प्रकृति ही खत्म कर रही है इटली की इस जगह को, नाम है 'मरता हुआ कस्बा'

यह कस्बा एक पहाड़ की चोटी पर बसा हुआ है. जिस तरह से दिनों दिन कस्बा घट रहा है उससे वहां पर रहने वाले लोग चिंतित हैं.

यह कस्बा एक पहाड़ की चोटी पर बसा हुआ है. जिस तरह से दिनों दिन कस्बा घट रहा है उससे वहां पर रहने वाले लोग चिंतित हैं.

Dying town in Italy: सिविटा की खूबसूरती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब सर्दियों में बादल नीचे की तरफ आते हैं तो ऐसे लगता है कि ये कोई किला हो, जो बादलों के ऊपर तैर रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 12, 2021, 12:15 AM IST
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नई दिल्ली. कोरोना वायरस महामारी से जूझ रहे विश्व में वर्तमान में ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकना एक बड़ा चैलेंज है. बढ़ते प्रदूषण और खत्म होते जंगलों पर वैज्ञानिक पहले ही चिंता जाहिर कर चुके हैं. इसी बीच इटली में एक अजीब सी चीज सामने आई है. इटली में एक कस्बा मौजूद है, जिसे अब 'मरता हुआ कस्बा' (Dying Town) के नाम से जाना जाता है. असल में इस जगह का नाम सिविटा है. ये दुनिया के सबसे पुराने शहरों में एक है. लगभग 3000 साल पुराने कस्बे को अब प्रकृति ही खत्म कर रही है. लगातार हो रहे भूस्खलन, मिट्टी के कटाव के कारण अब ये कस्बा घटकर महज एक तिहाई बचा हुआ है.

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, यह कस्बा एक पहाड़ की चोटी पर बसा हुआ है. जिस तरह से दिनों दिन कस्बा घट रहा है उससे वहां पर रहने वाले लोग चिंतित हैं. लोगों ने यूनेस्को से अपील की है कि वो भले ही यह जगह छोड़कर चले जाएंगे लेकिन उनके घरों को बचाने की कोशिश की जाए. लोगों का कहना है कि यदि ये कस्बा खत्म हो जाएगा, तो इटली के पन्नों से भी गायब हो जाएगा.

कभी लगता है बादलों के ऊपर तैरता किला

सिविटा की खूबसूरती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब सर्दियों में बादल नीचे की तरफ आते हैं तो ऐसे लगता है कि ये कोई किला हो, जो बादलों के ऊपर तैर रहा है. कई पेड़, फूल, पत्तियों और चट्टान होने के कारण बादलों के ऊपर तैरता हुआ ये कस्बा कई बार किसी केक की तरह नजर आता है.
कुछ गलियों और चौराहों में सिमट गया है कस्बा

रॉयटर्स से बातचीत करते हुए जियोलॉजिस्ट लूका कॉस्टैन्टिनी ने कहा कि 3000 साल से लगातार हो रहे भूस्खलन, दरारों और मिट्टी के कटाव ने इस इलाके को सीमित कर दिया है. अब यहां एक चौराहा और कुछ गलियां हैं. इनके ऊपर बने कुछ घर और चर्च ही बच हैं.

इस कस्बे को बचाने के लिए जियोलॉजिस्ट ने नरम ज्वालामुखीय पत्थरों के अंदर टूफो नाम की व्यवस्था की थी. इसमें लोहे के रॉड्स को दो पथरीली दीवारों के बीच लगा दिया जाता है ताकि भूस्खलन और दरारों से बचा जा सके. मिट्टी के कटाव का इमारतों पर असर न पड़े या कम हो.
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