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इटली के डॉक्टर की आपबीती: मास्क और विशेष शूट के बाद भी खुद को कोरोना से नहीं बचा सकीं

News18Hindi
Updated: April 4, 2020, 1:37 PM IST
इटली के डॉक्टर की आपबीती: मास्क और विशेष शूट के बाद भी खुद को कोरोना से नहीं बचा सकीं
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फेडरिका बताती है कि दुनियाभर में भले ही कोरोना वायरस को उम्र के साथ जोड़कर भी देखा जा रहा हो लेकिन मेरे हॉस्पिटल में हर उम्र के लोग थे.

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मिलान. कोरोना वायरस (Coronavirus) के संक्रमण का असर सबसे ज्यादा इटली (Italy) में देखने को मिला है. इटली में कोरोना की महामारी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां के ज्यादातर घरों में कोई न कोई कोरोना संक्रमित मरीज जरूर है. इटली के मिलान में इमरजेंसी मेडिसिन स्पेशलिस्ट फेडरिका (34) बताती हैं कि वह हर दिन अस्पताल में कोरोना से संक्रमित मरीजों को जिंदगी और मौत से लड़ता देखती हैं. अस्पताल में भर्ती मरीज चाहते हैं कि वह जल्द से जल्द ठीक होकर अपने परिवार से मिलें लेकिन उनके अंदर मौत का खौफ भी साफ दिखाई देता है.

फेडरिका बताती है कि जब यह महामारी अपने शुरुआती दौर में थीं तब से ही वह अस्पताल में कोरोना पॉजिटिव मरीजों का इलाज कर रही हैं. फिलहाल उन्हें क्वारेंटाइन में रखा गया ​है. उन्होंने बताया​ कि इटली में कोरोना संक्रमित मरीजों के बीच रहते हुए उन्होंने सभी तरह की सावधानियां बरती थीं इसके बावजूद वो कोरोना संक्रमित हो गईं.

पिछले कुछ दिनों को याद करते हुए वह बताती हैं कि शुरुआत में इटली के लोडी और कोडोग्नो शहर में जब कोरोना वायरस के मामले बढ़ने लगे तभी हम समझ चुके थे ​कि इस सुनामी का अगला नंबर उनका शहर हो सकता है. उन्होंने कहा कि उस समय तक हम इन शहरों के हालात को देखकर बहुत कुछ सीख चुके थे. जैसा हमने सोचा था वैसा ही हुआ और बहुत जल्द इटली के मिलान शहर में भी महामारी ने दस्तक दे दी.



हम लोगों ने हॉस्पिटल के इमरजेंसी रूम को दो हिस्सों में बांट दिया था. एक बड़ा हिस्सा कोरोना के मरीजों के लिए था और दूसरा हिस्सा अन्य मरीजों के लिए रखा गया था. लेकिन देखते ही देखते सब कुछ बदल गया और मरीजों को रखने के लिए जगह कम पड़ने लगी. फेडरिका ने बताया कि हॉस्पिटल में जो कोई भी आता था उसकी एक ही बीमारी थी. वह खांसी, बुखार और सांस लेने की तकलीफ से परेशान था. हमारी तैयारी काफी अच्छी थी इसके बावजूद हर दिन हॉस्पिटल में भीड़ बढ़ती जा रही थी. मरीजों की संख्या बढ़ने के साथ हमारा काम भी बढ़ गया और हमने 12 से 13 घंटे काम करना शुरू कर दिया. उन्होंने बताया कि इमरजेंसी रूम में घुसने से पहले उन्हें मास्क और विशेष तरह के गॉगल्स दिए जाते. मास्क तो इमरजेंसी रूम से बाहर आते ही डिस्पोज कर दिए जाते, लेकिन गॉगल्स को हमेशा साथ ही रखना होता था.



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बूढ़ा हो या जवान हर किसी को एक जैसी है बीमारी
फेडरिका बताती है कि दुनियाभर में भले ही कोरोना वायरस को उम्र के साथ जोड़कर भी देखा जा रहा हो लेकिन मेरे हॉस्पिटल में हर उम्र के लोग थे. बूढ़े, जवान और बच्चे सभी इस बीमारी की चपेट में आ चुके थे. सभी को एक जैसी ही दिक्कत थी. कई मरीज गंभीर होते थे तो कुछ को ये भी नहीं पता होता कि वह वें​टिलेटर की मदद से सांस ले पा रहे हैं. कुछ लोग हमसे लड़ते भी थे और घर जाने की जिद भी करते थे. मैं हर किसी को यही कहती थी कि कम से कम आप सही समय पर हॉस्पिटल तो आ गए हैं. अब आप पूरी तरह से सुरक्षित हैं. फेडरिका कहती हैं कि उनकी एक ही कोशिश रही कि मैं उन लोगों को कुछ राहत दे सकूं.

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फेडरिका से ही उनके पति भी हो गए संक्रमित
फेडरिका बताती हैं कि उनकी वजह से ही उनके पति को भी कोरोना हो गया. फेडरिका के पति मार्को एक फोटोग्राफर हैं. 19 मार्च को इनकी जिंदगी में कोरोना वायरस ने दस्तक दी. पहला लक्षण मिलते ही जब उनके नमूनों की जांच की गई तो वह कोरोना पॉजिटिव पाई गईं. उसी दिन उनके पति में भी कोरोना के लक्षण देखने को मिले. उन्होंने बताया कि अब वो और उनके पति क्वारेंटाइन में हैं. उन्होंने बताया कि जैसे ही वह इससे बाहर आएंगे वैसे ही एक बार फिर काम पर लौट जाएंगी.

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First published: April 4, 2020, 1:37 PM IST
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