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इंसान में पहली बार धड़केगा सुअर का दिल, इस ट्रांसप्‍लांट से बढ़ी कई संभावनाएं

इंसान में पहली बार धड़केगा सुअर का दिल, इस ट्रांसप्‍लांट से बढ़ी कई संभावनाएं

मेरीलैंड के निवासी 57 वर्षीय डेविड बैनेट को हार्ट ट्रांसप्‍लांट के जरिए सुअर का दिल लगाया गया है.

मेरीलैंड के निवासी 57 वर्षीय डेविड बैनेट को हार्ट ट्रांसप्‍लांट के जरिए सुअर का दिल लगाया गया है.

अमेरिका (America) के शल्य चिकित्सकों ने एक इंसान में सुअर का दिल लगा कर चिकित्सा के इतिहास में एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल कर ली है. इस सफलता ने जिंदगी के लिए नए आयाम खोलने की संभावनाओं को फिर से जीवित कर दिया है.

अमेरिका (America) के शल्य चिकित्सकों ने एक इंसान में सुअर का दिल लगा कर चिकित्सा के इतिहास में एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल कर ली है. इस सफलता को उन लाखों लोगों की जिंदगी के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है जो एक स्वस्थ अंग मिलने के लिए लंबी कतार में लगे अपनी जिंदगी को बचाने की दुआ कर रहे हैं. इस सफलता ने जिंदगी के लिए नए आयाम खोलने की संभावनाओं को फिर से जीवित कर दिया है. इस सफलता के साथ ही हमारी पुराण कथाओं पर भी फिर से चर्चा शुरू हो गई है जिसमें भगवान गणेश को हाथी का सिर लगने का जिक्र आता है. बहरहाल इस हालिया चिकित्सा ने भले ही पुरातन से सीख ली हो या नहीं ली हो, लेकिन इससे यह तो साबित हो गया है कि इंसान का शरीर जानवरों के अंगों को भी स्वीकार कर लेता है.

किसे मिला सुअर का दिल
इस बेहद आधुनिक और अब तक ना सोची गई शल्य चिकित्सा के बाद मेरीलैंड के निवासी 57 वर्षीय डेविड बैनेट को यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड स्कूल ऑफ मेडिसिन में दिल मिला. यह चिकित्सा तब की गई जब उनकी जिंदगी को बचाने के सारे विकल्प खत्म हो चुके थे.

रिपोर्ट बताती हैं कि जब बैनेट को इंसान के दिल का विकल्प नहीं मिल सका, ऐसे में मरीज की सेहत को देखते हुए इस तरह का फैसला लिया जाता है. अपनी शल्य चिकित्सा के दूसरे दिन उन्होंने कहा कि मेरे सामने दो ही विकल्प थे या तो ऑपरेशन करवा लूं या मर जाऊं और मैं जीना चाहता हूं, मैं जानता था कि यह अंधेरे में तीर चलाने जैसा है, लेकिन मेरे पास इसके अलावा कोई चारा ही नहीं था. इस अंग प्रत्यारोपण से साबित हुआ कि अनुवांशिक रूप से संशोधित जानवर का दिल, इंसानी शरीर द्वारा तत्काल दी गई अस्वीकृति के बिना इंसानी दिल की ही तरह काम कर सकता है. यह बात यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड स्कूल ऑफ मेडिसिन में ऑपरेशन करने वाले प्रोफेसर ने कही.

मरीज के अब क्या हाल हैं
शल्य चिकित्सा या ऑपरेशन के तीन दिन के बाद अस्पताल का कहना है कि बैनेट का शरीर ठीक काम कर रहा है हालांकि अभी ऑपरेशन के बारे में कुछ भी कहना या नतीजा निकालना जल्दबाजी होगी. डॉक्टर का कहना है कि उन पर बारीक नजर रखी जा रही है कि प्रत्यारोपण के बाद नया अंग कैसे काम कर रहा है. ऑपरेशन से पहले बैनेट ने कई महीने दिल-फेफड़ा बाइपास मशीन के साथ गुजारे थे. लेकिन डॉक्टर बताते हैं कि अब वह खुद की दम पर सांस ले पा रहा है, हालांकि उसे अभी भी डिवाइस के साथ जोड़ रखा है ताकि प्रत्यारोपित दिल पर एकदम से ज्यादा जोर ना पड़े. डॉक्टर का कहना है कि आने वाले कुछ महीने काफी अहम होंगे. डॉ. बार्टले पी ग्रिफिथ जिन्होंने ऑपरेशन करके बैनेट के शरीर में सुअर का दिल प्रत्यारोपित किया, उनका कहना है कि अभी हमें बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है, लेकिन इस तरह के पहले ऑपरेशन ने भविष्य में उम्मीद का एक नया दरवाजा ज़रूर खोल दिया है.

