सीमा विवाद: ये है वो वजह जिसके चलते अचानक नरम पड़ गए है चीन के सुर

सीमा विवाद: ये है वो वजह जिसके चलते अचानक नरम पड़ गए है चीन के सुर
बीते तीन दिनों में लगातार चीन (China) की तरफ से बातचीत के प्रयास हुए हैं और चीनी सरकार का रुख भी काफी नरम नज़र आ रहा है. इधर भारत (India) ने भी चीन के रुख में आए बदलाव को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के मध्यस्थता के प्रस्ताव को फिलहाल अस्वीकार कर दिया है.

बीते तीन दिनों में लगातार चीन (China) की तरफ से बातचीत के प्रयास हुए हैं और चीनी सरकार का रुख भी काफी नरम नज़र आ रहा है. इधर भारत (India) ने भी चीन के रुख में आए बदलाव को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के मध्यस्थता के प्रस्ताव को फिलहाल अस्वीकार कर दिया है.

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नई दिल्ली/बीजिंग. भारत और चीन के बीच सीमा विवाद (India-China Border Dispute) ने एकबार फिर दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देशों के रिश्तों में तनाव पैदा कर दिया है. हालांकि बीते तीन दिनों में लगातार चीन (China) की तरफ से बातचीत के प्रयास हुए हैं और चीनी सरकार का रुख भी काफी नरम नज़र आ रहा है. इधर भारत (India) ने भी चीन के रुख में आए बदलाव को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के मध्यस्थता के प्रस्ताव को फिलहाल यह कहकर अस्वीकार कर दिया है कि दोनों देशों में अच्छी बातचीत चल रही है. हालांकि चीन के रुख बदलने के पीछे उसकी बिगड़ती अर्थव्यवस्था को भी मन जा रहा है.

चीन के सरकारी मीडिया ने भी गुरूवार को कहा कि चीन और भारत को वर्तमान में सीमा पर जारी गतिरोध को हल करने के लिए अमेरिका की सहायता की जरूरत नहीं है. चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से ट्रंप के ट्वीट के जवाब में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आयी है लेकिन सरकारी समाचारपत्र 'ग्लोबल टाइम्स' में छपे एक लेख में कहा गया कि दोनों देशों को राष्ट्रपति ट्रंप की ऐसी सहायता की जरूरत नहीं है. इसमें कहा गया, 'हालिया विवाद को भारत और चीन द्विपक्षीय वार्ता से सुलझाने में सक्षम हैं. दोनों देशो को अमेरिका से सतर्क रहना चाहिए जो कि क्षेत्र में शांति और सद्भाव को बिगाड़ने के अवसर की तलाश में रहता है.'

भारत ने भी कहा-बातचीत चल रही है
भारत ने भी गुरुवार को कहा कि पूर्वी लद्दाख में सीमा गतिरोध को सुलझाने के लिए वह चीन के साथ सैन्य और राजनयिक स्तर पर बात कर रहा है. साथ ही उसने यह भी कहा कि देश अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करने के अपने सकंल्प पर 'अटल' है. मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि भारत वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है और भारतीय सैनिक सीमा प्रबंधन को लेकर बहुत जिम्मेदार रुख अपनाते हैं. उन्होंने ऑनलाइन मीडिया ब्रीफिंग में कहा, 'दोनों पक्षों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में उत्पन्न हो सकने वाली स्थितियों का वार्ता के जरिए शांतिपूर्ण समाधान करने के लिए सैन्य और राजनयिक स्तरों पर तंत्र स्थापित किए हैं और इन माध्यमों से चर्चा जारी रहती है.'



 



पूर्वी लद्दाख में पैंगोग त्सो, गलवान घाटी, देमचौक और दौलत बेग ओल्डी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच तीन सप्ताह से जारी तनावपूर्ण गतिरोध के बीच श्रीवास्तव ने वार्ता के जरिए मुद्दे का समाधान करने के लिए प्रयास जारी होने की यह बात कही है. रक्षा सूत्रों ने बताया कि भारतीय सेना ने संबंधित क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए सैनिकों, वाहनों और तोपों सहित सैन्य कुमुक भेजी हैं जहां चीनी सैनिक आक्रामक तेवर दिखा रहे हैं.

चीनी राजदूत ने दिए नरमी के संकेत
चीन के राजदूत सुन वीडोंग ने बुधवार को एक प्रकार से मेल-मिलाप की भाषा में कहा कि भारत और चीन ने कभी भी मतभेदों की छाया अपने समूचे द्विपक्षीय संबंधों पर नहीं पड़ने दी है और वे इस आधारभूत सिद्धांत को मानते हैं कि दोनों देश एक-दूसरे के लिए खतरा नहीं हैं. सैन्य गतिरोध का जिक्र किये बगैर वेइडोंग ने कहा कि दोनों देशों को अपने मतभेद बातचीत के जरिये सुलझाने चाहिए और इस बात का पालन करें कि उन्हें एक-दूसरे से खतरा नहीं है. उन्होंने कहा, 'हमें अपने मतभेदों को सही ढंग से देखना चाहिए और द्विपक्षीय सहयोग पर इन मतभेदों का असर नहीं पड़ने देना चाहिए. इसके साथ ही हमें बातचीत के माध्यम से इन मतभेदों का हल करना चाहिए.'

