ANALYSIS: पाकिस्तान में बड़ी समस्या बनती जा रही है बाल मजदूरी

आज के आधुनिक युग में जब बच्चों के अधिकारों के विषय में वैश्विक स्तर पर लगातार प्रयास जारी हैं, तब ऐसी स्थिति में पाकिस्तान में बालश्रम का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है.

Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: July 15, 2019, 7:20 PM IST
ANALYSIS: पाकिस्तान में बड़ी समस्या बनती जा रही है बाल मजदूरी
आज के आधुनिक युग में जब बच्चों के अधिकारों के विषय में वैश्विक स्तर पर लगातार प्रयास जारी हैं, तब ऐसी स्थिति में पाकिस्तान में बालश्रम का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है.
Santosh K Verma
Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: July 15, 2019, 7:20 PM IST
बालश्रम न केवल एक सामाजिक और आर्थिक समस्या है, बल्कि उससे भी बढ़कर एक नैतिक समस्या है. यूनिसेफ के अनुसार "बाल श्रम" किसी भी तरह के काम में बच्चों के रोजगार को संदर्भित करता है, जो उन्हें न केवल उन्हें, उनके बचपन से  वंचित करता है, बल्कि स्कूल की कक्षाओं में नियमित भाग लेने की उनकी क्षमता में हस्तक्षेप करता है. साथ ही साथ, यह मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और  नैतिक रूप से न केवल हानिकारक है, बल्कि खतरनाक भी है.

बालश्रम आज पाकिस्तान की बड़ी समस्या बना हुआ है. उल्लेखनीय है कि आज के आधुनिक युग में जब बच्चों के अधिकारों के विषय में वैश्विक स्तर पर लगातार प्रयास जारी हैं, तब ऐसी स्थिति में पाकिस्तान में बालश्रम का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तान में कुल श्रम का एक चौथाई हिस्सा बालश्रम से आता है. यह संख्या समस्या की व्यापकता को स्पष्ट करती है.

2006 फुटबॉल वर्ल्ड कप के समय दुनिया को दिखी समस्या
पाकिस्तान में बाल मजदूरों की दुर्दशा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में तब आई, जब 2006 में मीडिया में यह समाचार जोर-शोर से  चलने लगा कि पंजाब प्रान्त के सियालकोट में फुटबॉल की गेंदों की  सिलाई में बड़े पैमाने पर बच्चों को नियोजित किया गया है. चूंकि विदेशी खेल उपकरण कंपनियां बाल शोषण के संबंध में विशेष ध्यान रखती हैं, अत: इन्होंने कारखाने श्रम अनुपालन उल्लंघन के चलते हाथ से सिले फुटबॉल के पाकिस्तान स्थित आपूर्तिकर्ता से यह आपूर्ति रोक दी. इससे जहां यह समस्या वैश्विक समुदाय के समक्ष आई, परन्तु इससे बच्चों की स्थिति पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा.

एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तान में बालश्रम में 1.5 करोड़ से अधिक बच्चे शामिल हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, "पाकिस्तान के लेबर फोर्स सर्वे, 2014-15 के अनुसार 10 से 14 वर्ष की आयु के बच्चे बालश्रम में बड़ी संख्या में सक्रिय हैं, जिनमे 61 प्रतिशत लड़के थे. इनमें से 88 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे. अगर हम कार्य के अनुसार इसका वर्गीकरण करें तो "2005-2006, के एक अध्ययन के अनुसार यह अनुमान है कि 37 प्रतिशत कामकाजी लड़कों को शहरी क्षेत्रों में थोक और खुदरा व्यापार के क्षेत्र  में नियोजित किया गया था. इसके अलावा स्थानीय, सेवा क्षेत्र में 22 प्रतिशत और विनिर्माण क्षेत्र में 22 प्रतिशत बालश्रम नियोजित किया गया.



दूसरी ओर सेवा क्षेत्र में लड़कियों के नियोजन की संख्या लड़कों की तुलना में काफी अधिक है. इस अध्ययन के अनुसार 48 प्रतिशत लड़कियों को सेवा उद्योग में नियोजित किया गया था जबकि 39 प्रतिशत विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत थीं. वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में, बालश्रम में बालिकाओं की अधिकता बनी हुई है. थोक, खुदरा व्यापार और विनिर्माण दोनों के क्षेत्र संलग्न बालश्रम में लड़कियों की सहभागिता 11–11 प्रतिशत रही. पंजाब में ईंट भट्टे बालश्रम के सबसे बड़े नियोजक बने हुए हैं.
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बालश्रम के कारण
बाल श्रम के पीछे सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण गरीबी है. पाकिस्तान में लगातार बढ़ती जनसंख्या और धीमी गति की अर्थव्यवस्था के कारण किसी भी नियोजित व्यक्ति को अत्यंत सीमित आय ही उपलब्ध हो पाती है. रही-सही कसर उच्च दरों पर टिकी हुई मुद्रास्फीति पूरा कर देती है. जिसका परिणाम यह होता है कि एक श्रमिक स्तर के व्यक्ति को परिवार का भरण पोषण दूभर हो जाता है. इस स्थिति में परिवारों को अपने जीवन के लिए आवश्यक आजीविका अर्जित करने हेतु बच्चों को काम में नियोजित करना पड़ता है. वहीं दूसरों ओर बाल श्रम की कम लागत के कारण जो कि वयस्कों की तुलना में लगभग एक तिहाई है, निर्माताओं को बाजार में एक महत्वपूर्ण लाभ की स्थिति प्रदान करती है.

