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नेपाल की संसद भंग, क्या 'चीन प्रेम' की बलि चढ़ गए पीएम केपी शर्मा ओली!

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली (फाइल फोटो)
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली (फाइल फोटो)

Nepal parliament dissolved: नेपाल में राजनीतिक संकट का कोई अंत न देख प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली (KP Sharma Oli) की अनुशंसा पर राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने संसद भंग कर दी है. अब नए साल में नेपाल में फिर से चुनाव होंगे और कम्युनिस्ट पार्टी दो धड़ों में इसमें शामिल हो सकती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 21, 2020, 2:49 PM IST
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काठमांडू. नेपाल (Nepal) की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने प्रधानमंत्री के पी शर्मा (KP Sharma Oli) ओली की सिफारिश पर रविवार को संसद को भंग कर दिया और अप्रैल-मई में मध्यावधि आम चुनाव कराये जाने की घोषणा की. इसी के साथ प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के राजनीतिक भविष्य पर भी सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं. ओली चीन के समर्थक माने जाते हैं और बीते एक साल में उन्होंने पहले विवादित नक़्शे और बाद में भगवान राम को लेकर दिए विवादित बयान से भारत के साथ संबंध बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

काठमांडू पोस्ट के मुताबिक नेपाल के राष्ट्रपति भवन द्वारा जारी एक नोटिस के अनुसार राष्ट्रपति भंडारी ने 30 अप्रैल को पहले चरण और 10 मई को दूसरे चरण का मध्यावधि चुनाव कराये जाने की घोषणा की. नोटिस के अनुसार उन्होंने नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 76, खंड एक तथा सात, और अनुच्छेद 85 के अनुसार संसद को भंग कर दिया. इससे पूर्व प्रधानमंत्री ओली की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की एक आपात बैठक में राष्ट्रपति से संसद की प्रतिनिधि सभा को भंग करने की सिफारिश करने का फैसला किया गया था. साल 2017 में निर्वाचित प्रतिनिधि सभा या संसद के निचले सदन में 275 सदस्य हैं। ऊपरी सदन नेशनल एसेंबली है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है कि जब सत्तारूढ़ दल नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) में आंतरिक कलह चरम पर पहुंच गई थी. पार्टी के दो धड़ों के बीच महीनों से टकराव जारी है. एक धड़े का नेतृत्व 68 वर्षीय ओली तो वहीं दूसरे धड़े की अगुवाई पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष तथा पूर्व प्रधानमंत्री 'प्रचंड' कर रहे हैं.

भारत विरोधी रुख के चलते गए ओली?
ओली का भारत विरोधी नज़रिया 2015 में तब शुरू हुआ जब नेपाल में संविधान के तैयार होने की कवायद हुई. ओली इसके पक्षधर थे, लेकिन भारत ने मधेसियों के अधिकारों को लेकर इसका विरोध किया. दूसरी तरफ, नेपाल में प्रधानमंत्री की रेस में आखिरी वक्त पर ओली के खिलाफ सुशील कोइराला खड़े हो गए और नेपाल में कई लोगों ने माना कि इसके पीछे भारत की रणनीति थी. हालांकि ओली ने कोइराला को 2015 के चुनाव में हराया लेकिन भारत के प्रति उनका मन बदल चुका था. इसके बाद ओली को फिर एक झटका तब लगा जब नेपाल में भूकंप की त्रासदी से ओली सरकार जूझ रही थी और उन हालात में भारत ने सीमाएं बंद कर दीं. महीनों तक नेपाल को आपूर्ति होने में मुश्किल रही. इन तमाम हालात पर नज़र गड़ाए हुए चीन के पास यही मौका था और उसने दोनों हाथों से लपका भी.
चीन की एंट्री से बदला माहौल


चीन ने ओली के मददगार के तौर पर प्रवेश किया. मार्च 2016 में नेपाल ने चीन के साथ एक संधि पर दस्तखत किए जिससे नेपाल को शुष्क बंदरगाहों, रेल सहित चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत सड़क ट्रांसपोर्ट के ज़रिये चीनी इलाकों के साथ जुड़ने का सीधा रास्ता मिला. इसके बाद फिर ओली के सामने संकट खड़ा हुआ जब प्रचंड यानी पीके दहाल के धड़े ने ओली सरकार के खिलाफ बगावत की. ओली ने फिर आरोप लगाया कि यह भारत के इशारे पर हुआ. खैर 2017 में ओली ने फिर जीत हासिल की और इस बार खुलकर भारत विरोधी छवि के साथ. इस तरह, ओली के रूप में नेपाल पर चीन की पकड़ मज़बूत होती चली गई और भारत अपने एक मित्र राष्ट्र को गंवाता चला गया.

इस साल शुरूआती मई में नेपाल में राजनीतिक संकट था. नेपाली कम्युनिस्ट पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर ओली से इस्तीफा मांगा था. भारत चूंकि कोविड 19 से जूझने में मसरूफ था, तो उसने नेपाल के हालात पर बातचीत को टाल दिया और फिर ओली ने चीन से मदद मांगी. चीनी राजदूत हाउ यैंकी ने नेपाली नेताओं के साथ कई बैठकें कर संकट को हल किया. ओली की कुर्सी बचाने की कीमत चीन ने क्या मांगी? पहली तो यही कि चीन के खिलाफ जो अंतरराष्ट्रीय कवायद चल रही थी, उसमें नेपाल को चीन का साथ देना था. और, डीएनए की रिपोर्ट के मुताबिक राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि दूसरी कीमत यह भी थी कि भारत के साथ नेपाल सीमा विवाद को हवा देकर चीन के पक्ष में खड़ा नज़र आए. भारत ने भी नक्शा विवाद पर यही माना कि नेपाल ने चीन के इशारे पर यह कदम उठाया.

