Opinion : इमरान साहब, क्रिकेट मैदान की तरह यहां बॉल टेम्परिंग नहीं कर सकते!

Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: September 4, 2019, 10:38 PM IST
Opinion : इमरान साहब, क्रिकेट मैदान की तरह यहां बॉल टेम्परिंग नहीं कर सकते!
इमरान खान की “राजनैतिक समझ” और उनकी “कार्यकुशलता” ने पाकिस्तान और उसके लोगों के समक्ष जीवन मृत्यु का संकट उत्पन्न कर दिया है

इमरान खान (Imran Khan) की “राजनैतिक समझ” और उनकी “कार्यकुशलता” ने पाकिस्तान और उसके लोगों के समक्ष जीवन मृत्यु का संकट उत्पन्न कर दिया है. ऐसी स्थिति में अपना मुंह छुपाने के लिए उन्होंने पाकिस्तान के सत्ताधीशों की परम्परागत रणनीति का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 4, 2019, 10:38 PM IST
  • Share this:
नई दिल्ली. इमरान खान (Imran Khan) को पाकिस्तान (Pakistan) के प्रधानमंत्री पद के साथ कुछ मुश्किलें विरासत में मिलीं. कुछ परम्परानुसार उन्होंने निर्मित भी कीं. परन्तु सेना की सहायता से सत्ता प्राप्त करना और उसे कुशलता से संचालित करना दो अलग-अलग चीजें हैं. इमरान खान (Imran Khan) की 'राजनैतिक समझ' और उनकी 'कार्यकुशलता' ने पाकिस्तान और उसके लोगों के समक्ष जीवन मृत्यु का संकट उत्पन्न कर दिया है. ऐसी स्थिति में अपना मुंह छुपाने के लिए उन्होंने पाकिस्तान के सत्ताधीशों की परम्परागत रणनीति का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, जिसके तहत पाकिस्तान में होने वाली हर गड़बड़ के लिए भारत (India) जिम्मेदार है और भारत अपने क्षेत्र में कुछ भी करे उससे पाकिस्तान समेत पूरे क्षेत्र के लिए खतरा है.

5 अगस्त के बाद से ऐसी बयानबाजियां लगातार बढ़ती जा रही हैं, जिनमें भारत के नितांत निजी मामलों का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का प्रयास किया जा रहा है. उसके बाद, अभी 31 अगस्त को केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) की अंतिम सूची जारी करने के बाद एक बार फिर इमरान खान ने अनर्गल प्रलाप करते हुए, इसे भारत सरकार द्वारा 'मुसलमानों के एथनिक क्लींजिंग (नस्लीय परिमार्जन)' के माध्यम से क्षेत्र की जनसांख्यिकी को बदलने का प्रयास बताया. यह इमरान खान के मूर्खतापूर्ण और गैरजिम्मेदार ट्वीट्स की श्रृंखला में एक नया प्रयास था जिसके तहत वे अब तक जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द करने और राज्य के पुनर्गठन के फैसले को लेकर भारत के विरुद्ध युद्ध की धमकी देते आ रहे हैं.

भारत में अवैध शरणार्थी समस्या पाकिस्तान की देन
आज इमरान खान एनआरसी पर सवाल पर उठा रहे हैं और मुसलमानों पर अत्याचार की बात कर रहे हैं. वास्तविकता यह है कि इस क्षेत्र में बर्बरता और विध्वंस फैलाने में पाकिस्तान की सेना ने तैमूर और नादिरशाह के पूर्ववर्ती कीर्तिमान ध्वस्त कर डाले. यह समस्या वास्तव में पाकिस्तान द्वारा पैदा की गई है.

1947 में देश के विभाजन के बाद पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के रूप में दो भागों में बंटा पाकिस्तान अस्तित्व में आया. परन्तु पूर्वी पाकिस्तान जो मुख्यत: पूर्वी बंगाल था, की बांग्लाभाषी आबादी को मुहम्मद अली जिन्ना समेत पाकिस्तानी सैन्य और राजनैतिक नेतृत्व ने सदैव संदेह की दृष्टि से देखा और उन्हें पश्चिमी पाकिस्तान का उपनिवेश बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

उर्दू को पाकिस्तान की राजभाषा बनाने और बांग्ला भाषा की उपेक्षा से लेकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूर्वी बंगाल के वैध दावों को सदैव नकारा गया. जैसा कि फ्रांसीसी पत्रकार पॉल ड्रेफस ने इस नरसंहार के पूर्व इस क्षेत्र के साथ पाकिस्तानी व्यवहार के विषय में लिखा था कि 'पिछले कुछ वर्षों में, पश्चिम पाकिस्तान ने एक बुरे, अहंकारी मेहमान की तरह व्यवहार किया, उसने सबसे अच्छे व्यंजन खाए और पूर्वी पाकिस्तान के लिए सिवाय कुछ जूठन और कचरे के, कुछ भी नहीं छोड़ा.'


Loading...

ये स्थितियां अयूब खान (Ayub Khan) के काल के आखिर में लगातार बिगड़ती गईं, जब मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में बंगाली जनता ने पाकिस्तान के शासकों से अपने अधिकारों की पुनर्स्थापना की मांग की. रही सही कसर 1970 के चुनावों में पूरी कर दी गई जब स्पष्ट बहुमत लाने के बाद भी शेख मुजीबुर्रहमान के प्रधानमन्त्री बनने के दावे को नकारा गया और बंगाल कि जनता पर भीषण अत्याचारों कि श्रृंखला का आरम्भ हुआ.

