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Climate change: 1980 के बाद दो गुनी हो गई 50 डिग्री तापमान वाले दिनों की संख्या, पूरी मानव जाति पर बढ़ा खतरा!

जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रहा है अधिकतम औसत तापमान. (File pic)

Climate change: जलवायु वैज्ञानिकों को डर है कि जब तक जीवाश्म ईंधन के उत्सर्जन को सीमित नहीं रखा जाता है, तब तक 50 डिग्री सेल्सियस तापमान दुनिया के और हिस्सों में भी दर्ज किया जा सकता है.

  • News18Hindi
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    नई दिल्‍ली. देश-दुनिया में विभिन्‍न स्‍तर पर वैश्विक जलवायु संकट (Climate change) देखा जा सकता है. इसकी कठोर वास्तविकताओं को दर्शाने वाले एक विश्लेषण में दावा किया गया है कि एक साल में अत्यधिक गर्म दिनों की संख्या (जब तापमान 50 डिग्री सेल्सियस (50 Degree Celsius) से अधिक हो जाता है) 1980 के दशक से दुनिया भर में दोगुनी हो गई है. जलवायु से जुड़े अध्ययन (Climate change) में कहा गया है कि जिन दिनों में पारा 50 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है, उनकी संख्या 1980 के बाद से हर दशक में लगातार बढ़ रही है.

    बीबीसी की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 1980 से 2009 के बीच तापमान औसतन 50 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष 14 दिनों के ऊपर चला गया है. लेकिन 2010 और 2019 के बीच यह संख्या 26 दिनों तक बढ़ गई थी. इसके अलावा इसी समयावधि के दौरान 45 डिग्री सेल्सियस के तापमान में भी तेज उछाल देखा गया है, जो औसतन प्रति वर्ष दो हफ्ते अतिरिक्त दर्ज किया गया है.

    पश्चिम एशियाई क्षेत्रों में 50 डिग्री सेल्सियस के ऊपर तापमान पहुंचना आम है, खासकर लंबी गर्मियों के दौरान. लेकिन जलवायु (Climate change) वैज्ञानिकों ने गौर किया कि इस गर्मी में कनाडा और इटली जैसे दुनिया के अधिक समशीतोष्ण भागों में लगभग 50 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया. इटली में रिकॉर्ड स्तर पर तापमान 48.8 डिग्री सेल्सियस और कनाडा में पारा 49.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया.

    जलवायु वैज्ञानिकों को डर है कि जब तक जीवाश्म ईंधन के उत्सर्जन को सीमित नहीं रखा जाता है, तब तक खतरनाक 50 डिग्री सेल्सियस तापमान दुनिया के और हिस्सों में भी दर्ज किया जा सकता है. अगर ग्रह के अधिक से अधिक समशीतोष्ण भागों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ जाता है, तो पूरी मानव जाति को अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

    ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ जियोग्राफी एंड एनवायरनमेंट के जलवायु शोधकर्ता डॉ. सिहान ली का कहना है, ‘हमें जल्दी से इस संबंध में कदम उठाने की जरूरत है. हम जीवाश्म ईंधन के उत्सर्जन में जितनी तेजी से कटौती करेंगे, हम सभी के लिए उतना ही बेहतर होगा.’ उन्‍होंने आगे कहा, ‘लगातार उत्सर्जन और निर्णायक कदमों के प्रयासों की कमी के साथ न केवल अत्यधिक गर्मी की घटनाएं गंभीर और नियमित हो जाएंगी, बल्कि आपातकालीन प्रतिक्रिया और इससे उबरना अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा.’

    जलवायु वैज्ञानिकों को डर है कि जीवाश्म ईंधन के बेलगाम जलने से पूरी दुनिया पहले की तुलना में तेजी से गर्म हो रही है, जिससे भविष्य में अत्यधिक तापमान की आशंका बढ़ जाएगी. विश्लेषण बताता है कि अत्यधिक तापमान वनस्पतियों और जीवों के लिए खतरनाक हो सकता है.

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