सियासी संकट से जूझ रहा श्रीलंका, राष्ट्रपति वापस ले सकते हैं संसद भंग का आदेश

जब से राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने रानिल विक्रमसिंघे को रिप्लेस कर महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाया, तब से श्रीलंका में सियासी संकट पैदा हो गया है. क्योंकि, फ्लोर टेस्ट में राजपक्षे बहुमत का आंकड़ा यानी 113 वोट हासिल नहीं कर सके.

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Updated: December 3, 2018, 12:03 PM IST
सियासी संकट से जूझ रहा श्रीलंका, राष्ट्रपति वापस ले सकते हैं संसद भंग का आदेश
श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना (AP)
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Updated: December 3, 2018, 12:03 PM IST
श्रीलंका में सियासी संकट जारी है. राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने बीते दिनों 225 सदस्यों की संसद को भंग कर दिया था, जिसके बाद हालात नियंत्रण से बाहर हो रहे हैं. शायद इसलिए श्रीलंकाई राष्ट्रपति को अपने फैसले पर पछतावा हो रहा है. सिरिसेना के एक करीबी सूत्र का दावा है कि राष्ट्रपति अपने फैसले पर दोबारा से विचार करने का मन बना रहे हैं, ताकि राजनीतिक गतिरोध को बढ़ने से रोका जा सके.

दरअसल, जब से राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने रानिल विक्रमसिंघे को रिप्लेस कर महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाया, तब से श्रीलंका में सियासी संकट पैदा हो गया है. क्योंकि, फ्लोर टेस्ट में राजपक्षे बहुमत का आंकड़ा यानी 113 वोट हासिल नहीं कर सके. ऐसे में उनकी दावेदारी भी खत्म हो गई. हालांकि, अभी तक उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया है. वहीं, राष्ट्रपति ने संसद को भंग कर दिया और मध्यावधि चुनाव का ऐलान कर दिया.



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सूत्र की मानें, तो राष्ट्रपति इसी हफ्ते संसद भंग के आदेश को रद्द कर सकते हैं. श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट में संसद भंग के आदेश पर सुनवाई पेंडिग है. संभावना है कि कोर्ट की सुनवाई से पहले ही अपने आदेश पर नया फैसला ले सकते हैं.

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सूत्र ने कहा, 'बहुत संभावना है कि राष्ट्रपति सिरिसेना संसद भंग करने वाला आदेश वापस ले लें. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में अभी इस आदेश पर सुनवाई शुरू नहीं हुई है. इसमें कोई शक नहीं है कि जब सुनवाई शुरू होगी, तो कोर्ट पहले ही दिन संसद भंग के आदेश को अवैधानिक करार दे देगा. इसलिए राष्ट्रपति इसके पहले ही आदेश वापस ले सकते हैं.'

श्रीलंका की संसद का कार्यकाल अगस्त 2020 तक है. लेकिन राजनीतिक संकट की वजह से अब तय समय से दो साल पहले ही चुनाव कराने पड़ेंगे. सिरिसेना ने इसके पहले ऐलान किया था कि श्रीलंका में 5 जनवरी को मध्यावधि चुनाव होंगे.
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बता दें कि विक्रमसिंघे और राजपक्षे दोनों ही प्रधानमंत्री होने का दावा करते हैं. विक्रमसिंघे का कहना है कि उन्हें बर्खास्त किया जाना अवैध है, क्योंकि 225 सदस्यीय संसद में उनके पास अभी भी बहुमत है.

राजपक्षे अपने बयान में इतिहास में उन मौकों का उल्लेख करते हैं, जब श्रीलंका में संकट से बचने और राजनीतिक स्थिरता के लिए संसदीय चुनाव के लिए संसद भंग की गई है. उन्होंने कहा, ‘‘अस्थिर लोकतंत्र में स्थिरता बहाल करने का एकमात्र तरीका आम चुनाव है. हमारे संविधान के अनुसार संप्रभुता जनता में निहित है, संसद में नहीं.’’
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