रॉबर्ट मुगाबे के साथ एक युग का हुआ अंत, मुक्तिदाता के तौर पर शुरू हुई उनकी यात्रा तानाशाह के रूप में हुई खत्‍म

सिंगापुर में 95 वर्ष की उम्र में आज मुगाबे का निधन हो गया. जिम्‍बॉब्‍वे की आजादी का युद्ध लड़ने के कारण उन्‍हें मुक्तिदाता के तौर पर पहचाना गया. आखिरी समय में उन्‍हें सत्‍ता के लिए व्‍याकुल बेकाबू शासक करार दे दिया गया. उन्‍हें नवंबर, 2017 में उनके ही सशस्‍त्र बलों ने कर दिया था सत्‍ता से बाहर.

News18Hindi
Updated: September 6, 2019, 3:45 PM IST
रॉबर्ट मुगाबे के साथ एक युग का हुआ अंत, मुक्तिदाता के तौर पर शुरू हुई उनकी यात्रा तानाशाह के रूप में हुई खत्‍म
जिम्‍बॉब्‍वे के पूर्व राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे का 95 साल की उम्र में शुक्रवार को सिंगापुर में निधन हो गया.
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Updated: September 6, 2019, 3:45 PM IST
हरारे.वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे. जिम्बॉब्‍वे के मौजूदा राष्‍ट्रपति इमरसन म्‍गांगवा ने दो हफ्त पहले कैबिनेट मीटिंग में कहा था कि अब डॉक्‍टरों ने उनका इलाज बंद कर दिया है. मुगाबे 1980 से 1987 तक जिम्‍बॉब्‍वे प्रधानमंत्री (Prime Minister) और 1987 से 2017 तक राष्ट्रपति (President) रहे थे. उन्होंने 37 साल तक जिम्बॉब्वे का नेतृत्व किया. 2017 में उन्‍हीं की सेना (Army) ने उन्‍हें सत्‍ता से बेदखल कर दिया था. इसके बाद सेना ने उन्‍हें सशर्त जिम्‍बॉब्‍वे में रहने देने का अभयदान दिया था.

जिम्‍बॉब्‍वे के मुक्तिदाता के तौर पर मिली लोगों की प्रशंसा
जिम्‍बॉब्‍वे के रॉबर्ट मुगाबे जब पहली बार सत्‍ता में आए थे तो उन्‍हें मुक्तिदाता के तौर पर लोगों की प्रशंसा मिली. उन्‍होंने एक सदी तक श्‍वेत औपनिवेशक शासन द्वारा नस्‍लीय आधार पर बंटे हुए देश के लोगों के बीच फिर सामन्‍जस्‍य स्‍थापित कराया. इसके करीब चार दशक बाद जिम्‍बॉब्‍वे के नागरिकों के साथ ही कई देशों ने इन्‍हीं मुगाबे को सत्‍ता के लिए पागल बेकाबू शासक करार दे दिया. लोगों ने कहा कि मुगाबे सत्‍ता में बने रहने के लिए हत्‍यारों को खुला छोड़ सकते हैं, चुनावों में धांधली कर सकते हैं और अर्थव्‍यवस्‍था को बर्बाद कर सकते हैं.

आखिर तक स्‍वीकार नहीं किया सत्‍ता से निष्‍कासन

आखिर में उनके अपने सशस्‍त्र बलों ने ही नवंबर, 2017 में उन्‍हें सत्‍ता से बेदखल कर दिया. कुछ ने कहा कि उन्‍होंने आखिर तक अपनी दृढ़ता दिखाई. वहीं, कुछ ने कहा कि उन्‍होंने अंत तक हठधर्मिता दिखाई. उन्‍होंने जिम्‍बॉब्‍बे की संसद में अपने खिलाफ अभियोग चलाए जाने तक सत्‍ता से अपने निष्‍कासन को स्‍वीकार नहीं किया. महज 1.3 करोड़ आबादी वाले देश में मुगाबे के इस्‍तीफे पर जबरदस्‍त जश्‍न का माहौल था. मुगाबे के मुताबिक, उनके खिलाफ की गई कार्रवाई असंवैधानिक और प्रताड़ित करने वाली थी. उन्‍होंने आरोप लगया कि उन्‍हें उनकी पार्टी और देश के लोगों ने धोखा देकर अकेले छोड़ दिया था.

