कोरोना से निपटने में सबसे अहम है ये फैक्टर, भारत समेत इन 6 देशों ने किए उपाय

कोरोना से निपटने में सबसे अहम है ये फैक्टर, भारत समेत इन 6 देशों ने किए उपाय
कोरोना वायरस के संक्रमण से अब तक 559 लोगों की जान जा चुकी है.

भारत समेत इन 6 देशों ने ये उपाय अपनाकर अपने यहां कोरोना वायरस (Coronavirus) की वजह से होने वाले मौत के आंकड़े को कम रख पाने में कामयाबी पाई है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 20, 2020, 4:59 PM IST
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पूरी दुनिया कोरोना (Coronavirus) संकट के भयावह दौर से गुजर रही है. पूरी दुनिया के 5 महाद्वीपों के करीब 146 देशों में वायरस का संक्रमण (virus infection) फैला है. सबसे गौर करने वाली बात है कि अमेरिका, इटली, स्पेन, फ्रांस और यूके जैसे देशों में वायरस की वजह से सबसे ज्यादा मौतें (deaths) हुई हैं. इन देशों में पूरी दुनिया की 73 फीसदी मौतें हुई हैं.

हैरानी की बात है कि इन देशों में दुनिया का सबसे बेहतरीन हेल्थ केयर सिस्टम (health care system) है. इसका मतलब है कि अच्छा हेल्थ केयर सिस्टम भी आपको महामारी (epidemic) से नहीं बचा सकता है. सवाल उठता है कि फिर हमें कौन बचा सकता है? क्यों बहुत से देश अपने यहां कोरोना के संकट को अच्छे से संभाल पाए और कुछ देश अब तक संक्रमण से निपटने में संघर्ष कर रहे हैं?

मीडियम डॉट कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना के संकट का ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, साउथ कोरिया, जर्मनी, कनाडा और भारत जैसे देशों ने अच्छे से मुकाबला किया. इन देशों में बाकी देशों की तुलना में कम मौतें हुई हैं. ऑस्ट्रेलिया में प्रति 10 लाख में 2, सिंगापुर में 1, साउथ कोरिया में 4, जर्मनी में 31, कनाडा में 13 और भारत में 0.2 मौतें दर्ज की गई हैं.



महामारी से निपटने में राजनीतिक नेतृत्व रहा अहम फैक्टर
इन देशों में कोरोना के संकट से अच्छी तरह से निपटने मे हेल्थ केयर सिस्टम के अलावा कई फैक्टर ने काम किया. देश कितने दूर-दराज के इलाकों तक बसा है, उसकी आबादी कितनी घनी है और वहां का नेतृत्व कैसा है, जैसे फैक्टर अहम रहे. कोई ये कह सकता है कि हेल्थ केयर सिस्टम की वजह से कुछ देशों ने कोरोना के संकट का बेहतर जवाब दिया और उससे अपने देश को ज्यादा प्रभावित होने से बचा पाए. लेकिन सिर्फ हेल्थ केयर सिस्टम आधी कहानी ही कहती है. कोरोना के संकट से अच्छे तरह से निपटने वाले देश तकरीबन हेल्थ रैंकिंग में टॉप 50 में आते हैं. भारत का स्थान इसमें 118वां है.

संकट से निपटने में सबसे अहम फैक्टर रहा है, संक्रमण की चपेट में आए देश का राजनीतिक नेतृत्व. इन देशों के राजनीतिक नेतृत्व ने महामारी से निपटने में बेहतर कदम उठाए, इसलिए वो अपने देशों पर कोरोना के प्रभाव को कम कर सके. अब सवाल उठता है कि इन देशों के राजनीतिक नेतृत्व ने ऐसा क्या किया और बाकी के देशों को इससे क्या सबक लेना चाहिए.

सिंगापुर से सीखी जा सकती हैं ये 5 बातें
सिंगापुर की बात करें तो ये एक छोटा सा देश है. भौगोलिक क्षेत्र और आबादी दोनों के लिहाज से. इसके पहले भी सार्स जैसी महामारी को फैलने से रोकने में सिंगापुर कामयाब रहा था. सिंगापुर के प्रधानमंत्री ने कोरोना पर तुरंत एक्शन लिया. सिंगापुर के तौर तरीकों से ये 5 बातें सीखी जा सकती हैं

-सिंगापुर ने कोरोना के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए तुरंत कार्रवाई की. बाकी के देशों की तुलना में सिंगापुर ने बहुत पहले (16 फरवरी) को अपने यहां नेशनल प्लान लागू कर दिया.