ओली का राजनीतिक सफ़र छात्र राजनीति से शुरू हुआ
बता दें कि अपनी किशोरवस्था में एक छात्र कार्यकर्ता के रूप में राजनीति में आए वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता के पी शर्मा ओली के नेपाल का प्रधानमंत्री बनने तक का सफर उल्लेखनीय रहा है. ओली ने वामपंथी गठबंधन द्वारा संसदीय चुनाव में जीत दर्ज किए जाने के बाद 2018 में दूसरी बार सत्ता संभालने पर नेपाल में राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद जताई थी लेकिन सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर सत्ता को लेकर चले लंबे संघर्ष के बाद रविवार को संसद भंग करने की राष्ट्रपति से सिफारिश कर उन्होंने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया. ओली किशोरावस्था में ही राजनीति में आ गए थे और राजशाही का विरोध करने के लिए उन्होंने 14 साल जेल में बिताए. वह 2018 में वाम गठबंधन के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में दूसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे.

चीन समर्थक रुख के लिए जाने वाले 68 वर्षीय ओली ने इससे पहले 11 अक्टूबर, 2015 से तीन अगस्त, 2016 तक देश के प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया था. इस दौरान नेपाल के भारत के संबंध तनावपूर्ण हो गए थे, अपने पहले कार्यकाल के दौरान ओली ने नेपाल के आंतरिक मामलों में कथित हस्तक्षेप को लेकर सार्वजनिक रूप से भारत की निंदा की थी और उसपर उनकी सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगाया था. हालांकि, उन्होंने दूसरे कार्यकाल के लिए पद संभालने से पहले देश को आर्थिक समृद्धि के रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए भारत के साथ एक साझेदारी बनाने का वादा किया था. वर्ष 2015 में जब नेपाल में नया संविधान अपनाया गया और इसे सात राज्यों में विभाजित किया गया तो जातीय मधेसी समूह, जिनमें ज्यादातर भारतीय मूल के थे, ने महीनों तक इसका विरोध किया. इस मुद्दे को लेकर भारत-नेपाल के संबंध तनावपूर्ण हो गए थे.

ओली के दूसरे कार्यकाल के दौरान सत्तारूढ़ दल नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) में आंतरिक कलह चरम पर पहुंच गई थी. पार्टी के दो धड़ों के बीच महीनों से टकराव जारी है। एक धड़े का नेतृत्व 68 वर्षीय ओली तो वहीं दूसरे धड़े की अगुवाई पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष तथा पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' कर रहे हैं. उन्होंने पार्टी के भीतर अपने प्रतिद्वंद्वियों पर उनकी सरकार को अस्थिर करने की साजिश करने के आरोप लगाए थे.

नौवीं कक्षा में ही पढ़ाई छोड़ राजनीति शुरू की
नेपाल के पूर्वी जिले तेराथुम में 22 फरवरी, 1952 को जन्मे ओली मोहन प्रसाद और मधुमाया ओली की सबसे बड़ी संतान हैं. उनकी मां की चेचक से मृत्यु हो जाने के बाद उन्हें उनकी दादी ने पाला था, उन्होंने नौवीं कक्षा में अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी और राजनीति में आ गए थे. हालांकि, उन्होंने बाद में जेल से कला में इंटरमीडिएट किया. उनकी पत्नी रचना शाक्य भी एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता हैं और पार्टी गतिविधियों के दौरान दोनों की मुलाकात हुई थी. ओली ने 1966 में राजा के प्रत्यक्ष शासन के तहत निरंकुश पंचायत प्रणाली के खिलाफ लड़ाई में शामिल होकर एक छात्र कार्यकर्ता के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी.



वह फरवरी 1970 में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए. पार्टी की सदस्यता लेने के तुरंत बाद वह भूमिगत हो गए. उसी वर्ष, उन्हें पहली बार पंचायत सरकार द्वारा गिरफ्तार किया गया था. ओली नेपाल के उन कुछ राजनीतिक नेताओं में से एक हैं जिन्होंने कई साल जेल में बिताए. उन्होंने 1973 से 1987 तक लगातार 14 साल जेल में गुजारे. जेल से रिहा होने के बाद, वह 1990 तक लुंबिनी क्षेत्र के यूएमएल प्रभारी के केंद्रीय समिति के सदस्य बने. वर्ष 1991 में वह झापा जिले से पहली बार प्रतिनिधिसभा के सदस्य के रूप में चुने गए. ओली ने 1994-1995 में गृह मामलों के मंत्री के रूप में भी कार्य किया था. वर्ष 1999 में उन्हें झापा निर्वाचन क्षेत्र-2 से प्रतिनिधिसभा के लिए फिर से चुना गया. उन्होंने 2006 में गिरिजा प्रसाद कोइराला के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान उपप्रधानमंत्री के रूप में भी कार्य किया था.
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