Opinion: इस तरह बंदूक की नोक पर बलूचिस्तान का पाकिस्तान में हुआ था विलय, जानिए पूरी कहानी

अलग बलूचिस्तान की मांग को लेकर कैसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के उड़ गए हैं होश? जानिए पूरी कहानी के पीछे का सच क्या है?

Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: July 24, 2019, 6:28 PM IST
Opinion: इस तरह बंदूक की नोक पर बलूचिस्तान का पाकिस्तान में हुआ था विलय, जानिए पूरी कहानी
अमेरिकी यात्रा के बाद से ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की मुश्किलें बढ़ गई हैं.
Santosh K Verma
Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: July 24, 2019, 6:28 PM IST
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का पहला अमेरिका दौरा कई मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. जहां एक ओर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के प्रति शुष्क अमेरिकी सत्कार की चर्चा जोरों पर है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान में एक वर्ग इमरान खान की इस दौरे में मितव्ययिता को लेकर तारीफों के पुल बांध रहा है. परंतु इस सबके बीच समाचार माध्यमों में बलोच कार्यकर्ताओं द्वारा इमरान खान के विरुद्ध वॉशिंगटन में किए गए प्रदर्शन ने पाकिस्तान के शासकों के माथे पर चिंता की लकीरों को और भी गहरा किया है. इन बलोच राष्ट्रवादियों ने इमरान खान के कार्यक्रम में पाकिस्तान के द्वारा इस क्षेत्र में किए जा रहे अत्याचारों के विरुद्ध और बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के लिए जमकर नारेबाजी की. 2016 के स्वतंत्रता दिवस पर में भारत के प्रधानमंत्री द्वारा बलूचिस्तान का प्रश्न उठाए जाने के बाद इस आंदोलन को तेजी मिली है, जो 1947 से ही बलूचिस्तान के राष्ट्रवादियों के लिए जीवन मरण का प्रश्न बना हुआ है.

आज के पाकिस्तान में बलूचिस्तान भौगोलिक दृष्टिकोण से सबसे बड़ा भाग है. बलूचिस्तान का क्षेत्रफल 347000 वर्ग किमी है, जो पाकिस्तान की कुल भूमि का लगभग 43 प्रतिशत होता है. क्षेत्रफल की विशालता के साथ ही साथ यह प्रांत रणनीतिक और भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भी अत्यधिक महत्व का क्षेत्र है. यह अफगानिस्तान, ईरान और अरब की खाड़ी के देशों से जो तेल और गैस के भंडारों के दृष्टिकोण से नजदीक है. एक तरफ यह तेल और गैस के भंडार के बीच में स्थित है, दूसरी ओर सर्वाधिक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग जो अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार के एक बड़े भाग का परिवहन मार्ग पर स्थित है, बलूचिस्तान की तट रेखा से होकर ही गुजरता है. खनिज संपदा के इन विशाल भंडार होने के बावजूद, क्षेत्र पाकिस्तान के सबसे गरीब क्षेत्रों में से एक है. इसकी जनसंख्या का एक विशाल बहुमत दुखद स्थिति में है जहां वे जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं जैसे बिजली, स्वच्छ पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से महरूम हैं.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत और पाकिस्तान के विभाजन से पहले, ब्रिटिश राज के अंतर्गत बलूचिस्तान में चार रियासतें शामिल थीं. ये थीं कलात, लासबेला, खारान और मकरान. इन प्रांतों में से दो, लासबेला और खारान, प्रत्ययी राज्य थे, जिन्हें अंग्रेजों द्वारा कलात के खान के शासन के अंतर्गत रखा गया था. आजादी की पूर्व संध्या पर कलात के खान के अंतर्गत एक विशाल क्षेत्र आता था, जो लगभग 53,995 वर्ग मील था. इसकी आबादी 253,305 थी. कलात के खानैत की स्थापना 1666 में हुई और समय के साथ-साथ इसने कई उतार चढ़ाव देखे. उसे अपने पड़ोसियों की आक्रामक नीतियों का सामना भी करना पड़ा. बलूचिस्तान में ईरान के विस्तारवाद के विकास के बावजूद ब्रिटिश शासन ईरान के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनाता रहा क्योंकि उन्हें ऐसा लगता था कि ईरान को सशक्त कर वह उत्तर पश्चिमी सीमा पर रूसी प्रभाव को बढ़ने से रोकने में प्रभावी हो सकेंगे.

