OPINION: इस तरह पाकिस्तान को गहरी चोट पहुंचा सकता है ब्रेक्जिट

बोरिस जॉनसन के ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने के बाद वहां की परिस्थितियों में तो बदलाव आएगा ही. इसके साथ ही दुनिया के कुछ खास देशों पर भी इसका सीधा असर होगा. पाकिस्तान भी इससे नहीं बच पाएगा. जानिए कैसे?

Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: July 25, 2019, 6:43 PM IST
OPINION: इस तरह पाकिस्तान को गहरी चोट पहुंचा सकता है ब्रेक्जिट
बोरिस जॉनसन के ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने के बाद वहां की परिस्थितियों में तो बदलाव आएगा ही. इसके साथ ही दुनिया के कुछ खास देशों पर भी इसका सीधा असर होगा. पाकिस्तान भी इससे नहीं बच पाएगा. जानिए कैसे?
Santosh K Verma
Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: July 25, 2019, 6:43 PM IST
थेरेसा मे के उत्तराधिकार के लिए बोरिस जॉनसन और जेरेमी हंट के बीच प्रतिस्पर्धा मे जॉनसन विजेता बन कर सामने आए हैं. अब उन्होंने ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री के रूप में पदभार भी संभाल लिया है. पिछले वर्षों में ब्रिटेन के आर्थिक और राजनैतिक परिदृश्य में गहरे नाटकीय परिवर्तन आए हैं. इन परिवर्तनों के केंद्र में ब्रेक्जिट की केंद्रीय भूमिका रही है. इसने ब्रिटेन को यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने और न निकलने का मन्तव्य रखने वाले लोगों में बांट दिया है. अब वर्तमान प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन सार्वजानिक रूप से यह कहते आ रहे हैं कि ब्रिटेन हर हाल में इस वर्ष 31 अक्टूबर को यूरोपियन यूनियन से बाहर निकल जाएगा, तो स्थितियां अधिक स्पष्ट हो गई हैं.

1951 में यूरोपियन कोल एंड स्टील कम्युनिटी से शुरू होकर यूरोपीय देशों को आर्थिक और राजनैतिक रूप से जोड़ने, समान नागरिक अधिकारों, एकल मुद्रा और समेकित विदेश नीति के साथ, सभी यूरोपीय देशों को एकजुट करने और उन्हें एक साथ, एक मजबूत शक्ति बनाने के लिए माश्ट्रिश्ट की संधि के बाद 1993 में वर्तमान रूप में यह संगठन आया था. तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरोन के कार्यकाल में 23 जून 2016 में आयोजित एक जनमत संग्रह में ब्रिटेन के लोगों ने यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने के पक्ष में वोट किया. अब, जब ब्रिटेन का यूरोपियन यूनियन से निकलना अवश्यम्भावी हो गया है तो ऐसी स्थिति में यूरोपियन यूनियन और ब्रिटेन से गहन सम्बन्ध रखने वाले देशों पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है. इस स्थिति से पाकिस्तान भी अछूता नहीं रह सकता है.

ब्रिटेन की भूमिका
यूरोपीय संघ पाकिस्तान का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है. 2016 में यूरोपीय संघ को पाकिस्तान का कुल निर्यात 6.92 अरब डॉलर का रहा. यूरोपीय संघ को किए जाने वाले कुल पाकिस्तानी निर्यात का 23 फीसदी ब्रिटेन को जाता है, जिसका मूल्य 2016 में 1.56 अरब डॉलर था. यह 2018 में बढ़कर 1.7 अरब डॉलर हो गया. अगर केवल ब्रिटेन की बात करें तो यूरोप में पाकिस्तान का सबसे बड़ा और और विश्व में तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. इसके साथ ही साथ एक राष्ट्र के रूप में इसकी स्थापना से लेकर अब तक, ब्रिटेन अपने इस पूर्व उपनिवेश के प्रति अत्यधिक उदार रहा है, जिसका एक उदाहरण यह है कि कैसे पाकिस्तान को यूरोपियन यूनियन में व्यापार सम्बन्धी छूट दिलाने में ब्रिटेन ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया.

कितना महत्वपूर्ण है जीएसपी प्लस
2014 से पाकिस्तान "कमजोर" विकासशील देशों के लिए यूरोपीय संघ के तरजीही व्यापार कार्यक्रम का प्रमुख लाभार्थी रहा है. इसे Globalized System of Preferences plus (जीएसपी +) के रूप में जाना जाता है. यह योजना पाकिस्तान के निर्माताओं, विशेष रूप से पाकिस्तानी कपड़ा निर्माताओं को यूरोप में शुल्क मुक्त पहुंच उपलब्ध कराती है. इसके बदले में यूरोप पाकिस्तान से मानवाधिकारों, कार्य स्थितियों, जलवायु परिवर्तन और सुशासन जैसे सुधारों को लागू करने की अपेक्षा रखता है, जो साधारणतया कभी पूरी नहीं हो पाती. पाकिस्तान को यह सुविधा उपलब्ध कराने में ब्रिटेन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने 2014 के यूरोपीय चुनाव में कहा था कि ‘यह हम ब्रिटेन थे, , जिसने सुनिश्चित किया कि पाकिस्तान को यूरोपीय संघ में टैरिफ-मुक्त पहुंच मिले.’

ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान. (फाइल फोटो)

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यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के बाहर निकलने का एक संभावित परिणाम है जीएसपी + का समाप्त किया जाना, जो पाकिस्तान के लिए एक गहरा आघात सिद्ध हो सकता है. इसकी वजह यह है कि इस कार्यक्रम का, जिसमें कुछ अन्य कमजोर देशों जैसे फिलीपींस और श्रीलंका को भी समाहित किया गया है, सबसे बड़ा हितग्राही पाकिस्तान ही है. जीएसपी + के जरिए यूरोपियन यूनियन में किये गए आयातों का लगभग 82 प्रतिशत हिस्सा कपड़े और तैयार वस्त्र हैं. यूरोपियन यूनियन में आयात किए जाने वाली इन मदों का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान से ही आयात किया जाता है. जीएसपी + में शामिल होने के बाद पाकिस्तान के यूरोपियन यूनियन को किए गए निर्यातों में उल्लेखनीय वृद्धि भी देखी गई है. 2014 में इसके अमल में आने के बाद अगले से तीन वर्षों में यूरोपीय संघ के लिए पाकिस्तान का निर्यात 38 प्रतिशत तक बढ़ गया, जिसने यूरोपीय संघ को पाकिस्तान के सबसे बड़े व्यापार भागीदार के रूप में बदल दिया.

वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यूरोपीय संसद के अन्दर भी यह माना जा रहा है कि ब्रिटेन की यहां से विदाई के बाद पाकिस्तान अपना एक संरक्षक खो देगा. इसके परिणामस्वरूप वह अलग-थलग पड़ सकता है. 2014 में ब्रिटेन ने अपने प्रभाव के बलबूते पर जीएसपी + की सुविधा पाकिस्तान को दिलवा दी थी, परन्तु जनवरी 2020 में इसका नवीकरण होना है, जो वर्तमान हालात के चलते मुश्किल ही लगता है.


यूरोपीय संघ के कई देशों विशेषकर जर्मनी और फ्रांस, पाकिस्तान में मानवाधिकारों के निम्न दर्जे के रिकॉर्ड को लेकर गहरी चिंताएं प्रकट करते आए हैं. 2014 में यह दर्जा मिलने के तुरंत बाद ही पाकिस्तान में एक बार फिर से मृत्युदंड को अस्तित्व में लाया गया, जो यूरोपीय संघ के लिए एक वर्जित प्रणाली है और जिसने पाकिस्तान के विरुद्ध भावनाओं को उभारा है. इसके साथ ही साथ पाकिस्तान वर्कर्स कन्फेडरेशन जो जीएसपी + कार्यक्रम के स्थानीय मॉनिटरिंग एजेंसी में से एक हैं, के द्वारा पिछले साल अक्टूबर में प्रकाशित एक रिपोर्ट में पाकिस्तान के श्रम अधिकारों पर प्रगति में कमी को रेखांकित किया गया है. मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में महिलाओं के अधिकारों पर प्रगति, धार्मिक स्वतंत्रता, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की सुरक्षा की स्थिति भी खराब बनी हुई है.

ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था का सीधा प्रभाव
अगर हम ब्रिटेन के दृष्टिकोण से देखें तो यूरोपीय संघ ब्रिटेन के निर्यात का भी सबसे बड़ा बाजार है. ब्रेक्जिट के बाद अगर वह व्यापार की उपयुक्त स्थितियों को गंवा देता है, तो ऐसी स्थिति में ब्रिटेन के निर्यात में भारी गिरावट आएगी. इसका सीधा प्रभाव पाकिस्तान के उन निर्यातों पर भी पड़ेगा जो ब्रिटेन होते हुए यूरोपियन यूनियन में जाते हैं. साथ ही, अगर ब्रेक्जिट के बाद, ब्रिटेन यूरोपीय संघ के बाजारों तक सुगमता से पहुंच बनाने में सफल न हो पाया, तो ऐसे उत्पाद भी परेशानी में आ जाएंगे, जो पाकिस्तान से होकर यूरोपियन यूनियन को निर्यात होते हैं. इससे पाकिस्तान को निर्यात से होने वाली विदेशी मुद्रा में भारी कमी आ सकती है.

Pakistan Prime Minister Khan meets with U.S. President Trump at the White House in Washington
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान. (फाइल फोटो)


ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति में गिरावट का सीधा नकारात्मक असर पाकिस्तान में ब्रिटेन के विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर पड़ेगा. इसके साथ ही पाकिस्तान से ब्रिटेन को होने वाले माइग्रेशन की गति शिथिल हो सकती है. ज्ञातव्य है कि ब्रिटेन पाकिस्तानियों का सर्वाधिक पसंदीदा स्थान है, जहां वे बसना चाहते हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार ब्रिटेन में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के नागरिकों की संख्या लगभग 12 लाख थी. इसमें वीसा के आधार पर जाने वाले प्रवासी सम्मिलित नहीं हैं. यूरोपीय संघ के लिए पाकिस्तानी निर्यात मुख्यत: कपड़ा, कपड़े और चमड़े के उत्पाद और चावल हैं. कपड़ा और तैयार वस्त्र यूरोपीय संघ को निर्यातों का लगभग 75 प्रतिशत और चमड़े का सामान का हिस्सा अतिरिक्त 10 प्रतिशत तक है. चावल निर्यात का एक बड़ा हिस्सा ब्रिटेन में ही संसाधित किया जाता है. अब इसे यूरोप भेजने में लागत बढ़ने का खतरा स्पष्ट है.

