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PM ओली के खिलाफ जारी विरोध के बीच नेपाल में 32 लोगों ने संभाला दफ्तरों का कार्यभार

प्रधानमंत्री केपी ओली का हो रहा विरोध. (File pic)
प्रधानमंत्री केपी ओली का हो रहा विरोध. (File pic)

Nepal: सरकार द्वारा विभिन्न संवैधानिक संस्थानों में नियुक्त नए सदस्यों को पद व गोपनीयता की शपथ दिलाने के सरकार के कदम का विरोध करने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी के गुट ने गुरुवार को हड़ताल का फैसला किया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 4, 2021, 6:08 PM IST
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नई दिल्‍ली. नेपाल (Nepal) में जारी राजनीतिक अस्थिरता के बीच नेपाल के चीफ जस्टिस चोलेंद्र शमशेर राणा ने विभिन्‍न संवैधानिक आयोगों के प्रमुखों और सदस्‍यों के तौर पर 32 लोगों की नियुक्ति की थी. उनके इस कदम का कई राजनीतिक दलों ने विरोध किया. इस बीच बुधवार को चीफ जस्टिस ने इन सभी 32 लोगों का शपथ ग्रहण कराया. इस कार्यक्रम का उप राष्‍ट्रपति नंद किशोर पुन और कई अन्‍य राजनीतिज्ञों ने इस दौरान एक खास कार्यक्रम को बायकॉट भी किया.

अन्य लोगों के अलावा सांविधानिक परिषद की बैठक का स्‍पीकर अग्नि सपकोटा और नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा द्वारा बहिष्कार किया गया. जो विपक्ष के नेता के रूप में परिषद के सदस्य हैं. उन्‍होंने केपी ओली की ओर से बिना परामर्श के काउंसिल की बैठक को बुलाए जाने के फैसले पर असंतोष भी व्यक्त किया.

वहीं सरकार द्वारा विभिन्न संवैधानिक संस्थानों में नियुक्त नए सदस्यों को पद व गोपनीयता की शपथ दिलाने के सरकार के कदम का विरोध करने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी के गुट ने गुरुवार को हड़ताल का फैसला किया है.




प्रधानमंत्री केपी ओली की अध्‍यक्षता वाली सांविधानिक परिषद ने 15‍ दिसंबर, 2020 को विभिन्‍न कमीशंस में 38 लोगों की नियुक्ति का प्रस्‍ताव किया था. नियुक्‍त किए गए सभी लोगों ने बुधवार को अपने कार्यालयों का कार्यभार ग्रहण किया. इस सूची में पूर्व गृह सचिव प्रेम राय को शामिल किया गया है, जिन्हें अब कमीशन ऑफ इंवेस्टिगेश ऑन एब्‍यूज अथॉरिटी का चीफ कमिश्‍नर नियुक्त किया गया है. वह ओली के बेहद करीबी हैं.

पिछले साल 20 दिसंबर को नेपाल में राजनीतिक संकट की स्थिति उस समय उत्पन्न हो गई जब चीन समर्थक माने जाने वाले 68 वर्षीय ओली ने स्तब्ध करने वाला कदम उठाते हुए संसद को भंग करने की सिफारिश कर दी थी. उन्होंने यह कदम प्रचंड के साथ चल रहे सत्ता संघर्ष की वजह से उठाया. ओली द्वारा 275 सदस्यीय सदन को भंग करने के फैसले से नेपाल के कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े धड़े द्वारा विरोध शुरू हो गया जिसका नेतृत्व पार्टी के सह अध्यक्ष प्रचंड कर रहे हैं.
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