आज के पाकिस्तान में बलूचिस्तान भौगोलिक दृष्टिकोण से सबसे बड़ा भाग है.


1871 में ब्रिटिश शासक, बलूचिस्तान के विभाजन के लिए ईरान के प्रस्ताव पर सहमत हो गए और और इसके फलस्वरूप ईरानी-बलूच सीमा आयोग नियुक्त किया गया, जिसके मुख्य आयुक्त के रूप में मेजर जनरल गोल्डस्मिथ नियुक्त किए गए. इसके परिणामस्वरूप गोल्डस्मिथ लाइन इस प्रकार मनमाने ढंग से खींच दी गई, जिसने बलूच लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक एकता को बांट कर रख दिया. इस सब में बलूचिस्तान की रियासतों और लोगों की बात तक नहीं सुनी गई. इसी कड़ी में 1893 में सीस्तान और रेगिस्तान के बाहरी इलाके अफगानिस्तान को सौंप दिए गए और इनके बीच डूरंड रेखा खींच दी गई, जिसने आगे बलूच लोगों के क्रोध को और भड़का दिया.

ब्रिटिश राज के दौरान बलूचिस्तान को प्रांत का दर्जा नहीं मिला था. लेकिन यह चार रियासतों का ढीलाढाला सा संघ था, जिसमें कलात के साथ मकरान, खारान,लासबेला के साथ कुछ छोटी-मोटी जमींदारियां भी शामिल थीं. खारान राज्य की स्थापना कलात के एक जागीरदार राज्य (Vessel State) के रूप में 1697 ईसवी में हुई थी. वहीं दूसरी ओर लासबेला का राज्य, जाम अली खान प्रथम द्वारा 1742 में स्थापित किया गया था.

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बलूचिस्तान के आयुक्त थे सर रॉबर्ट सैंडमैन. उन्होंने सन 1876 में कलात के साथ एक संधि की, जिसे मस्तंग की संधि कहा जाता है. इसके द्वारा कलात के राज्य को उसके चार अधीनस्थ राज्यों के साथ ब्रिटिश आधिपत्य के अंदर लाया गया. कलात के खान और रॉबर्ट सैंडमैन के बीच हुई इस संधि में कलात को स्वतंत्र रियासत के रूप में मान्यता प्रदान की गई. इससे पूर्व ही 13 जुलाई 1876 को खारान झालावान और लासबेला के जनजातीय सरदारों ने कलात का आधिपत्य स्वीकार कर लिया.

पृथक पाकिस्तान के लिए राजनीति और बलूचिस्तान
मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में 23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान प्रस्ताव पारित किया और यह स्पष्ट कर दिया कि वह द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है. 1945 में शिमला सम्मेलन और और कैबिनेट मिशन के बाद, पाकिस्तान के गठन और देश के विभाजन के लिए मुस्लिम लीग ने घातक नीतियां अपनानी प्रारंभ कर दीं. कलात के खान की यह दृढ़ इच्छा थी कि वह स्वतंत्र और संप्रभु रहे. 1942 में खान ने क्रिप्स मिशन को पत्र लिखा जिसका आशय बलूचिस्तान की एक स्वतंत्र खानैत के रूप मान्यता प्राप्त करना था.

