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भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक ने 3D प्रिंटिंग से तैयार की जीवंत त्वचा


Updated: November 5, 2019, 10:17 AM IST
भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक ने 3D प्रिंटिंग से तैयार की जीवंत त्वचा
3D_implants

भारतीय मूल के शोधकर्ता पंकज करांदे (Indian Researcher Pankaj Karande) अमेरिका के रेनसेलर पॉलिटेक्निक इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर (Assistant Professor) हैं.

  • Last Updated: November 5, 2019, 10:17 AM IST
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न्यूयॉर्क. भारतीय मूल (Person of Indian Origin) के एक वैज्ञानिक ने ब्लड वैसेल (Blood Vessel) वाली त्वचा को 3D प्रिंटिंग (3D Print living skin) से विकसित करने में सफलता हासिल की है. भारतीय मूल के शोधकर्ता पंकज करांदे (Indian Researcher Pankaj Karande) अमेरिका के रेनसेलर पॉलिटेक्निक इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर (Assistant Professor) हैं. पंकज करांदे के नेतृत्व वाली टीम द्वारा विकसित यह त्वचा सजीव त्वचा के बेहद करीब है. इसे बॉयोप्रिंटिंग (Bio Printing) के क्षेत्र में महत्वपूर्ण खोज मानी जा रही है.

अपनी इस खोज पर पंकज करांदे ने कहा कि फिलहाल बाजार में उपलब्ध क्लिनिकल उत्पाद भरने के बाद गिर जाते हैं. इस तरह के उत्पाद शरीर पर अलग से किसी फैंसी एड की तरह दिखाई देते हैं. यह शरीर के साथ जुड़ नही सकते. लेकिन इस नई खोज में ब्लड वैसेल्स होने के चलते इसका शरीर के साथ मिलाप बेहद नौसर्गिक होगा.

टिश्यू इंजीनियरिंग पार्ट ए में छपे इस शोध के मुताबिक मौजूद स्किल ग्राफ्ट में  लगाने पर यह शरीर में मौजूद रक्त की मदद से पोषक तत्व का प्रवाह त्वचा में नहीं हो पाता. जबकि करांदे के 3D त्वचा में रक्त का प्रवाह संभव है. जिससे यह जीवंत रह सकेगी. याले स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं की एक टीम ने जब इस संरचना को एक विशेष प्रकार के चूहों में लगाया तो 3डी प्रिंट वाली त्वचा की वाहिकाएं संवेदी हो गई थीं और चूहों की कोशिकाओं से जुड़ने लगी थीं.

3Dskin
यह शरीर के साथ जुड़ नही सकते. लेकिन इस नई खोज में ब्लड वैसेल्स होने के चलते इसका शरीर के साथ मिलाप बेहद नौसर्गिक होगा.


पंकज करांदे ने दावा किया कि यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी बनाई त्वचा में शरीर की रक्त कोषिकाओं से पोषक तत्व आने लगे थे. यह उस त्वचा को जीवित रखने में मदद करता है.

करांदे ने बताया कि CRISPR-जीन संपादन तकनीक का इस्तेमाल करके दानदाताओं की कोशिकाओं के साथ एडिटिंग की दक्षता हासिल करने की जरुरत है. ऐसा होने पर रक्त वाहिकाएं होकर रोगी के शरीर में स्वीकार्य हो सकेंगी. करांदे ने कहा कि उनकी टीम उस स्तर पर पहुंचने के करीब है.

उन्होंने कहा कि आग से झुलसे रोगियों में तंत्रिकाएं और वाहिकाएं खत्म हो जाने जैसी चुनौतियों के समाधान के लिए अधिक काम किए जाने की जरूरत है.
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First published: November 5, 2019, 10:03 AM IST
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