-सिंगापुर ने बड़े पैमाने पर लोगों के संक्रमण की जांच की और जल्द से जल्द पॉजिटिव मामलों की पहचान की.

-जो लोग पॉजिटिव पाए गए उन्हें सख्ती से क्वॉरंटाइन किया गया. ऐसे लोग सेल्फ आइसोलेशन में चले गए. ऐसे लोगों की इलेक्ट्रॉनिक मॉनिटरिंग की गई. बाहर के मजदूरों के नियम पालन नहीं करने की स्थिति में उन्हें उनके देश भेज दिया गया. नियम कायदे तोड़ने पर भारी जुर्माना लगाया गया.

-मीडिया के जरिए मजबूती और आसान लहजे में बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक किया गया.
-लोगों को लॉकडाउन में जाने का डर था. इसलिए लोगों के टेस्ट चलते रहे और वेलोग नॉर्मल एक्टिविटी में भाग भी लेते रहे.

कनाडा से सीखी जा सकती हैं ये 5 बातें
इसी तरह से कनाडा ने इन उपायों के जरिए संक्रमण पर काबू पाया

-कनाडा ने नेशनल इंफ्लुएंजा प्लान को लागू कर दिया. 2018 में इस प्लान को बनाया गया था. इस प्लान को ऐसी ही महामारी से बचने के लिए तैयार किया गया है.

-नेशनल प्लान को लागू करने में कनाडा के सभी प्रांतों ने सहयोग किया.

-कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडेव ने हेल्थ प्रोफेशनल्स की सलाह का पालन किया और नियमित तौर पर प्रेस ब्रीफिंग करते रहे.

-कनाडा के हर नागरिक तक हेल्थ सिस्टम की पहुंच रही और इसके लिए न उन्हें कोई कीमत चुकानी पड़ी और न ही इंश्योरेंस क्लेम करना पड़ा.

-कनाडा ने 11 बिलियन डॉलर की रकम तुरंत महामारी से निपटने के लिए जारी कर दी.

-कनाडा ने सख्ती से क्वॉरंटाइन के नियमों का लोगों से पालन करवाया. नियमों का उल्लंघन करने वालों पर भारीभरकम जुर्माने के साथ जेल का प्रावधान भी रखा गया.

जर्मनी ने बचाव के लिए ये उपाय अपनाए
इसी तरह से जर्मनी ने ये उपाय किए

-जर्मनी ने बड़े पैमाने पर लोगों के संक्रमण की जांच की. हर हफ्ते करीब 5 लाख लोगों के टेस्ट हुए.

-जर्मनी की सरकार अपने बिजनेस को बचाने के लिए कई तरह की स्कीम लेकर आई. महामारी के असर से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए सरकार ने उद्योग धंधों को आर्थिक मदद दी.

-जब मौत की संख्या सिर्फ 94 थी, उसी वक्त जर्मनी ने लॉकडाउन की तरह की पाबंदी लगा दी.

-जर्मनी ने भी नेशनल प्लान लागू किया. यहां का हेल्थ केयर सिस्टम ज्यादा फैला हुआ है. फेडरल सरकार के लेवल पर इनपर निगाह रखी गई.

-सोशल डिस्टेंसिंग और सेल्फ आइसोलेश को लेकर लोगों को प्रोत्साहित किया गया. स्थानीय सरकारों ने इसका पालन करवाने के लिए सख्ती की.

साउथ कोरिया ने संक्रमण से बचने के लिए ये सावधानियां बरतीं
इस तरह से साउथ कोरिया ने इस तरह के उपाय किए

-साउथ कोरिया की महामारी से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाया.

-साउथ कोरिया ने बड़े पैमाने पर लोगों के टेस्ट किए. टेस्ट की सुविधा ऐसी थी कि लोगों के पार्किंग एरिया में खड़े-खड़े ही उन्हें रिजल्ट बता दिया जाता. पॉजिटिव मामलों को क्वॉरंटाइन किया गया.

-संक्रमण के मामलों को ट्रेस करने के लिए जियो ट्रैकिंग और सीसीटीवी कैमरे का इस्तेमाल हुआ.

-सरकार ने मास्क और दूसरे जरूरी मेडिकल उपकरणों का डिस्ट्रीब्यूशन अपने हाथ में रखा. साउथ कोरिया ने पिछली महामारी में ये अनुभव किया था कि ऐसे वक्त में जरूरी चीजों की अक्सर कमी पड़ जाती है.

