आर्मीनिया-अज़रबैजान संघर्ष: 30 साल में 30 हजार लोग मारे गए, 10 लाख शरणार्थी बने

आर्मीनिया-अज़रबैजान संघर्ष पिछले तीन दशक से जारी है. फोटो: : AP
आर्मीनिया-अज़रबैजान संघर्ष पिछले तीन दशक से जारी है. फोटो: : AP

आर्मीनिया और अज़रबैजान (Armenia-Azerbaijan war) के बीच 30 सालों से लगातार संघर्ष (War) जारी है. कई सालों तक चले इस हिंसक टकराव में दोनों तरफ़ के क़रीब 30 हज़ार लोग मारे गए और 10 लाख से ज़्यादा शरणार्थी बन गए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 27, 2020, 6:17 PM IST
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बाकू. आर्मीनिया और अज़रबैजान (Armenia-Azerbaijan war) के बीच 30 सालों से लगातार संघर्ष (War) जारी है. यहां संघर्ष विराम की घोषणा बार-बार होती है लेकिन इसके बावजूद नागोर्नो-काराबाख़ इलाक़े में लड़ाई जारी है. इस लड़ाई में अबतक 30 हज़ार लोग मारे गए (Killed Thousands People) हैं. इस संघर्ष के वर्तमान स्तर पर पहुंचने के पीछे कई कारण हैं. यूं तो 1990 के दशक में नागोर्नो-काराबाख़ इलाक़े में लड़ाइयां तेज होती गईं लेकिन इससे पहले वर्ष 1980 में मिखाइल गोर्बाचोव के पेरेस्ट्रॉइका और सोवियत संघ के लोगों में राष्ट्रीय पहचान के लोकप्रिय होते विचार के साथ इसका सूत्रपात हुआ था. पेरेस्ट्रॉइका का मतलब है पुनर्गठन यानी सोवियत संघ की राजनीतिक और आर्थिक प्रणाली का पुनर्गठन. दोनों देशों के बीच हुए टकरावों में कई ख़ूनी संघर्ष शामिल हैं. नागोर्नो-काराबाख़ सोवियत संघ के अस्तित्व के दौरान अज़रबैजान के भीतर ही एक स्वायत्त क्षेत्र बन गया था.

अजरबैजान में आर्मीनियाई आबादी रहती है

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस स्वायत्त क्षेत्र को अज़रबैजान के हिस्से के तौर पर ही जाना जाता है, लेकिन यहाँ रहने वाली अधिकतर आबादी आर्मीनियाई है. इस आर्मीनियाई आबादी ने नागोर्नो-काराबाख़ के आर्मीनिया से एकीकरण के लिए आंदोलन की शुरुआत की, जिससे अज़रबैजान में भी भावनाएँ भड़क उठीं. इसके चलते दोनों समुदायों के प्रतिनिधियों के बीच टकराव शुरू हो गया और आर्मीनिया और काराबाख़ से अज़ेरी लोगों को निकाला जाने लगा.



सुमगईट नरसंहार में मारे गए थे बड़ी संख्या में लोग
इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप फ़रवरी 1988 में अज़रबैजान के शहर सुमगईट में बड़ी संख्या में आर्मीनियाई लोगों को मार दिया गया. इसे 'सुमगईट नरसंहार' भी कहा जाता है. सोवियंत संघ की सरकार ने बल प्रयोग कर मामले को शांत करने की कोशिश की, लेकिन काराबाख़ में इस आंदोलन के प्रतिनिधियों की गिरफ़्तारी से आर्मीनिया और अज़रबैजान में लोगों का उनके लिए समर्थन और बढ़ गया. इसके साथ ही दोनों के बीच दुश्मनी भी बढ़ती गई.

90 के दशक में तेज हो गया संघर्ष

जनवरी 1990 में अज़रबैजान की राजधानी बाकू में फिर एक नरसंहार हुआ और सैकड़ों आर्मीनियाई मारे गए. इस नरसंहार में बड़ी संख्या में आर्मीनियाई घायल और लापता हो गए. वर्ष
1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही काराबाख़ का संघर्ष एक नए दौर में प्रवेश कर गया. अब दोनों पक्षों के पास सेना के छोड़े गए हथियार भी थे. 1992-1993 के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें दोनों देशों को भारी नुक़सान उठाना पड़ा.

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यह माना जाता है कि कई सालों तक चले इस हिंसक टकराव में दोनों तरफ़ के क़रीब 30 हज़ार लोग मारे गए और 10 लाख से ज़्यादा शरणार्थी बन गए.
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