जर्मन यूनिवर्सिटी कुछ नहीं करने का देगी 1.4 लाख रुपये ग्रांट, 15 सितंबर तक करें आवेदन

जर्मन यूनिवर्सिटी कुछ नहीं करने का देगी 1.4 लाख रुपये ग्रांट, 15 सितंबर तक करें आवेदन
जर्मनी की यूनिवर्सिटी आलसियों को ग्रांट दे रही है.

जर्मनी की यूनिवर्सिटी (University of German) आलस्य के लिए छात्रवृत्ति (Scholarships) दे रही है और उन लोगों को भी पैसा देने को तैयार हैं जो कम से कम काम करते हों.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 24, 2020, 5:26 PM IST
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बर्लिन. जर्मन यूनिवर्सिटी (German University)  ऐसे लोगों को ग्रांट (Grant to lazy people) दे रही है जो कुछ नहीं करना चाहते हैं. दरअसल, जर्मनी की यूनिवर्सिटी आलस्य के लिए छात्रवृत्ति (Scholarships) दे रही है और उन लोगों को भी पैसा देने को तैयार हैं जो कम से कम काम करते हों. हैम्बर्ग में यूनिवर्सिटी ऑफ़ फाइन आर्ट्स एक अनोखे प्रोजेक्ट में भाग लेने के लिए ऐसे लोगों की तलाश कर रहा है जो आलसी हों और जिनमें महत्वाकांक्षा की कमी हो.

आवेदकों को दिलाना होगा ये भरोसा...

आवेदकों को यूनिवर्सिटी के शिक्षाविदों को यह भरोसा दिलाना होगा कि 1600 यूरो की तीन छात्रवृत्तियों में से एक को जीतने के लिए दिलचस्प तरीके से किस तरह निष्क्रिय होंगे. एप्लीकेशन फॉर्म में आवेदक से दो सवाल पूछे गए हैं पहला आप क्या नहीं करना चाहते हैं और जो आप करना नहीं चाहत हैं, वह न करना क्यों महत्वपूर्ण है? इसके लिए आवेदक 15 सितंबर तक आवेदन कर सकते हैं.



निरंतर सफलता की दौड़ से बाहर निकलना है लक्ष्य
इस परियोजना को डिजाइन करने वाले प्रोफेसर फ्रेडरिक वॉन बोरिस के अनुसार आर्थिक -सामाजिक" परिवर्तन लाने में मदद करने के लिए आलसीपन का बारीकी से अध्ययन करना महत्वपूर्ण है. यह प्रयोग जीवन में निरंतर सफलता प्राप्त करने की दौड़ से बाहर निकलने और गोल गोल घूमते जा रहे जीवन के पहिये से अलग हटने से जुड़ा है. जर्मनी भर के आवेदकों को 15 सितंबर से पहले सक्रिय निष्क्रियता अपनी योजना से जुड़े विचारों को जमा करना होगा.

मेरे पास इन बातों के लिए समय है

दूसरी ओर प्रोफेसर वॉन बोर्रीस ने जर्मनी के ड्यूश वेले प्रसारक को बताया कि अगर हम ऐसे समाज में रहना चाहते हैं जो कम ऊर्जा खपत करता है, कम संसाधनों को बर्बाद करता है, तो यह मूल्यों की सही व्यवस्था नहीं है. उन्होंने कहा कि क्या यह कहकर सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल करना अच्छा नहीं होगा कि मेरे पास सपने देखने का समय है... दोस्तों से मिलने का समय है, पाँव पर पाँव रख कर आराम करने का समय है, मेरे पास कुछ भी न करने के लिए समय है.

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बहुत से लोग इस बात से आश्वस्त नहीं है कि यह परियोजना सार्थक सिद्ध होगी. प्रोफेसर वॉन बोरिस ने कहा कि जर्मनी के करदाताओं के संघ ने इस विचार पर सवाल उठाया है और यह जानने की मांग की है कि यह प्रयोग कौन कर रहा है. यह परियोजना अगले साल हैम्बर्ग विश्वविद्यालय के ललित कला विश्वविद्यालय में नियोजित एक बेहतर जीवन की ओर विषय की एक प्रदर्शनी का हिस्सा बनेगी.
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