न्यूयॉर्क के एक डॉक्टर की जुबानी-  कोरोना वायरस के कहर की कहानी

बिहार में शुक्रवार को 304 
कोरोना संदिग्धों की पहचान हुई.
बिहार में शुक्रवार को 304 कोरोना संदिग्धों की पहचान हुई.

न्यूयॉर्क सिटी के एक हॉस्पिटल में बतौर इमरजेंसी मेडिसिन फिज़िशियन डॉ कामिनी दुबे बताती हैं कि एक-एक सांस के लिए ज़िंदगी की जंग लड़ रहे वेंटिलेंटर्स पर पड़े मरीज खामोशी से मौत की तरफ अकेले बढ़ रहे हैं

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 27, 2020, 11:51 PM IST
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कोरना वायरस के संक्रमण से दुनिया में कोहराम मचा हुआ है. चीन के वुहान, इटली के लॉम्बार्डी, स्पेन के मैड्रिड, ब्रिटेन के लंदन की ही तरह अमेरिका के न्यूयॉर्क में हाहाकार मचा हुआ है. अमेरिका में कोरोना वायरस के संक्रमण का मुख्य केंद्र बन कर न्यूयॉर्क उभरा है. यहां 350 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. हालात ये है कि न्यूयॉर्क के अस्पतालों में वेंटिलेंटर्स की कमी हो गई है.

एसोसिएटेड प्रेस में छपी एक रिपोर्ट ने न्यूयॉर्क के एक अस्पताल में कोरोनावायरस से पैदा हुए हालात पर एक डॉक्टर की कहानी बयां की है. न्यूयॉर्क सिटी के एक हॉस्पिटल में बतौर इमरजेंसी मेडिसिन फिज़िशियन डॉ कामिनी दुबे बताती हैं कि एक-एक सांस के लिए ज़िंदगी की जंग लड़ रहे वेंटिलेंटर्स पर पड़े मरीज खामोशी से मौत की तरफ अकेले बढ़ रहे हैं. दरअसल, कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए बने सख्त प्रोटोकोल की वजह से तीमारदारों को मरीजों से मिलने की इजाज़त नहीं है. ऐसे में एक नितांत अकेलेपन में कोरोनावायरस से गंभीर रूप से संक्रमित मरीज़ अपनी मौत का इंतज़ार कर रहा होता है.

डॉ कामिनी दुबे बताती हैं कि अक्सर ऐसा होता है कि कोई मरीज़ मृत्युशैय्या पर होता है और अकेले मर रहा होता है और उस वक्त उसके परिवारजनों की तकलीफ देखना बहुत पीड़ादायक होता है. यहां तक कि फोन पर उनसे बात करने के दौरान उनकी सिसकियां सुनकर कई बार रोना भी आ जाता है.



न्यूयॉर्क सिटी के अस्तपतालों में एक तरफ मौत का तांडव तो दूसरी तरफ सिसकियों के शोर में एक डॉक्टर के भीतर की चीखें भी ख़ामोश हो जाती हैं. डॉ कामिनी दुबे कहती हैं कि ‘बहुत सारे लोग अकेले मर रहे हैं और उनके आखिरी वक्त में उनके पास कोई अपना नहीं है. ये देखना बेहद ही डरावना है.’
किसी भी डॉक्टर को अपनी ज़िंदगी में कभी न कभी आपातकाल का सामना करना होता है. डॉक्टरों को मुश्किल परिस्थितियों से निपटने के लिए मानसिक तौर पर मजबूत बनाया भी जाता है. इसके बावजूद कोरोनावायरस के कहर से दुनियाभर के डॉक्टर बिना प्रभावित हुए नहीं रह सके हैं.

वो कहती हैं कि उन्होंने इस तरह का भावनात्मक और शारीरिक दबाव जीवन में कभी इस कदर नहीं महसूस किया और न ही इतनी गहराई से कभी दुखी हुईं. उनका अस्पताल में टूटती बीमारों की भीड़ और मरने वाले मरीजों की तादाद को देखने का अनुभव पहला है जो कि बेहद डरावना है.

डॉ कामिनी दुबे भविष्य की उस स्थिति को सोच कर आशंकित हो जाती हैं कि जब डॉक्टरों को ही मरीज के इलाज और मरीज को वेंटिलेटर देने का फैसला करना होगा. वो ये सोचती हैं कि किस मरीज़ को वेंटिलेटर दिया जाए या किसे नहीं इसका फैसला बड़ा मुश्किल इम्तिहान होगा. दरअसल जिस तरह से न्यूयॉर्क में संक्रमित मरीज़ों की सुनामी आ रही है उसे देखकर बड़ा सवाल ये है कि उनके इलाज के लिए जरूरी मेडिकल संसाधन कहां से आएंगे?

हर रात ऐसे ही सवालों के साथ डॉ कामिनी दुबे घर लौटती हैं और उस दिन का शुक्रिया भी करती हैं कि अब तक ऐसी नौबत नहीं आई कि उन्हें मरीजों के बीच में किसी एक मरीज के लिए वेंटिलेटर का फैसला करना पड़ा. लेकिन वो ये भी मानती हैं कि वो दिन ज्यादा दूर नहीं हैं और हम उनके करीब पहुंच रहे हैं.

मरीजों की ज़िंदगी बचाने के लिए अपनी ज़िंदगी दांव पर लगाने की ही वजह से डॉक्टरों को कभी फरिश्ता तो कभी देवता कभी भगवान कहा जाता है. कोरोनावायरस के संक्रमण से बचाने वाले डॉक्टरों को भी संक्रमण से बचने के लिए सुरक्षा-कवच की जरूरत होती है ताकि वो इसके शिकार न हो सकें. डॉ कामिनी दुबे कहती हैं कि वो अस्पताल में मरीजों को देखने के लिए ये सोच कर नहीं जाती हैं कि वो शहीद होने जा रही हैं. वो कहती हैं कि ये एक गंभीर संकट है जिसमें हम उतरे हैं और हमें अपनी सुरक्षा का पूरा अधिकार हैं क्योंकि हम जंग के मैदान में नहीं हैं और न ही रणभूमि में हैं.

कोरोनावायरस के संक्रमण से मौत की करवट बदलते मरीजों को बचाने की जद्दोजहद में जुटे डॉक्टर एक अंतरद्वन्द्व से भी जूझ रहे होते हैं. दुनिया भले ही उन्हें भगवान का दर्जा दे लेकिन भीतर से वो भी इंसान ही होते हैं और उनके लिए भी किसी मरते हुए मरीज़ को देखना उतना ही दर्दनाक होता है जितना किसी परिजन के लिए.

डॉ कामिनी को ये उम्मीद है कि हालातों से सीखते हुए आम जनता तमाम विशेषज्ञों की अपील सुने और कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए वो सारे एहतियाती कदम उठाए चाहे जो संक्रमण को रोकने के लिए जरूरी हैं.
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