से संवाददाता पर पैसे मांगने का आरोप लगाया जा रहा है. ये अपने आप में विचित्र हैं. फिर भी अगर वो पैसा मांग रहे थे तो कानून बनाने वाले को कानून अपने हाथ में लेने की क्या जरूरत थी.
बहरहाल, चाहे किसी सवाल से भड़क कर पत्रकार को थप्पड़ मारने का मुद्दा हो या फिर किसी कवरेज के दौरान पुलिस वालों की गुंडागर्दी का मसला हो या फिर इस तरह से बुला कर पत्रकार को धमकाने का मसला हो, सब किसी भी तरह से निंदनीय है. पत्रकार सूचना लेकर लोगों तक उसे पहुंचाता है. अपने लिए सूचनाए नहीं लेता. इस लिहाज से अगर कोई चाहे तो सूचना न दे. लेकिन उसे इससे हाथ उठाने और धमकाने का हक नहीं मिल जाता.

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