-पॉजिटिव पाए गए व्यक्तियों की सरकार ने आर्थिक मदद की. घरों में रहने के दौरान लोगों के खर्च सरकार ने उठाए.

ऑस्ट्रेलिया ने बचाव के ये तरीके अपनाए
इसी तरह से ऑस्ट्रेलिया ने इस तरह के उपाय किए-

-ऑस्ट्रेलिया ने सभी प्रांतों और हेल्थ प्रोफेशनल्स की मदद से नेशनल प्लान बनाया. हर राज्य को संक्रमण से बचने के लिए कुछ अधिकार दिए गए. कुछ राज्यों ने अपनी सीमा पूरी तरह से सील कर दी.

-यात्रा को लेकर सख्त प्रतिबंध लगाए गए. बाहर से आने वाले ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों को 15 दिन के आइसोलेशन में रखा गया.

-पूरे देश में कोरोना के संक्रमण की स्क्रीनिंग को आसान बनाया गया.

-सोशल डिस्टेंसिंग और आइसोलेशन को कड़ाई से लागू किया गया. सभी गैर जरूरी सेवाओं पर रोक लगा दी गई.

-ऑस्ट्रेलिया ने करीब 2.4 बिलियन डॉलर की रकम अपने हेल्थ केयर सिस्टम पर खर्च की.

भारत ने इस तरह से किया सबसे बड़ी चुनौती का सामना
सबसे बड़ी चुनौती भारत के सामने थी. एक विकासशील और घनी आबादी वाले देश भारत के सामने संकट बड़ा था. लेकिन भारत ने इस तरह के उपाय करके संक्रमण के नुकसान को काफी कम रखने में कामयाब रहा.

-भारत को इस बात की जानकारी थी कि विदेश से आने वाले यात्रियों से सबसे ज्यादा संक्रमण फैलेगा, इसलिए इस बारे में भारत ने सबसे पहले कदम उठाए. 26 फरवरी को ही भारत ने चीन, साउथ कोरिया और ईरान से आने वाले लोगों के वीजा को रद्द कर दिया. इन देशों से आने वाले पॉजिटिव केसों को 15 दिनों के लिए आइसोलेशन में रखा गया. 18 मार्च को विदेश से आने वाले सभी नागरिकों पर बैन लगा दिया गया. भारत में आने वाले हर शख्स की कोविड-19 की जांच जरूरी कर दी गई. 5 फरवरी से ही विदेशों से आने वाले नागरिकों की स्क्रीनिंग शुरू हो गई थी.

- भारत को पता था कि बड़े पैमाने पर संक्रमण का इलाज संभव नहीं है. इसलिए पहले पीएम ने एक दिन के जनता कर्फ्यू की घोषणा की और इसके तुरंत बाद 24 मार्च को लॉकडाउन लगा दिया. आधुनिक इतिहास में ये सबसे बड़ा लॉकडाउन रहा, जिसे बाद में 3 मई तक के लिए बढ़ा दिया गया.

-भारत के राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें हैं. ऐसे में कोई एक नेशनल प्लान बनाना संभव न था. लेकिन इस संकट से निपटने में राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार की भरपूर मदद की. केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय नजर आया.

-भारत ने कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वालों को कड़ाई से क्वॉरंटाइन किया. 2 अप्रैल को आरोग्य सेतु के नाम से एक ऐप लॉन्च किया गया. इसके जरिए संक्रमित लोगों के संपर्क में आए व्यक्तियों की जियो ट्रैकिंग की गई.

-भारत ने नए तरह के ट्रायल किए. संक्रमितों पर एंटी मलेरिया, एंटी स्वाइन प्लू और एंटी एचआईवी दवाइयों का ट्रायल किया गया. इसके शुरुआती नतीजे काफी सकारात्मक रहे. 23 मार्च को सरकार ने इलाज में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को गंभीर मरीजों और हेल्थ प्रोफेशनल्स पर इस्तेमाल की इजाजत दी. भारत में इस दवा का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है.

- 26 मार्च को भारत सरकार ने कोरोना से निपटने के लिए 24 बिलियन डॉलर के रिलीफ पैकेज का ऐलान किया. इसमें सबसे ज्यादा रकम फूड सिक्योरिटी और डायरेक्ट कैश ट्रांसफर योजनाओं पर खर्च किए जाएंगे.

-भारत ने स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग को बढ़ावा दिया. सार्क और दक्षिण एशियाई देशों को एकसाथ लाकर रणनीति बनाई. भारत ने जी20 के देशों से भी एकसाथ आकर अंतरराष्ट्रीय नीति बनाने की अपील की.

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