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Afghanistan Crisis: गनी सरकार के साथ शांति वार्ता के लिए तालिबान ने रखी ये कड़ी शर्तें

हाल के हफ्तों में उत्तर, पश्चिम और दक्षिण अफगानिस्तान के कई हिस्सों में काबिज हो चुका है और पश्चिमी देशों द्वारा समर्थित सरकार के अधिकार में काबुल के अलावा मध्य और पूर्व में कुछेक प्रांत ही बचे हैं.  (फोटो- AP)

हाल के हफ्तों में उत्तर, पश्चिम और दक्षिण अफगानिस्तान के कई हिस्सों में काबिज हो चुका है और पश्चिमी देशों द्वारा समर्थित सरकार के अधिकार में काबुल के अलावा मध्य और पूर्व में कुछेक प्रांत ही बचे हैं. (फोटो- AP)

Taliban Vs Afghanistan: आईएसआई के दबाव में तालिबान, पाकिस्तान में अफगान सरकार के वार्ताकार के साथ बातचीत करने को तैयार हैं, लेकिन काबुल में राजनयिकों के अनुसार तालिबान ने इसशांति वार्ता के लिए अफगानिस्तान सरकार के सामने तीन शर्तें रखी हैं.

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    काबुल. अफगानिस्तान में तालिबान का कोहराम लगातार जारी है. तालिबान (Taliban) ने शुक्रवार को चार और प्रांतों की राजधानियों पर कब्जा कर लिया. अब देश के समूचे दक्षिणी भाग पर तालिबान ने अपना नियंत्रण जमा लिया है. साथ वो अब धीरे-धीरे काबुल (Kabul) की तरफ बढ़ रहा है. इस बीच तालिबान और अफगानिस्तान के बीच शांति वार्ता (Peace Talks ) को लेकर भी कुछ सगंठन और देश कोशिश में जुट गए हैं. खास कर इस्लामाबाद पर दुनिया के कई देश दबाव बना रहे हैं.

    इस बीच पाकिस्तान ने राष्ट्रपति अशरफ गनी और क्वेटा शूरा नेताओं के अलावा अफगान सरकार के नेतृत्व के बीच एक बैठक का सुझाव दिया है. जिससे सुन्नी पश्तून इस्लामवादियों के पक्ष में बड़े पैमाने पर सत्ता साझा करने का समझौता किया जा सके. आईएसआई के दबाव में तालिबान पाकिस्तान में अफगान सरकार के वार्ताकार के साथ बातचीत करने को तैयार हैं. लेकिन काबुल में राजनयिकों के अनुसार तालिबान ने इस सप्ताह शांति वार्ता के लिए अफगानिस्तान सरकार के सामने तीन शर्तें रखी हैं…

    1. पहली शर्त: अफगानिस्तान के जेलों में बंद सभी तालिबानी कैदियों को बिना शर्त रिहा किया जाना चाहिए.

    2. दूसरी शर्त: तालिबान चाहता है कि संयुक्त राष्ट्र की आतंकवादी ग्रुप की लिस्ट से उनका नाम हटा दिया जाए. वो चाहते है कि इसके लिए अफगानिस्तान सरकार खुद संयुक्त राष्ट्र से बातचीत करे. लेकिन बता दें कि 1267 प्रतिबंध समिति जो व्यक्तियों और संस्थाओं को आतंकवाद के समर्थकों के रूप में नामित करती है उसका नेतृत्व भारत करता है.

    3.तीसरी शर्त: तालिबान ने प्रस्ताव रखा है कि राष्ट्रपति, रक्षा मंत्री, गृह मंत्री, सेना प्रमुख और एनडीएस (जासूस एजेंसी) ये सब उनके खेमे के हो. जबकि सिर्फ प्रधानमंत्री का पद वो मौजूदा सरकार के देना चाहता है.

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    मौजूदा सकार से बातचीत के लिए तैयार नहीं
    पाकिस्तान ने 17-19 जुलाई के बीच राष्ट्रपति अशरफ गनी और तालिबान नेताओं, मुल्ला याकूब और सिराजुद्दीन हक्कानी के बीच एक बैठक आयोजित करने की कोशिश की थी. लेकिन ये बातचीत नहीं हो सकी. दरअसल इस्लामी नेताओं की अफगान सरकार के मौजूदा प्रमुख से बात करने की कोई इच्छा नहीं है. जुलाई की पहल अमेरिकी विशेष प्रतिनिधि ज़ाल्मय खलीलज़ाद और यूके के सेना प्रमुख निक कार्टर के दिमाग की उपज थी.

    अफगानिस्तान के सामने दो रास्ते
    अशरफ गनी के स्थान पर नेता को बदलने का फैसला अमेरिका और अफगान सरकार को करना है. यदि वो शांति समझौता चाहता है, तो तालिबान की स्थिति वर्तमान सरकार के लिए अपमानजनक प्रतीत होती है. दरअसल सारी शक्ति सुन्नी इस्लामी बल के हाथों में होगी. लेकिन काबुल में वर्तमान शासन के पास तालिबान बचने के लिए अब दो ही रास्ते बचे हैं. या तो वो तालिबान से लड़े या फिर पाक समर्थित इस्लामी समूह की शांति शर्तों के आगे झुक जाए.

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