कोविड-19 वैक्सीन की रेसः निर्णायक भूमिका में हंगरी की एक ग्रामीण कंपनी

फाइजर और ऑक्सफोर्ड कुछ ही महीनों में कोरोना वैक्सीन बाजार में उतार सकती हैं. (सांकेतिक तस्वीर)
फाइजर और ऑक्सफोर्ड कुछ ही महीनों में कोरोना वैक्सीन बाजार में उतार सकती हैं. (सांकेतिक तस्वीर)

कोरोनावायरस वैक्सीन (Covid-19 Vaccine) के विकास में हंगरी की रिटायर्ड प्रोफेसर नोएमी लुकास (Noemi Lukacs) की छोटी सी कंपनी बड़ी भूमिका निभा सकती है. इनके ग्राहकों में अमेरिकी कंपनी फाइजर (PFizer) और जर्मन कंपनी बॉयोएनटेक (BioNTech) जैसे बड़े नाम हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 16, 2020, 5:57 AM IST
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नई दिल्ली. कोविड-19 वैक्सीन (Covid-19) बनाने में जुटी दिग्गज फार्मा कंपनियों के लिए हंगरी का एक छोटा सा गांव मील का पत्थर साबित हो सकता है. 71 वर्षीय बायोलॉजिस्ट नोएमी लुकास (Noemi Lukacs) अपने पैतृक गांव जीरक में जन्मी और यहीं उनकी छोटी सी कंपनी है, बमुश्किल एक कमरे से शुरू हुई थी. नोएमी का छोटा सा परिवार कोविड-19 के खिलाफ एक अहम लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने में जुटा है.

सेवानिवृत्त नोएमी लुकास, इंग्लिश एंड साइंटिफिटिक कंसल्टिंग (SciCons) की स्थापना और एक बेहद प्रभावी जेनेटिक सेंसर के निर्माण के लिए इतनी संवेदनशील हैं कि कुछ ग्राम एक साल के लिए पूरे वैश्विक उद्योग को सप्लाई कर सकते हैं.

लुकास का एक मंजिला घर अब वर्ल्ड क्लास लैबोरेट्री बन चुका है. लुकास इसी घर में जन्मी थीं और यहां बनने वाला सफेद पाउडर पूरी दुनिया में भेजा जाता है, एक बार में कुछ माइक्रोग्राम... रॉयटर्स से बातचीत में लुकास ने कहा, "हम मोनोक्लोनल एंटीबॉडी बनाते हैं."



उन्होंने कहा, 'ये एंटीबॉडी डबल स्टैंडर्ड आरएनए (dsRNA) को पहचानते हैं." डीएसआरएनए नकल करने वाले वायरस का एक बाय-प्रोडक्ट है. इसकी मौजूदगी एक जीवित वायरस की उपस्थिति का संकेत देती है, जो वायरस से जुड़े रिसर्च में लंबे समय तक काम आ सकती है.
महत्वपूर्ण ये है कि डीएसआरएनए अमेरिकी फॉर्मा कंपनी फाइज़र (Pfizer) और जर्मनी की बॉयोएनटेक (BioNTech) कंपनी द्वारा बनाई गई कोविड-19 वैक्सीन के लिए उपयोग की गई प्रक्रिया का बायप्रोडक्ट है. पिछले हफ्ते फाइजर ने दावा किया था कि उसकी बनाई गई वैक्सीन शुरुआती ट्रायल में 90 फीसदी से ज्यादा कामयाब रही है.

हालांकि डीएसआरएनए मानव कोशिकाओं के लिए हानिकारक हो सकता है. इसलिए पब्लिक यूज से पहले किसी वैक्सीन से फिल्टर किया जाना चाहिए. फिल्टरिंग के कई तरीके मौजूद हैं, लेकिन क्वालिटी कंट्रोल के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला तरीका वैक्सीन को लुकास के मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के प्रति एक्सपोज करना है.

इस प्रक्रिया के चलते एंटीबॉडी ना केवल ये दर्शाएगी कि वैक्सीन में कोई डीएसआरएनए मौजूद है कि नहीं, बल्कि रिसर्चरों को ये भी पता चलेगा कि कितनी मात्रा में मौजूद है. एक बार पूरी तरह से डीएसआरएनए से मुक्त होने के बाद वैक्सीन को उपयोग किया जा सकता है.

विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर ने वैक्सीन विकसित करने की रेस का बारीकी से अध्ययन किया और खासतौर से उन कंपनियों को चिन्हित किया, जो वैक्सीन की रेस में पहले आने को तैयार दिखती हैं, जो मानव कोशिकाओं को प्रशिक्षित करने और कोविड वायरस को मारने के लिए संशोधित आरएनए का उपयोग करते हैं. इस रेस में लुकास ने आरएनए पर दांव लगाया है.

संशोधित RNA या mRNA नई दवाओं के एक ग्रुप की मेथोडोलॉजी है. इस मेथोडोलॉजी में कोविड-19 वैक्सीन पहला प्रोडक्ट है, जिसको रेगुलेटरी अप्रूवल मिलने के बाद बड़े पैमाने पर उत्पादित किया जा सकेगा.

हंगरी की एक और महिला कटालिन कारिको ने उस मेथड का पेटेंट कराया है जो आरएनए के उपयोग को सक्षम बनाता है. ये मेथड ना केवल कोरोनावायरस से बल्कि दुनिया को अन्य बीमारियों से भी मुक्ति दिलाने का वादा करता है. कारिको अब जर्मन कंपनी बायोएनटेक की वाइस प्रेसिडेंट हैं. इस महीने की शुरुआत में जर्मन कंपनी ने अमेरिकी कंपनी फाइजर की तरह दावा किया था कि उन्होंने कोरोनावायरस की वैक्सीन बनाने में आशातीत सफलता हासिल कर ली है. कारिको, लुकास की कंपनी साइकॉन्स की शुरुआती ग्राहक हैं.

कंपनी की चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर और लुकास की बेटी जोहान्ना सिम्मन्स ने कहा, 'हमें ज्यादा से ज्यादा बेचकर खुशी होगी.' हालांकि महामारी का समाधान ढूंढ़ने में लगी मशीनरी का हिस्सा होने के अपने फायदे होते हैं. गर्व से भरी सिम्मन्स ने कहा, 'वैक्सीन निर्माताओं के साथ हमने सहयोग किया है और ज्यादातर mRNA पद्धति का उपयोग कर रहे हैं. इस बड़ी मशीन का हम छोटा सा पेंच हैं.'
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