कैबिनेट मिशन प्लान के बाद कानूनी बाधाओं से निपटने के लिए और स्वतंत्र होने के लिए उसकी इच्छा को पूरा करने के लिए खान ने सलाहकार के रूप में मुहम्मद अली जिन्ना को नियुक्त किया (जो आगे चलकर खान की सबसे बड़ी भूल साबित हुई). इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु खान ने चैंबर ऑफ प्रिंसेज से भी सहायता मांगी और कलात के प्रधानमंत्री मोहम्मद असलम, चैंबर के तत्कालीन चांसलर भोपाल के नवाब हमीदुल्ला खान से मिलने भोपाल भी गए. इस बीच 3 जून, 1947 के विभाजन की योजना में, कलात के भविष्य पर चर्चा की गई जिसमें लॉर्ड माउंटबेटन ने कहा कि वह अन्य रियासतों के प्रतिनिधियों से मिले हैं और उन्हें सुझाव दिया है कि वे दोनों में से किसी भी एक डोमीनियन में शामिल हो जाएं.

बलोच कार्यकर्ताओं द्वारा इमरान खान के विरुद्ध वॉशिंगटन में किए गए प्रदर्शन ने पाकिस्तान के शासकों के माथे पर चिंता की लकीरों को गहरा कर दिया है.


इस बिंदु पर जिन्ना की फिर से वापसी हुई और उन्होंने एक खान के सलाहकार के रूप में एक गलत तर्क दिया कि क्राउन की सर्वोपरिता सत्ता के हस्तांतरण के साथ समाप्त हो जाएगी और राज्य स्वतंत्र विधि सम्मत बन जाएगा, लेकिन वस्तुतः इससे खान को लाभ होने की संभावना अधिक नहीं है. उन्होंने कलात को सलाह दी कि वह कुछ शर्तों पर पाकिस्तान के साथ संबद्ध हो जाए. कलात के प्रधान मंत्री असलम खान ने जवाब दिया कि कलात के खान पाकिस्तान के साथ एक सौहार्दपूर्ण समाधान चाहते हैं जो पारस्परिक लाभ के लिए किया जाएगा. 17 जून 1947 को अपने भाषण में जिन्ना ने घोषणा की कि जब अंग्रेज, भारत से रवाना हो जाएंगे तब सभी भारतीय राज्य अपने भविष्य के बारे में फैसला करने के लिए स्वतंत्र हो जाएंगे.
इसके बाद उपयुक्त समाधान की तलाश में क्राउन के प्रतिनिधि के रूप में वायसराय, जिन्ना और कलात के खान के बीच अनेक बैठकें हुई, जिसके बाद 11 अगस्त 1947 की विज्ञप्ति जारी हुई जिसमें आने वाली पाकिस्तान सरकार द्वारा कलात को एक स्वतंत्र और संप्रभु राज्य स्वीकार करने पर सहमति बन गई. पाकिस्तान की सरकार और कलात के मध्य एक यथास्थिति अथवा स्टैंड स्टिल समझौता भी किया गया. रक्षा, विदेश और संचार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर पाकिस्तान और कलात के मध्य कराची में समझौते हुए और इस पर लॉर्ड माउंटबेटन, मोहम्मद अली जिन्ना, लियाकत अली खान, लॉर्ड इस्मे, (चीफ कमिश्नर) अहमद यार खान (कलात के खान), मोहम्मद असलम खान (कलात के प्रधानमंत्री) और सर सुल्तान अहमद (कानूनी सलाहकार) ने हस्ताक्षर किए. उल्लेखनीय है कि इस समझाते के अनुसार पाकिस्तान की आजादी से लेकर 27 मार्च 1948 तक कलात के नेतृत्व में बलूचिस्तान एक स्वतंत्र देश रहा.

