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ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में चीन हुआ बेनकाब, निवेशकों का भारत पर बढ़ा भरोसा

पीएम मोदी के साथ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (FILE PHOTO)

पीएम मोदी के साथ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (FILE PHOTO)

दरअसल, विश्व बैंक ने एक स्वतंत्र रुप से काम करने वाली विश्व की एक नामी-गिरामी अमरीकी लॉ फर्म विल्मर हेल को इस पूरे मसले पर अध्ययन करने का जिम्मा सौंपा. इस फर्म ने लगभग 80 हजार डॉक्यूमेंट का अध्ययन किया और कई साक्षात्कार किए.

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नई दिल्ली. ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (Ease of doing Business) की रिपोर्ट में चीन (China) 2017 से अब तक गलत हथकंडे अपना कर अपना रैंकिग नीचे गिरने से बचा रहा था. लेकिन एक स्टडी में ये साबित हो गया है कि चीन ने आंकड़ों में एक बहुत बड़ा हेरफेर किया है, जिसके चलते वो विश्व में अपनी रैंकिग बचाए हुए था. दरअसल, विश्व बैंक ने एक स्वतंत्र रुप से काम करने वाली विश्व की एक नामी-गिरामी अमरीकी लॉ फर्म विल्मर हेल को इस पूरे मसले पर अध्ययन करने का जिम्मा सौंपा. इस फर्म ने लगभग 80 हजार डॉक्यूमेंट का अध्ययन किया और कई साक्षात्कार किए और साल 2018 से 2020 तक की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस पर अपनी रिपोर्ट को अंतिम रुप दिया.

इस रिपोर्ट में पाया गया है कि चीन ने खासे आक्रामक तरीके से अपनी गिरती रैंकिंग को छुपाए रखा था. साल 2017 में जब sensitive capital raising का समय था, तब चीन ने अपनी ताकत दिइखाते हुए विश्व बैंक के शीर्ष मैनेजमेंट पर दबाव डाला और विश्व स्तर पर अपनी गिरती रैंकिग का ट्रेंड बदल कर रख दिया. चीन अगर ऐसे हथकंडे नहीं अपनाता तो उसकी रैंकिग 78वें से 85वें स्थान पर पहुंच जाती. लेकिन अध्यक्ष किम और सीईओ जार्जिवा ने डूइंग बिजनेस टीम को चीन के आंकड़ों को फिर से गणना करने का निर्देश दिया, जिससे चीन की रैंकिग 78वें स्थान पर बनी रही.

उधर सऊदी अरब ने भी डाटा का हेरफेर कर 2020 में अपनी रैंकिग को बचाए रखा था. आरोप ये है कि सऊदी अरब ने अपनी वित्तीय ताकत का इस्तेमाल कर विश्व बैंक पर दबाव डाला. सऊदी अरब ने अपने पेड कॉन्ट्रैक्ट के जरिए विश्व बैंक को काफी रकम दे रखी है. इसलिए उसका दवाब काम आया और इज ऑफ डूइंग बिजनेस में सबसे ज्यादा छलांग लगाने वाला देश बना. यहां तक की उसने जॉर्डन को भी पीछे छोड़ दिया था.

गणना की मैथेडोलॉजी को बदलते हुए अजरबेजान को भी रैंकिग में नीचे धकेल दिया गया. आखिरी वक्त में बदला कर इस्तेमाल किया गया एक मानक प्रोटेक्टिंग माइनोरिटी इंवेस्टर भी अजरबेजान के हितों के खिलाफ गया और उनकी रैंकिंग नीचे चली गई. आरोप ये लगा कि इस देश को लेकर विश्वबैंक के चंद कर्मचारियों का व्यक्तिगत द्वेष रैंकिग पर असर डाल गया.
अब बात भारत की. पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत निवेश के लिए दुनिया भर एक भरोसेमंद और मनपसंद स्थान बना रहा, जबकि चीन का आकर्षण घटता गया. चीन एक बार फिर बेनकाब हुआ है. चीन द्वारा आंकड़ों को छिपा कर अपनी बिगड़ते निवेश के माहौल को सही ठहराने की कोशिशों से दुनिया भर के निवेशकों को झटका लगा है.

साफ है कि इज ऑफ डूइंग बिजनेस में चीन का ये फ्रॉड और उसका बेनकाब होना अब ज्यादा से ज्यादा उत्पादकों और उद्योगों को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करेगा. ये पूरा का पूरा घटनाक्रम साबित करता है कि भारत द्वारा ईमानदारी से सही आंकड़े रखना दुनिया भर में भारत की विश्वसनीयता बढ़ा गया है.

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