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रिसर्च में दावा! UK में Covid-19 Vaccine नहीं लेना चाहते भारतीय मूल के लोग

ब्रिटेन में कोरोना वैक्सीन लेने से कतरा रहे हैं भारतीय.
ब्रिटेन में कोरोना वैक्सीन लेने से कतरा रहे हैं भारतीय.

Coronavirus Vaccine Update: एक रिसर्च में सामने आया है कि ब्रिटेन-अमेरिका में रह रहे एशियाई मूल (Asians) के लोग फिलहाल कोरोना वायरस वैक्सीन नहीं लेना चाहते. इन लोगों के मन में वैक्सीन के सुरक्षित होने को लेकर कई तरह की शंकाएं हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 17, 2020, 11:56 AM IST
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लंदन. एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि भले ही ब्रिटेन (UK) सरकार ने कोरोना संक्रमण के खिलाफ मास वैक्सीनेशन (Pfizer Coronavirus Vaccine) प्रोग्राम शुरू कर दिया हो लेकिन भारतीय मूल के लोग फिलहाल कोविड-19 का टीका लगवाने को इच्छुक नहीं है. 'ब्लैक, एशियन एंड माइनॉरिटी एथनिक' (BAME) समूह, एशियाई मूल के लोग और लैटिन अमेरिका के लोग भी फिलहाल वैक्सीन के साइड इफेक्ट को लेकर डरे हुए हैं और वैक्सीन लेने से बच रहे हैं.

ब्रिटने में 'फाइजर/बायोएनटेक' द्वारा विकसित कोविड-19 का टीका पहले एक सप्ताह में ही करीब 1,38,000 लोगों को लगाया जा चुका है. ‘रॉयल सोसाइटी फॉर पब्लिक हेल्थ’ (आरएसपीएच) द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि ब्रिटेन के चार में से तीन लोग (76 प्रतिशत) अपने डॉक्टर की सलाह पर टीका लगवाने को तैयार हैं, जबकि केवल आठ प्रतिशत ने ही ऐसा ना करने की इच्छा जाहिर की. वहीं, बीएएमई पृष्ठभूमि (199 प्रतिभागियों) के केवल 57 प्रतिशत प्रतिभागी टीका लगवाने को राजी हुए , जबकि 79 प्रतिशत श्वेत प्रतिभागियों ने इसके लिए हामी भरी. अध्ययन में कहा गया कि एशियाई मूल के लोगों में टीके के प्रति भरोसा कम दिखा क्योंकि केवल 55 प्रतिशत ने ही इसको लगवाने के लिए हां कहा.

कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं यही लोग
आरएसपीएच की मुख्य कार्यकारी क्रिस्टीना मैरियट ने कहा, 'हमें कई वर्षों से यह पता है कि अलग-अलग समुदायों का राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) पर अलग-अलग स्तर का विश्वास है और हाल ही हमने देखा कि टीकाकरण विरोधी संदेशों के जरिए विशेष रूप से विभिन्न समूहों को निशाना बनाया गया, जिसमें विभिन्न जातीय या धार्मिक समुदाय शामिल हैं.' उन्होंने कहा, 'लेकिन असल में ये समूह सबसे अधिक कोविड से प्रभावित हुए हैं. उनके बीमार होने और मरने का खतरा भी बना रहेगा.
इसलिए सरकार , एनएचएस और स्थानीय जन स्वास्थ्य सेवाओं को तेजी से और लगातार इन समुदायों के साथ काम करना चाहिए. उनके साथ काम करने का सबसे प्रभावी तरीका स्थानीय समुदायिक समूहों के साथ काम करना होगा.' पहले सामने आए कई अध्ययनों में भी यह बात सामने आई है कि ब्रिटेन के अल्पयंख्यक जातीय समूहों पर कोविड-19 का सबसे अधिक असर पड़ा है, जहां काम करने और रहने की स्थिति बीएएमई समूहों में मृत्यु दर अधिक होने का बड़ा कारण मानी जाती है.



अमेरिका को चाहिए और कोरोना वैक्सीन
उधर अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि अग्रणी दवा कंपनी फाइजर के कोविड-19 टीके की अतिरिक्त खेप के लिए वह लगातार बातचीत कर रहे हैं. स्वास्थ्य और मानव सेवा मंत्री एलेक्स अजर और विशेष सलाहकार डॉ. मोन्सेफ सलाओई ने बुधवार को संवाददाताओं को बताया कि फाइजर ने टीका आपूर्ति के लिए समय सीमा नहीं बतायी है, यही ‘‘मूल मुद्दा’’ है. कंपनी की तरफ से इस पर कोई बयान नहीं आया है. कंपनी के सीईओ एल्बर्ट बौरला ने इस सप्ताह ‘सीएनएन’ को बताया था कि वह संघीय ‘ऑपरेशन वार्प स्पीड’ के जरिए टीके की अतिरिक्त खेप की आपूर्ति के लिए सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. कोरोना वायरस के टीके के निर्माण में तेजी लाने के लिए इस अभियान की शुरुआत की गयी थी.



टीके की अतिरिक्त खेप को अग्रिम तौर पर सुरक्षित कराने का मौका गंवाने संबंधी खबरों के बाद डेमोक्रेट सांसदों ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की आलोचना की थी. वाशिंगटन के पेट्टी मूरी और ओरेगन के रॉन वेडेन की अगुवाई में कुछ सांसदों के एक समूह ने पिछले सप्ताह कहा था, 'देश के लिए कोविड-19 टीके की अतिरिक्त खेप की व्यवस्था करने में ढिलाई बरते जाने से हम चिंतित है. इससे देश में और लोगों की जान जाएगी और तबाही होगी.' उन्होंने कहा, 'ट्रंप प्रशासन की यह एक और नाकामी को दिखाता है कि उसने राष्ट्रीय स्तर पर टीके की अतिरिक्त खेप की व्यवस्था को लेकर ढिलाई बरती. इससे टीकाकरण और महामारी खत्म करने के अभियान को धक्का लग सकता है.'
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