बलूचिस्तान की स्वतंत्रता का बलात हरण
जिन्ना जो अब तक कलात के खान के मित्र और सलाहकार बने हुए थे, लेकिन अक्टूबर 1947 तक, मुहम्मद अली जिन्ना एक स्वतंत्र और एक संप्रभु राज्य के रूप में कलात को मान्यता प्रदान करने की बात से पलट गए. जिन्ना का अब मानना था कि दूसरे राज्यों की तरह विलय ही एकमात्र रास्ता है जो कलात समेत समस्त बलूचिस्तान के पाकिस्तान में शामिल होने के लिए आवश्यक है. परंतु खान नाममात्र की स्वतंत्र स्थिति का परित्याग करने के लिए तैयार नहीं थे. हालांकि, वह रक्षा, विदेश और संचार विषय पर पाकिस्तान के साथ समझौता कर चुके थे.

फरवरी 1948 तक, कलात और पाकिस्तान की सरकार के बीच विचार विमर्श लगभग समाप्त हो चुका था और जिन्ना ने कलात के खान को पत्र लिखकर अविलम्ब पाकिस्तान में शामिल होने के लिए कहा. मार्च 1948 में नवाब हबीबुल्ला खान बलूच के नेतृत्व में खारान और गुलाम कादिर खान के नेतृत्व में लासबेला क्षेत्रों के, जो कि कलात के अधीनस्थ राज्य थे, पाकिस्तान में विलय कर लिया गया. मार्च 17, 1948 को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने घोषणा की कि खारान, लासबेला और मकरान ने पाकिस्तान में विलय के लिए आवेदन किया था और उनके अधिमिलन को स्वीकार कर लिया गया है.

पाकिस्तान में इन क्षेत्रों के विलय के बाद, कलात का समुद्र से संपर्क भंग हो गया और उसका क्षेत्रफल आधे से भी कम हो गया. यह भयंकर विश्वासघात का कार्य था. मकरान, खारान और लासबेला मस्तंग की संधि द्वारा कलात के खान के आधिपत्य में माने गए थे. फिर वह कैसे अलग से विलय के साधन पर हस्ताक्षर कर सकते थे?


तत्कालीन भारतीय राजनैतिक नेतृत्व की भूमिका?
भारतीय नेतृत्व की राजनयिक विफलता से पाकिस्तान ने कलात के अधिग्रहण के लिए वांछित प्रेरणा प्राप्त की. 27 मार्च को ऑल इंडिया रेडियो ने एक संवाददाता सम्मेलन की सूचना प्रसारित की जिसमें अधिकारियों के हवाले से बताया गया कि वी पी मेनन ने खुलासा किया है कि कलात के खान, भारत में कलात के विलय को स्वीकार करने के लिए, भारत पर दबाव डाल रहे हैं. यह भी कहा कि भारत का इस सबसे कोई लेना देना नहीं है. कलात के खान को भारत के इस रवैये से गहरी निराशा हुई. उसके अगले ही दिन मेजर जनरल मोहम्मद अकबर खान के अधीन 7 बलूच रेजीमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल गुलजार के नेतृत्व में कलात खान पर आक्रमण किया गया. कलात के खान को बंदी बना कर कराची लाया गया और विलयपत्र पर हस्ताक्षर करने को विवश कर दिया गया. इस प्रकार बंदूक की नोक पर बलूचिस्तान को पाकिस्तान में विलय कर लिया गया.

इस प्रकार बलूचों को उनकी इच्छा के विरुद्ध, बलपूर्वक अधिग्रहित किया गया और स्वतंत्रता की भावना का यह दमन आज भी लगातार जारी है. आज क्वेटा पाकिस्तान की सेना की बारहवीं कोर का मुख्यालय है. बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की दुर्दशा और जघन्य अत्याचारों में इस का प्रमुख योगदान रहा है. यही इसकी यहां स्थापना का मुख्य उद्देश्य भी था. यही पाकिस्तान निर्लज्जता से कश्मीर का मुद्दा जोर शोर से उछालता आया है. आज आवश्यकता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान के द्वारा मचाये जा रहे भ्रामक शोर से हटकर इस ओर भी ध्यान दे.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं)

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First published: July 24, 2019, 4:58 PM IST
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