पाकिस्तान में बेरोजगारी भी एक गंभीर समस्या बनी हुई है जो बालश्रम का एक मुख्य कारण भी है और परिणाम भी. बिगड़ती आर्थिक स्थिति और अनुकूल माहौल के अभाव में रोजगारों का सृजन थम-सा गया है. ऐसी स्थिति में लगातार बढ़ती जनसंख्या जो लगभग 2.4  प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है, पाकिस्तान के बाजार में बड़ी मात्रा में श्रम शक्ति प्रतिवर्ष उतार रही है.

ऐसी स्थिति में श्रम की बहुतायत के चलते मजदूरी की दरें अत्यंत कम हो जाती हैं, जो एक श्रमिक के परिवार के भरण पोषण के लिए किसी भी दृष्टिकोण से उपयुक्त नहीं कही जा सकतीं. पाकिस्तान के गांवों में हालात और भी बदतर हैं. पंजाब सर्वाधिक कृषि प्रधान प्रान्त है परन्तु कृषि के बड़े पैमाने पर मशीनीकरण ने बड़े पैमाने पर श्रमिकों को उनके रोजगार से वंचित किया है. ऐसी स्थिति में जब मौसमी और चक्रीय बेरोजगारी से ग्रस्त परिवारों को जीविका के साधन अर्जित करने के लिए बच्चों को काम पर लगना पड़ता है.

बच्चों को काम पर लगाना नियोक्ता के लिए इसलिए आकर्षक सौदा बन जाता है, क्योंकि एक तिहाई मजदूरी में वह उनसे कठोर कार्य करवा लेता है. उसके लिए यह अपनी लागतों को कम करने और लाभ को बढ़ाने का जरिया बन जाता है. कुछ कार्य ऐसे भी हैं, जहां अपनी विशिष्ट शारीरिक संरचना के कारण छोटे बच्चे ही उपयुक्त होते हैं. जैसे कालीन बुनना, जहां बाल श्रम की अत्यधिक मांग रहती है. इसका परिणाम यह होता है कि निम्न आर्थिक पृष्ठभूमि के ऐसे छात्र जो स्कूल में प्रवेश करने में असमर्थ हैं, पाकिस्तान में बाल श्रम के बाज़ार में धकेल दिए जाते हैं.



बालश्रम के होते हैं बुरे नतीजे
बालश्रम का केवल आर्थिक पक्ष ही नहीं है. यह अपने साथ कई भयंकर दुष्प्रभावों को समाहित किए हुए है. बाल श्रमिकों के साथ कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार एक आम बात बात है. जिन बच्चों को घरेलू नौकर के रूप में मध्यम वर्ग और कुलीन वर्ग के परिवारों के साथ रहने के लिए भेजा जाता है, इस तरह की नौकरियां बच्चों के लिए विशेष रूप से खतरनाक हो जाती हैं, क्योंकि यहां वे शारीरिक और यौन शोषण के सर्वाधिक जोखिम में होते हैं.

सरकार के द्वारा किए गए उपाय
इसके साथ-साथ पाकिस्तान सरकार का बालश्रम उन्मूलन के प्रति रवैया ठीक नहीं रहा है. पाकिस्तान की तत्कालीन सरकार ने 2016 में, पिछले 20 वर्षों के बाल श्रम पर सकेंद्रित सर्वेक्षण का संचालन करने की अनुमति तक देने से इनकार कर दिया था, जो उसके तथाकथित रक्षोपायों की पोल खोल सकता था. 21वीं सदी के मध्य में भी पाकिस्तान के अन्दर मध्यकालीन सामंतवाद के टापू विद्यमान हैं जो  मानववाद समेत आधुनिक विचारों के खिलाफ बाड़ बना कर खड़े हुए हैं. हालांकि इन संस्थागत सुधारों को किए बिना किसी भी प्रकार के सामाजिक सुधार पाकिस्तान की जमीं पर प्रभावी हो ही नहीं सकते. वास्तविकता में यही हो भी रहा है.

