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रेड क्रॉस प्रमुख ने दी चेतावनी, कहा-कोविड-19 को हराने के लिए 'फेक न्यूज' महामारी से निपटना जरूरी

रेड क्रॉस प्रमुख ने जॉन्स हॉप्किन्स की एक स्टडी का हवाला दिया था. जिसमें कहा गया है कि इस साल जुलाई से अक्टूबर के बीच वैक्सीन को लेकर स्वीकार्यता में काफी गिरावट देखी गई है.. सांकेतिक फोटो (Pixabay)
रेड क्रॉस प्रमुख ने जॉन्स हॉप्किन्स की एक स्टडी का हवाला दिया था. जिसमें कहा गया है कि इस साल जुलाई से अक्टूबर के बीच वैक्सीन को लेकर स्वीकार्यता में काफी गिरावट देखी गई है.. सांकेतिक फोटो (Pixabay)

फ्रांसेस्को रोका (Francesco Rocca) ने 67 देशों में हुई जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की स्टडी का हवाल दिया. इस स्टडी में पाया गया था कि इस साल जुलाई से अक्टूबर के बीच वैक्सीन को लेकर स्वीकार्यता में काफी गिरावट देखी गई है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 2, 2020, 5:23 PM IST
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नई दिल्ली. कोरोना वायरस (Corona Virus) महामारी के खात्मे के लिए वैक्सीन का इंतजार किया जा रहा है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस (International Red Cross) के अध्यक्ष फ्रांसेस्को रोका ने एक दूसरी महामारी (Second Pandemic) की ओर भी इशारा किया है. उन्होंने वैक्सीन को फैल रहे संदेह और गलत जानकारी (Misinformation) को लेकर चिंता जताई है. वहीं, उन्होंने सरकारों से इस मामले में कदम उठाने की अपील भी की है. रोका ने कहा कि कोविड-19 की वैक्सीन (Covid-19 Vaccine) जल्द ही आ रही हैं, लेकिन दूसरी महामारी हमारी कोशिशों को खराब कर सकती हैं.

सोमवार को हुई एक वर्चुअल मीटिंग के दौरान रोका ने कहा कि सरकारों को संदेह और फैल रही गलत जानकारी के खिलाफ लड़ने के लिए उपाय करने की जरूरत है. उन्होंने कहा, 'कोविड-19 को हराने के लिए हमें उसके साथ चल रही संदेह की महामारी को भी हराना होगा. यह वह महामारी है, जिसने इस बीमारी को लेकर रही हमारी प्रतिक्रियाओं में रुकावट डाली है. यह इसके खिलाफ हमारी टीकाकरण की सारी क्षमताओं को कमजोर कर सकता है.'





उन्होंने कहा कि दुनिया भर में वैक्सीन को लेकर संकोच बढ़ा है. इसके लिए उन्होंने 67 देशों में हुई जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की स्टडी का हवाला दिया. इस स्टडी में पाया गया था कि इस साल जुलाई से अक्टूबर के बीच वैक्सीन को लेकर स्वीकार्यता में काफी गिरावट देखी गई है. इसके अलावा दूसरे स्वास्थ्य उपायों को लेकर भी लोगों के मन में भरोसा कम हुआ है.
रोका ने कहा, 'कोविड-19 महामारी की शुरुआत से ही इतने बड़े स्तर पर संदेह साफ सबूत है.' उन्होंने कहा 'साफ है कि यही वजह रही, जिसने सभी स्तरों पर वायरस के फैलने को आसान बनाया.' इसे लेकर उन्होंने मास्क का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों में कितने लोग हैं, जो चेहरे पर मास्क नहीं लगाना चाहते. संदेह और गलत जानकारी एक वैश्विक मुद्दा है.

अभी भी कई लोगों को महामारी के बारे में नहीं पता
रोका ने कहा 'यह केवल संदेह का मुद्दा नहीं है. यह मुद्दा है जानकारी का. यह सुनकर आश्चर्य हो सकता है कि अभी भी ऐसे समुदाय हैं, जो महामारी को लेकर जागरूक नहीं हैं.' उन्होंने कहा कि ऐसे समुदाय आमतौर पर ज्यादा खतरे में और हाशिए पर होते हैं. जो संचार के माध्यमों से दूरी पर होते हैं. इसके लिए उन्होंने पाकिस्तान का उदाहरण दिया है. उन्होंने फेडरेशन सर्वे के हवाले से बताया कि 10 फीसदी शामिल लोग कोविड-19 के बारे में नहीं जानते हैं.
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