मुगाबे के मन में उन्‍हें सत्‍ता से बेदखल करने के तरीकों को लेकर बहुत ज्‍यादा कड़वाहट थी.


जीवन का आखिरी वक्‍त सिंगापुर और हरारे के बीच बीता
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मुगाबे शेष जीवन में सिंगापुर और हरारे के बीच भागते रहे. बता दें कि सिंगापुर में उनका इलाज चल रहा था. उनके मन में खुद को सत्‍ता से बेदखल करने के तरीकों को लेकर बहुत ज्‍यादा कड़वाहट थी. जुलाई, 2018 में पहली बार उनके बिना चुनाव हुए. उस दौरान उन्‍होंने पत्रकारों से कहा था कि वह विपक्षी दल के पक्ष में मतदान करेंगे. इससे कुछ महीने पहले तक कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता था. ब्रिटिश हुकूमत से आजादी के लिए सात साल चले युद्ध के बाद मुगाबे 1980 में सत्‍ता में आए थे.

श्‍वेत शासन का विरोध करने पर जेल में डाल दिए गए मुगाबे
मुगाबे का जन्‍म 21 फरवरी, 1924 को हरारे के नजदीक एक रोमन कैथोलिक मिशन में हुआ था. उन्‍हें शुरुआती शिक्षा पादरियों ने दी थी. इसके बाद उन्‍होंने प्राइमरी स्‍कूल टीचर के तौर पर काम किया. इसके बाद उन्‍होंने अफ्रीकी राष्‍ट्रवाद के लिए उपजाऊ दक्षिण अफ्रीका की फोर्ट हारे यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया. उन्‍होंने 1960 में राजनीति में कदम रखा. इसके चार साल बाद उन्‍हें श्‍वेत शासन का विरोध करने पर एक दशक के लिए जेल में डाल दिया गया. मुगाबे ने 1966 में बेटे की मलेरिया से मौत के बाद अंतिम संस्‍कार में जाने के लिए मिली पैरोल से इनकार कर दिया था.

जिम्‍बॉब्‍वे अफ्रीकन नेशनल लिब्रेशन आर्मी के शीर्ष तक पहुंचे
जेल से छूटने के बाद वह जिम्‍बॉब्‍वे अफ्रीकन नेशनल लिब्रेशन आर्मी के शीर्ष तक पहुंचे. उन्‍हें सात डिग्रियों के कारण थिकिंग मैंस गुरिल्‍ला के तौर पर पहचान मिली. इनमें तीन डिग्रियां उन्‍होंने जेल में रहते हासिल की थीं. बाद में उन्‍होंने अपने राजनीतिक दुश्‍मनों को जड़ से मिटा दिया. इसे उनकी हिंसा में डिग्री के तौर पर माना गया. 1980 में युद्ध खत्‍म होने के बाद मुगाबे को देश का पहला अश्‍वेत प्रधानमंत्री चुना गया. हरारे में हुए आजादी के जश्‍न में तंजानिया के राष्‍ट्रपति जुलियस न्‍यरेरे ने कहा था कि आप अफ्रीका के हीरे हैं. इसे नष्‍ट मत होने दीजिएगा.