कई वर्षों से, पाकिस्तान को सबसे खराब बालश्रम अपराधियों में से एक के रूप में जाना जाता रही है. हालांकि अधूरे मन से ही सही, इसने बालश्रम उन्मूलन के  प्रयासों को बढ़ावा दिया है. पाकिस्तान का संविधान और श्रम कानून दोनों ही में बालश्रम के विरुद्ध रक्षोपाय देते हैं और 14 वर्ष की आयु से पहले बच्चों के रोजगार पर रोक लगाते हैं.

क्या कहता है कानून
पाकिस्तान के संविधान का अनुच्छेद 3 कहता है कि राज्य सभी प्रकार के शोषण की समाप्ति सुनिश्चित करेगा. अनुच्छेद 11 (3) कहता है कि 14 वर्ष से कम आयु का कोई बच्चा किसी कारखाने या खदान या किसी अन्य खतरनाक रोजगार में नहीं लगाया जाएगा. इसी तरह आगे अनुच्छेद 25 (ए) प्रावधान करता है कि राज्य पांच से सोलह वर्ष की आयु के सभी बच्चों को इस तरह से मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा, जो कानून द्वारा निर्धारित है.

अनुच्छेद 37 (ई) के अनुसार राज्य काम और मानवीय परिस्थितियों को सुरक्षित रखने के लिए प्रावधान करेगा, यह सुनिश्चित करेगा कि महिलाओं और बच्चों को उनकी उम्र या लिंग के लिए अनुपयुक्त कार्यों में नियुक्त नहीं किया जाएगा.



संविधान के इन उपबंधों के तहत पाकिस्तान में बालश्रम रोकने हेतु अनेकों कानून भी बनाए गए हैं. बच्चों के रोजगार अधिनियम 1991 के द्वारा खतरनाक कार्य के लिए न्यूनतम आयु 14 वर्ष निर्धारित की गई है जो वर्तमान में इस्लामाबाद कैपिटल टेरिटरी (आईसीटी), बलूचिस्तान और सिंध में लागू है.

इसके साथ ही खैबर पख्तूनख्वा, पंजाब और सिंध प्रांत ने कन्वेंशन 138 के प्रावधानों के अनुसार, खतरनाक कार्यों में नियोजन के लिए न्यूनतम आयु बढ़ाकर 18 साल करने के लिए आवश्यक कानून बनाए हैं. 26 जनवरी, 2017 को सिंध प्रांत ने 14 साल से कम उम्र के बच्चों को काम करने से प्रतिबंधित करते हुए, द सिंध प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट ऑफ चिल्ड्रन एक्ट के तहत बाल श्रम को अवैध बना दिया. यह कानून किशोरों को शाम 7 बजे के बाद  काम करने से भी रोकता है.

कानून बना देने से नहीं खत्म होगी समस्या
यह सत्य है कि यह समस्या एकांगी नहीं है. केवल कानून बना देने से इसकी समाप्ति हो जाएगी, यह सोचना भी व्यावहारिक नहीं. इसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक पक्ष आपस में गुंथे हुए हैं, जिनमें भी सर्वाधिक मुख्य आर्थिक  कारक हैं. विश्व बैंक के एक अर्थशास्त्री का कहना है कि पाकिस्तान की आर्थिक व्यवहार्यता उसके कारखानों में बच्चों की संख्या के साथ है. कुछ उद्योग ऐसे हैं, विशेष रूप से कालीन बनाने और ईंट बनाने वाले, जो बालश्रम के बिना जीवित नहीं रह सकते.

पाकिस्तान की तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण यहां के स्कूल भी इतने सक्षम नहीं कि उन्हें दाखिला दे सके जिसके परिणामस्वरूप एक बड़ी संख्या मदरसों की ओर जाने को बाध्य है जो पाकिस्तान के लिए विश्वस्तरीय आतंकवादी तैयार करने का केंद्र हैं. वहीँ दूसरी ओर, हर साल लाखों बच्चे श्रम के बाज़ार में प्रवेश करते हैं, जहां वे वयस्कों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं. कई क्षेत्रों में सस्ते बाल श्रम के अधिशेष ने मजदूरी की दरों को इतना नीचे गिरा दिया है कि जहां पहले घर के मुखिया की आमदनी से घर चल जाता था, अब बच्चों के हाड़तोड़ श्रम में लग जाने के बाद भी परिवार का निर्वहन कठिन होता जा रहा है.

अगर आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो वास्तविकता में बालश्रम एक दुश्चक्र की तरह है और जब तक बच्चों को काम पर लगाया जाता रहेगा, तब तक गरीबी और भी  फैलेगी और जीवन स्तर में गिरावट लगातार जारी रहेगी. अत: पाकिस्तान के लिए आवश्यक है कि वह जनसंख्या नियंत्रण, बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा और मानव संसाधन विकास पर ध्यान केन्द्रित करे.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार,  उनके व्यक्तिगत विचार हैं)

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First published: July 15, 2019, 7:13 PM IST
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