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में बाहर के देशों से आने वाला प्रेषण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. ब्रिटेन इसका एक महत्वपूर्ण स्रोत है, क्योंकि पाकिस्तान में कुल प्रेषण का लगभग 20 प्रतिशत यहीं से जाता है, जबकि शेष यूरोपियन यूनियन कुल श्रमिक प्रेषण का तीन प्रतिशत देता है. अगर ब्रेक्जिट के बाद पाउंड कमजोर होता है, जिसकी पूरी संभावना है, तो इससे ब्रिटेन में काम कर रहे प्रवासियों की वास्तविक आय में कमी आएगी. तदनुरूप उनके द्वारा भेजे जाने वाले प्रेषण के मूल्य में भी, जो विदेशी मुद्रा की कमी से गंभीरता से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए बड़ा आघात साबित होगी.

पाउंड और यूरो में गिरावट के क्या होंगे प्रभाव
पाउंड और यूरो में गिरावट का एक दुष्प्रभाव यह भी हो सकता है कि इससे जापानी येन और सोना तुलनात्मक रूप से बेहतर, सुरक्षित और आकर्षक निवेश का साधन बन जाएं. येन के मूल्य बढ़ने का पाकिस्तान के ऑटोमोबाइल क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि पाकिस्तान में इससे सम्बन्धी मशीनरी और कलपुर्जों का आयात बड़ी मात्रा में जापान से ही किया जाता है.

इसके अलावा हाल के वर्षों में, ब्रिटेन पाकिस्तान के प्रमुख द्विपक्षीय दान दाताओं में प्रमुख स्थान बना चुका है. उसने पाकिस्तान के सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में कई कल्याणकारी परियोजनाओं का वित्तीयन किया है. चूंकि अब, जब ब्रिटेन की स्वयं की अर्थव्यवस्था के भाग्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं, ऐसी स्थिति में यह दयानतदारी कितनी चल पाती है यह कहना मुश्किल है.


पाकिस्तान में एक अतिआशावादी वर्ग का विश्वास है कि ब्रेक्जिट से पाकिस्तान पर कोई असर नहीं होने जा रहा है क्योंकि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था वैश्विक बाजारों से तुलनात्मक रूप से अछूती रही है, जो इस तथ्य से स्पष्ट है कि इसके निर्यात का हिस्सा जीडीपी में केवल 7 प्रतिशत है. परन्तु पाकिस्तान के बाजार का मानना इससे उलट है. 23 जून के जनमत संग्रह में यूरोपीय संघ छोड़ने के ब्रिटेन के फैसले के तत्काल बाद, पाकिस्तान के शेयर बाजारों में 1400 से अधिक अंकों की गिरावट आई थी, जो पाकिस्तान के ऑटो और टेक्सटाइल क्षेत्रों में व्याप्त घबराहट का परिणाम थी.
हालांकि ब्रिटेन और यूरोपीय संघ इस बात पर सहमत हुए हैं कि ब्रेक्जिट की तिथि से 31 दिसंबर 2020 तक, कोई भी बड़ा नीतिगत बदलाव नहीं किया जाएगा ताकि व्यापार वाणिज्य से सम्बंधित विषयों को समायोजित करने का मौक़ा मिल सके. हालांकि पाकिस्तान इस बात के लगातार प्रयास कर रहा है कि ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन के साथ एक मुक्त व्यापार समझौता करने में सफल हो जाए. परन्तु लगातार परिवर्तित होती परिस्थितियों में सब कुछ अनिश्चित ही है.

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था जिस भीषण दौर से गुजर रही है, ब्रेक्जिट उसके लिए एक गंभीर आघात सिद्ध हो सकता है. पाकिस्तान सरकार की अदूरदर्शी नीतियों के कारण पिछले वर्षों में पाकिस्तान की विकास दर 3 प्रतिशत के स्तर पर आ गई है और ऋणों के लगातार बढ़ते बोझ और उनके ब्याज के भुगतान तक में आ रहे संकट और घटते विदेशी मुद्रा कोष ने पाकिस्तान की वित्तीय नीतियों में निहित कमजोरियों को सामने ला दिया है. यह पाकिस्तान के लिए कठिन समय है. सारा दारोमदार उन क़दमों पर है जो वह अब उठाने जा रहा है, क्योंकि अब इन पर ही इस देश का भविष्य निर्भर करता है.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं)

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First published: July 25, 2019, 6:35 PM IST
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