शुरुआत में श्‍वेत-अश्‍वेत नागरिकों के बीच बनाया सामन्‍जस्‍य
मुगाबे ने शुरुआत में पुरानी कड़वाहट को भुलाने का रास्‍ता अपनाया. उन्‍होंने श्‍वेत और अश्‍वेत नागरिकों के बीच सामन्‍जस्‍य बनाया. उन्‍होंने श्‍वेत अल्‍पसंख्‍यक नेता इयान स्मिथ को जिम्‍बॉब्‍वे के अपने फार्म में रहने की अनुमति दी. साथ ही उनकी पेंशन भी जारी रखी गई. शुरुआती दौर में उन्‍होंने सड़क और बांध निर्माण पर पूंजी खर्च की. साथ ही जिम्‍बॉब्‍वे के अश्‍वेत नागरिकों के लिए जमकर स्‍कूल खुलवाए. 80 के दशक का मध्‍य आते-आते जिम्‍बॉब्‍वे में श्‍वेत-अश्‍वेत के बीच का तनाव काफी हद तक कम हो गया था.

मॉर्गन स्‍वानगिरई से राष्‍ट्रपति चुनाव हारने के बाद मुगाबे ने सत्‍ता में बने रहने के लिए हिंसा का सहारा लिया.


महंगाई में डूबे लोग 2008 में स्‍वानगिरई का समर्थन लगे
2008 में देश की अर्थव्‍यवस्‍था अपने सबसे खराब दौर में पहुंच गई. इस दौरान महंगाई में डूबे लोगों ने पश्चिमी देशों से समर्थित पूर्व केंद्रीय नेता मॉर्गन स्‍वानगिरई (Morgan Tsvangirai) का समर्थन करना शुरू कर दिया. राष्‍ट्रपति चुनाव में हारने के बाद मुगाबे ने सत्‍ता में बने रहने के लिए हिंसा का सहारा लिया. मुगाबे के सशस्‍त्र बलों ने स्‍वानगिरई के समर्थकों की हत्‍या करनी शुरू कर दी. साथ सशस्‍त्र बलों ने स्‍वानगिरई को सत्‍ता से दूर रहने के लिए मजबूर किया.

'हम एकदूसरे के खिलाफ लड़े, लेकिन यह इतना भी बुरा नहीं था'
जिम्‍बॉब्‍वे के दक्षिणी देश साउथ अफ्रीका ने दोनों नेताओं के बीच समझौता कराया. इसके बाद सेना, पुलिस और सीक्रेट सर्विस पर नियंत्रण के कारण सत्‍ता पर मुगाबे की पकड़ मजबूती से बनी रही. जैसे-जैसे मुगाबे की उम्र बढ़ती गई और उन्‍हें कैंसर होने की अफवाह फैलती गई, उनकी स्‍वानगिरई के प्रति शत्रुता भी कम होती चली गई. इसके बाद दोनों नेता अच्‍छे माहौल में साप्‍ताहिक बैठक करने लगे. 2013 के चुनावों की पूर्व संध्‍या पर मुगाबे ने उन्‍हें तानाशाह माने जाने की बातों को खारिज किया. उन्‍होंने कहा कि हम एकदूसरे के खिलाफ खड़े रहे, लेकिन यह पहले जितना बुरा नहीं था.

मुगाबे की प्रतिद्वंद्वियों से निपटने की सोच के आलोचक भी थे कायल
स्‍वानगिरई के समर्थकों मुताबिक, मुगाबे जिस समय ये सभी बातें कर रहे थे, ठीक उसी समय उनके समर्थक उन्‍हें चुनाव में जिताने के लिए मतदाता सूची में हेराफेरी कर रहे थे. यह सब मुगाबे की सोच के मुताबिक हो रहा था. मुगाबे का मानना था कि अपने प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ खूब सोचो और जरूरत पड़ने पर लड़ने से पीछे मत हटो. उनकी इस सोच के उनके सबसे बड़े आलोचक भी सम्‍मान करते थे. हरारे में अमेरिका के तत्‍कालीन राजदूत क्रिस्‍टोफर डेल ने कहा था कि दानव को उसका मिलना चाहिए क्‍योंकि वह बेहतरीन रणनीतिकार है.

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First published: September 6, 2019, 3:44 PM IST
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