इस तरह का प्रत्यारोपण किस तरह मददगार होगा
जानवर के अंगों का प्रत्यारोपण या ग्राफ्टिग, जिसे जीनोट्रांसप्लांटेशन के तौर पर जाना जाता है, इस पर आधुनिक चिकित्सा कई दशकों से काम कर रही है, लेकिन विशेषज्ञों ने इम्यून सिस्टम द्वारा किसी बाहरी अंग को अस्वीकार करने को एक बड़ी चुनौती के तौर पर पाया था जिसका परिणाम मरीजों की जिंदगी के अंत के तौर पर सामने आता था. UMSOM का कहना था कि जीनोट्रांसप्लांटेशन को 1984 में स्टेफनी फे ब्यूक्लेयर जिसे बेबी फे के नाम से जाना जाता है, चर्चित मामले के बाद लगभग छोड़ दिया गया था. कैलिफोर्निया में बेबी फे एक घातक दिल की बीमारी के साथ पैदा हुई थी. उस दौरान नवजात को एक बबून का दिल प्रत्यारोपित किया गया था, लेकिन इम्यून सिस्टम के अस्वीकार करने के बाद कुछ ही महीनों में बच्चे की मौत हो गई थी.

रिपोर्ट बताती हैं कि घावों के इलाज के लिए विभिन्न जानवरों की त्वचा के ग्राफ्ट के साथ सतह को ठीक करने का काम तो वर्ष 1800 के पहले दशक से ही किया जा रहा है, लेकिन जटिल अंगों के प्रत्यारोपण की सफलता को लेकर हमेशा परेशानी आती रही है, हालांकि सुअर के दिल के वॉल्व का उपयोग कई सालों से इंसानों के वॉल्व की जगह इस्तेमाल होता रहा है. लेकिन अंग प्रत्यारोपण में कभी सफलता नहीं मिल सकी है. इससे पहले 1960 में भी एक बार 13 लोगों को चिंपैजी की किडनी प्रत्यारोपित की गई थी, लेकिन इनमें से सभी की कुछ ही हफ्तों में मौत हो गई थी. बस एक ही मरीज अतिरिक्त 9 महीने तक जीवित रह पाया था.

गौरतलब है कि हर साल अकेले अमेरिका में 6000 मरीज अंग प्रत्यारोपण की लंबी कतार की वजह से मृत्यु के शिकार हो जाते हैं. दुनिया भर में यह आंकड़ा लाखों में होगा. इस अंग प्रत्यारोपण की सफलता उसी कतार को कम करने की एक उम्मीद जगाती है.

कैसे हुई शल्य चिकित्सा संभव
प्रत्यारोपित दिल को सुअर के शरीर में अनुवांशिक तौर पर संशोधित किया गया था, इस तरह से वैज्ञानिकों ने उन तीन जीन्स को हटा दिया था जिन्हें इंसानी शरीर सुअर का शरीर का मानकर अस्वीकार कर देता था. इसके साथ ही एक जीन वह था जो सुअर के दिल के ऊत्तकी अत्यधिक वृद्धि के लिए जिम्मेदार होता है. इसके साथ ही 6 मानव जीन्स जिससे इंसानी शरीर बाहरी अंग को स्वीकार करे, उन्हें भी सुअर के जीनोम में डाला गया. कुल मिलाकर अमेरिका की बायोटेक फर्म रेविविकोर ने सुअर में कुल 10 अनूठे जीन को संपादित किया. रिपोर्ट बताती हैं कि ऑपरेशन के दिन चिकित्सा करने वाले दल ने सुअर के दिल को एक पर्फ्यूजन उपकरण में रखा जिससे ऑपरेशन के दौरान वह तैयार रहे. अनुवांशिक बदलावों के अलावा बैनेट को भी प्रायोगिक स्तर पर एक एंटी रिजेक्शन दवा दी गई थी. हालांकि चिकित्सकों का कहना है कि अभी कुछ भी कहना जल्दी है. वक्त के साथ साथ नतीजों की जानकारी मिल पाएगी.

Tags: America, Organ transplant

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