प्रधानमंत्री ली ने भी दी नसीहत
चीन के पीएम ली किकियांग ने गुरुवार को कहा कि अमेरिका समेत अभी देशों को फिलहाल कोरोना के इस मुश्किल समय में अपनी असहमतियों को दूर करना चाहिए और एक-दूसरे के 'मुख्य हितों' का सम्मान करना चाहिए. ली ने कहा, 'यह सच है कि वर्तमान में चीन और अमेरिका के बीच संबंधों में नयी समस्याएं और चुनौतियां आ गई हैं.' उन्होंने स्वीकार किया कि दोनों शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं के बीच संबंध कठिन दौर से गुजर रहा है. उन्होंने कहा, 'चीन-अमेरिका के बीच संबंधों को ठीक करना दोनों देशों और पूरी दुनिया के लोगों के हित में है.' ली ने कहा, 'हमने शीत युद्ध की मानसिकता को छोड़ दिया है और दोनों बड़ी अर्थव्यवस्था के बीच संबंध तोड़ने से किसी पक्ष का भला नहीं होगा और पूरी दुनिया को नुकसान होगा.'

 

चीन की हालत ठीक नहीं!
बीते शुक्रवार को चीन ने कहा कि वह इस साल आर्थिक वृद्धि के लिए कोई लक्ष्य तय नहीं कर रहा है. साल 1990 के बाद से ऐसा पहली बार हो रहा है जबकि चीन की सरकार ने इकनॉमिक ग्रोथ का टारगेट तय नहीं किया है. BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक आर्थिक वृद्धि के लक्ष्य तय न करना एक तरह से इस बात की स्वीकारोक्ति है कि कोरोना वायरस महामारी के बाद के दौर में चीन के लिए आर्थिक रिकवरी कितनी मुश्किल होगी. इन मुश्किलभरे हालात में बेरोज़गारी के आंकड़े और ज्यादा मुसीबत पैदा करने वाले साबित हो रहे हैं. मार्च के मुकाबले अप्रैल में बेरोज़गारी की दर मामूली बढ़कर 6 फीसदी पर पहुंच गई है जो कि बेरोज़गारी के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के नज़दीक है. हालांकि ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का कहना है कि वास्तविक आंकड़े और ज्यादा बुरे हैं.

थिंक टैंक कैपिटल इकनॉमिक्स ने बीबीसी से बातचीत में कहा है कि करीब 20 फ़ीसदी प्रवासी मजदूर शहरों को वापस नहीं लौटे हैं, ऐसे में बेरोज़गारी का असली आंकड़ा इसका करीब दोगुना तक हो सकता है. पेकिंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जस्टिन यूफू लिन मार्च में सिंघुआ यूनिवर्सिटी के एक सर्वे का हवाला देते हुए कहते हैं कि निजी उद्योगों में से करीब 85 फीसदी को अगले तीन महीने खुद को टिकाए रखने का संघर्ष करना होगा. वह कहते हैं, "उद्यमों के दिवालिया होने से बेरोजगारी में इज़ाफ़ा होगा."

जिनपिंग का वादा पूरा होना ज़रूरी!
गुजरे 40 साल से चीन की कम्युनिस्ट पार्टी देश के नागरिकों से अपना एक वादा निभाने में सफल रही है. यह वादा है- हम आपके जीवन की गुणवत्ता को सुधारेंगे और आप हमें सहयोग दीजिए ताकि हम चीन को सही रास्ते पर रख सकें. 2020 इस ग्रैंड प्लान का एक अहम हिस्सा होने वाला था और राष्ट्रपति शी जिनपिंग लगातार इस पर जोर दे रहे थे. अगर कोरोना नहीं आता टी ऐसी संभावना थी कि इस साल चीन अपने यहां गरीबी को पूरी तरह से खत्म कर देता और लाखों लोगों की जिंदगियों की गुणवत्ता और स्टैंडर्ड को ऊंचा किया जाना था.

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के चाइना सेंटर के एसोसिएट जॉर्ज मैग्नस कहते हैं कि इस दफ़ा चीजें अलग हैं. निजी सेक्टर भी दबाव में है. वह कहते हैं, 'उस वक्त कोई भी ट्रेड वॉर के बारे में बात नहीं कर रहा था. पूरी दुनिया की कंपनियां चीन को मैन्युफैक्चरिंग का काम दे रही थीं. अब पूरी दुनिया एक आर्थिक मुश्किल वक्त से गुजर रही है. इस वजह से कंज्यूमर डिमांड खत्म हो गई है. विदेश व्यापार के लिए कुछ नहीं बचा है. महामारी के आने से पहले चीन जिन मुश्किलात का सामना कर रहा था, कोरोना ने आकर उन्हें कई गुना बढ़ा दिया है. ऐसे में किसी भी देश के लिए जंग के बारे में सोचना नामुमकिन है और अगर वह ऐसी किसी भी स्थिति में पड़ता है तो स्थितियां और भी भयानक हो सकती हैं.

 

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First published: May 29, 2020, 10:27 AM IST
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