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11000 वैज्ञानिकों ने घोषित किया वैश्विक जलवायु आपातकाल, बताया क्यों बचना है मुश्किल


Updated: November 7, 2019, 10:24 AM IST
11000 वैज्ञानिकों ने घोषित किया वैश्विक जलवायु आपातकाल, बताया क्यों बचना है मुश्किल
भारत पर मंडरा रहा है जलवायु परिवर्तन का अधिक खतरा.

इंसानों की भूख मिटाने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (Greenhouse Emissions) से होने वाले नुकसान पलटे नहीं जा सकते. ‘बायोसाइंस’ (Bioscience) नाम की पत्रिका में छपे एक लेख में 11258 मे से 69 भारतीय वैज्ञानिकों (Indian Scientist) के भी हस्ताक्षर हैं.

  • Last Updated: November 7, 2019, 10:24 AM IST
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नईदिल्ली. विश्व भर के 153 देशों के 11000 वैज्ञानिकों (World Scientist) ने जलवायु आपातकाल (Climate Emergency) की घोषणा (Declaration)कर दी है. आपातकाल की घोषणा करते है वैज्ञानिकों ने बताया कि जलवायु परिवर्तन से जो हालात उपजे हैं उसने बचना आसान नहीं है. हालात सुधारने के लिए जलवायु पर हो रहे आघात तुरंत रोकना होगा. इंसानों की भूख मिटाने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (Greenhouse Emissions) से होने वाले नुकसान पलटे नहीं जा सकते. ‘बायोसाइंस’ (Bioscience) नाम की पत्रिका में छपे एक लेख में 11258 मे से 69 भारतीय वैज्ञानिकों (Indian Scientist) के भी हस्ताक्षर हैं.

जलवायु आपातकाल की घोषणा  पिछले 40 सालों के दौरान कुछ क्षेत्रों के तय मानकों पर एकत्रित डेटा के आधार पर की गई है. यह घोषणा ऊर्जा उपयोग, सतह के तापमान, जनसंख्या वृद्धि, भूमि समाशोधन, वनों की कटाई, ध्रुवीय बर्फ द्रव्यमान, प्रजनन दर के वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित है.

अमेरिका में ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी (OSU) कॉलेज ऑफ फॉरेस्ट्री के विलियम जे रिपल ने बताया कि 40 साल की प्रमुख वैश्विक वार्ताओं के बावजूद, हमने हमेशा की तरह व्यापार करना जारी रखा है और इस संकट को दूर करने में असफल रहे हैं.

तत्काल कदम उठाने पर जोर

धरती के बढ़ते तापमान के लिए वैज्ञानिकों के समूह ने छह क्षेत्रों में तत्काल कदम उठाने पर जोर दिया है. ये हैं ऊर्जा, लघु प्रदूषक, प्रकृति, भोजन, अर्थव्यवस्था और जनसंख्या.

वैज्ञानिक समूह का हिस्सा दिल्ली विश्वविद्यालय के ज्ञान प्रकाश शर्मा का मानना है कि हम अपनी भोजन और ऊर्जा जैसी जरुरतें पूरी करने के लिए लगातार प्रकृति का दोहन करते जा रहे हैं. यह रुकने का नाम नहीं ले रहा बल्कि यह और बढ़ रहा है. ज्ञान प्रकाश शर्मा वैश्विक जलवायु आपातकाल पर हस्ताक्षर करने वाले वैज्ञानिकों में से एक हैं.

भारत के संदर्भ का उल्लेख करते हुए, उन्होंने कहा कि देश भर में मानसून पैटर्न में जबरदस्त बदलाव आया है, जिससे कृषि पद्धतियों में बदलाव आया है.
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चेन्नई : समुद्र तल से इस शहर की औसत ऊंचाई 6.7 मीटर है. बंगाल की खाड़ी से पैदा होने वाले चक्रवात पहले भी चेन्नई को प्रभावित कर चुके हैं और साल 2004 में सुनामी के कहर को कौन भूल सकता है. समुद्री भूकंप से उठे इस तूफान ने चेन्नई में करीब डेढ़ सौ जानें ली थीं और हज़ारों की संख्या में लोग बेघर हुए थे.


वैज्ञानिकों ने विश्व भर में जलवायु परिवर्तन को लेकर बढ़ती चिंता को भविष्य के लिए अच्छा बताया. उन्होंने कहा कि जलवायु को लेकर सरकारी घोषणाएं, नागरिक आंदोलन और स्कूली बच्चों की हड़ताल जैसे कार्यक्रम हमें सकारात्मक संदेश दे रहे हैं.

इस लेख में 1979 जेनेवा प्रथम विश्व जलवायु सम्मेलन में 50 देशों के वैज्ञानिकों की बैठक से लेकर अब तक 40 वर्षों के जलवायु परिवर्तन संकेतकों को दर्शाया गया है.

वैज्ञानिकों ने कहा कि उन्हें प्रति व्यक्ति मांस उत्पादन और हवाई यात्रियों की संख्या के साथ साथ वैश्विक स्तर पर पेड़ों की कटौती बढ़ने से चिंता हो रही है. वहीं दूसरी ओर वैश्विक जन्म दर में कमी, वायु एवं सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ने और अमेज़न में जंगल को हो रहे नुकसान कम होने से वो उत्साहित भी हैं.

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First published: November 7, 2019, 10:24 AM IST
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