दर्द में डूबे पिता ने कहा, मेरे हाथ से बच्चे फिसल गए

दर्द में डूबे पिता ने कहा, मेरे हाथ से बच्चे फिसल गए

तुर्की के समुद्र तट पर मृत पड़े मिले सीरिया के तीन साल के बच्चे की तस्वीर देखकर पूरी दुनिया में लोगों ने संवेदनाएं व्यक्त की हैं।

  • News18India
  • Last Updated: September 4, 2015, 2:37 PM IST
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तुर्की। तुर्की के समुद्र तट पर मृत पड़े मिले सीरिया के तीन साल के बच्चे आयलान की तस्वीर देखकर पूरी दुनिया सकते में है। इस तस्वीर ने कईयों की आंखें नम कर दी हैं। सोशल मीडिया पर ये तस्वीर वायरल हो गई है और लोग शरणार्थियों के हालात पर सोचने को मजबूर हो गए हैं।

इस बच्चे के पिता अब्दुल्ला कुर्दी ने कहा कि उसका बच्चा उसके हाथों से उस समय फिसल गया जब क्षमता से ज्यादा लोगों से भरी उनकी बोट ग्रीस के रास्ते में पलट गई। इस हादसे में अब्दुल्ला ने अपने तीन साल के बेटे आयलान, चार साल के बेटे गालेब और पत्नी रिहाना को गंवा दिया।

ये हादसा तब हुआ जब अब्दुल्ला इस कोशिश में लगा था कि वो सीरिया के कोबेन से निकलकर ग्रीस के कोस द्वीप पर पहुंच जाए। उनकी बोट जब गहरे पानी में पहुंची और अंधेरा हो गया तो दिक्कतें आने लगीं और सभी डर गए। अब्दुल्ला ने बताया कि पानी में कुछ ही दूर जाने के बाद हमारे पैर गील हो चुके थे। लेकिन जैसे ही बोट पलटी, मैंने बोट को और अपने बच्चों को पकड़ कर रखा था। लेकिन कुछ ही देर में वे हाथों से फिसल गए। फिर मैंने किनारे तक तैरने की कोशिश की। वहां उन्हें देखा लेकिन वे वहां नहीं मिले। जब मुझे वे नहीं मिले तो मैं सीधे अस्पताल पहुंचा और वहां मुझे बुरी खबर मिली।



इस बच्चे की उम्र लगभग 3 साल है और इसका नाम आयलान कुर्दी है. एक बार देखने पर तो ऐसा लगता है कि बच्चा समुद्र किनारे गहरी नींद में सो रहा है। लेकिन दरअसल ये बच्चा उन 12 दुर्भाग्यशाली लोगों में से एक है जो आईएसआईएस के आतंक से बचने के लिए तुर्की में शरण लेने जा रहे थे। सारे लोग 2 नावों पर सवार थे लेकिन उनकी नाव समुद्र में ही पलट गई। सोशल मीडिया पर तीन साल के इस बच्चे की तस्वीरों ने सारी दुनिया में बड़ी बहस छेड़ दी है।
आयलान की इस दर्दनाक मौत के बाद फ्रांस, ब्रिटेन, इटली समेत कई देशों ने तय किया है कि वे शरणार्थियों को शरण देने के लिए और उदार नीति बनाएंगे। ये तस्वीर आईएसआईएस के आतंकियों की दहशत का खौफनाक चेहरा भी दिखाती है। 3 साल का आयलान इस दुनिया में नहीं है, लेकिन अपने पीछे एक सवाल जरूर छोड़ गया है। आखिर आतंक की चौखट पर मासूम कब तक दम तोड़ते रहेंगे।
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