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'दुनिया के आखिरी छोर पर' जलवायु परिवर्तन को लेकर चौंकाने वाली स्टडी, वैज्ञानिकों ने जारी किया ALERT

'दुनिया के आखिरी छोर पर' जलवायु परिवर्तन को लेकर चौंकाने वाली स्टडी, वैज्ञानिकों ने जारी किया ALERT

जलवायु परिवर्तन पर नई स्टडी (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

जलवायु परिवर्तन पर नई स्टडी (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

Scientists Study on Climate Change: चिली के मगालानेस इलाके में क्लाइमेट चेंज पर साइंटिस्ट्स ने जलवायु परिवर्तन को लेकर एक अध्ययन किया है. इसमें उन्होंने चेतावनी देते हुए जरूरी कदम उठाने के लिए कहा है.यह इलाका दक्षिण अमेरिका के सबसे निचले सिरे पर स्थित है जहां अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर आकर मिलते है. इन साइंटिस्ट ने जलवायु परिवर्तन को नुकसान पहुंचाने वाले कारकों का अध्ययन किया. इस दौरान उन्होंने यह पाया कि यहां पर स्थित समुद्रीय जल में दूसरे सागरों और महासागरों की तुलना में नमक और कैल्शियम की मात्रा कम है. साइंटिस्ट्स का कहना है कि पानी की जो अवस्था यहां पर है, आने वाले दशकों में ऐसे हालात दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी देखने को मिलेंगे.

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    सैंटियागो: चिली के वैज्ञानिकों (Scientist) ने जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को लेकर जारी अपने अध्ययन में चेतावनी देते हुए दुनिया के तमाम देशों से इस पर जरूरी कदम उठाने के लिए कहा है. चिली के मगालानेस इलाके में क्लाइमेट चेंज पर साइंटिस्ट के इस दल ने अपनी स्टडी में कुछ चौंकाने वाले तथ्य पाए हैं. दरअसल यह इलाका दक्षिण अमेरिका के सबसे निचले सिरे पर स्थित है जहां अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर आकर मिलते है. इस जगह को दुनिया का अंतिम छोर भी कहा जाता है. कोरोना महामारी (Corona Pandemic) के कारण जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक का यह अध्ययन एक साल से रूका हुआ था. लेकिन हाल ही में वैज्ञानिकों के इस दल ने यहां पहुंचकर अपनी स्टडी को शुरू किया.

    इन साइंटिस्ट ने जलवायु परिवर्तन को नुकसान पहुंचाने वाले कारकों का अध्ययन किया. इस दौरान उन्होंने यह पाया कि यहां पर स्थित समुद्रीय जल में दूसरे सागरों और महासागरों की तुलना में नमक और कैल्शियम की मात्रा कम है. साइंटिस्ट्स का कहना है कि पानी की जो अवस्था यहां पर है, आने वाले दशकों में ऐसे हालात दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी देखने को मिलेंगे.

    इस वैज्ञानिक दल का नेतृत्व करने वाले लुइस इरीयारते ने न्यूज एजेंसी एएफपी से कहा कि, जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने और इसके लिए बनाई गई रणनीतियां पर्यावरण में हो रहे निरंतर बदलाव के कारण पुरानी हो चुकी हैं. मौजूदा वक्त में हम जिस तरह से काम कर रहे हैं उसके कारण पर्यावरण में तेजी से बदलाव हो रहा है.

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    जलवायु परिवर्तन को लेकर नई नीतियों पर काम करने की जरुरत

    इस अभियान में वैज्ञानिकों के दल ने शैवाल की नुकसान पहुंचाने वाली लाल लहरों पर खास जोर दिया. क्योंकि इससे पहले मगालानेस इलाके में उन्हें करीब 50 साल पहले देखा गया था. इसके कारण 23 लोगों की मौत हो गई और 200 से अधिक लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ा है. इस इलाके में ग्लेशियर्स पिघले हैं जो कि ग्लोबल वॉर्मिंग का सबसे बड़ा कारण है. साइंटिस्ट लुइस इरीयारते ने कहा कि हम नहीं कह सकते हैं कि इन प्रभावों का इन जीवों पर क्या असर होगा. इस वैज्ञानिक दल के सदस्य 14 इलाकों में ठहरे और हर बार पानी के सैंपल लिए. पानी के इन सैंपलों को समुद्र की अलग-अलग गहराई से लिया गया. इनमें गहराई की सीमा 200 से 300 मीटर तक थी. साइंटिस्ट्स ने तटों पर शैवालों व सीप को खोजा और एकत्रित किया.

    वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई है कि मिस्त्र में जलवायु परिवर्तन पर यूएन अगली बैठक होगी. इस समिट में महासागरों के प्रबंधन पर कोई रणनीति बनेगी और वैश्विक परिवर्तन आएगा. हमें 2022 में क्लाइमेट चेंज के विषय पर गंभीरता से सोचने और ठोस फैसले लेने की जरुरत है. 9 दिन तक चले इस अभियान में जुटाई गई विभिन्न जानकारियों को लैब में रखकर उनकी समीक्षा की जाएगी. इस वैज्ञानिक अभियान में शामिल रहे 24 वर्षीय बायोकेमिस्ट्री के छात्र ने कहा कि, मुझे लगता है कि ये जानकारियां हम से काफी कुछ कह सकती हैं जो प्रकृति खुद नहीं बता सकती है.

    Tags: Climate Change, Global warming

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