ऑपरेशन सर्चलाइट : जघन्यतम नरसंहार
ऑपरेशन सर्चलाइट के नाम से शुरू किए गए इस अभियान में बांग्लाभाषी आबादी पर भयंकर अत्याचार किए गए और इसने अपनी बर्बरता में 1970 में इसी क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना द्वारा चलाए गए इसी तरह के दमनकारी अभियान 'ऑपरेशन ब्लिट्ज' की विभीषिकाओं को भी विस्मृत कर दिया. 25 मार्च 1971 से 24 मई 1971 तक चले इस ऑपरेशन में 30 लाख से अधिक लोगों की नृशंसतापूर्ण तरीके से हत्या कर दी गई. इससे भी बड़ी तादाद में महिलाओं के साथ बलात्कार, लूट आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया गया, ताकि बांग्लाभाषी आबादी पूरी तरह से दहशत में आकर समर्पण कर दे और राजनैतिक सुधारों की बात भी न करे.

पीड़ितों की बड़ी संख्या इस क्षेत्र की हिन्दू आबादी से सम्बन्ध रखती थी. पुलित्ज़र पुरस्कार विजेता पत्रकार सिडनी शानबर्ग ने इस दौरान पूर्वी पाकिस्तान के क्षेत्रों का विशद दौरा किया और न्यूयॉर्क टाइम्स में रिपोर्टिंग करते हुए इस क्षेत्र को 'किलिंग फ़ील्ड्स' का नाम दिया.

शरणार्थियों की समस्या
एक ओर जहां बड़े पैमाने पर नरसंहार किया गया वहीं इससे बचने के लिए बड़ी संख्या में आबादी ने शरणार्थियों के रूप में भारत में शरण ली. 1971 में बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भारत में शरणार्थियों की एक बड़ी बाढ़ आई, जब पूर्वी पाकिस्तान से शरणार्थी बड़े पैमाने पर योजनाबद्ध तरीके से की जाने वाली सामूहिक हत्या, बलात्कार, लूटपाट और आगजनी से बचते हुए भारत की ओर प्रवास कर गए.



एक अनुमान के अनुसार युद्ध के शुरुआती महीनों के दौरान लगभग 1 करोड़ पूर्वी बंगाली शरणार्थी भारत में आए, जिनमें से बांग्लादेश के स्वतंत्र होने के बाद केवल 15 लाख ही वापस गए. शेष सुरक्षा और बेहतर जीवन की उपयुक्त परिस्थितियों के चलते भारत में ही बस गए. अब ये शरणार्थी भारत में ही रहते हैं और भारत के नागरिक बन गए. परन्तु भारत में इन शरणार्थियों के रहने से स्थानीय स्तर पर अनेकों समस्याएं उठ खड़ी हुईं जिन्होंने बड़ा रूप धारण कर लिया. विशेषकर असम की स्थिति अत्यंत ही ज्वलनशील हो गई.

1979 तक आते आते स्थितियां गंभीर हो चली और छह साल लंबा असम आंदोलन चला. इसकी मुख्य मांगें विदेशी आप्रवासियों का पता लगाना और इन अवैध रूप से शरणार्थियों के तौर पर रह रहे लोगों को वापस भेजने की थी. ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और ऑल असम गण संग्राम परिषद (AAGSP) द्वारा इस आन्दोलन का नेतृत्व किया गया.

1983 में मध्य असम (Assam) के नेल्ली में हुए नरसंहार ने, जिसमें 3,000 से अधिक लोगों की जाने गईं, इस समस्या के लिए त्वरित कदम उठाने पर बल दिया. इसी वर्ष अवैध प्रवासी (न्यायाधिकरण द्वारा निर्धारण) अधिनियम पारित किया गया. 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी (PM Rajiv Gandhi) की उपस्थिति में केंद्र, राज्य, AASU और AAGSP द्वारा असम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें कहा गया है कि 25 मार्च, 1971 को या उसके बाद असम आने वाले विदेशियों शरणार्थियों को निष्कासित कर दिया जाएगा.



एनआरसी की अंतिम सूची में क्या है?
इसी समझौते के अनुपालन में एनआरसी में शामिल करने की कट-ऑफ तारीख 25 मार्च 1971 रखी गई. अब जब इसकी अंतिम सूची प्रकाशित की गई है तो इसमें कुल 3,11,21,004 (3 करोड़ से ज्यादा) व्यक्तियों को अंतिम सूची में शामिल करने के योग्य पाया गया. इसके अलावा 19,06,657 व्यक्ति लिस्ट में शामिल नहीं हो सके हैं. इससे पहले साल 2018 में आई एनआरसी लिस्ट में 3.29 करोड़ लोगों में से 40.37 लाख लोगों का नाम शामिल नहीं था. इसमें प्रावधान रखा गया है कि परिणाम से संतुष्ट नहीं होने पर वे विदेशी ट्रिब्यूनल के समक्ष अपील दायर कर सकते हैं.  इसके अलावा, सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अंतिम सूची भी संशोधन के अधीन होगी.

सूची से बाहर रखने वालों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 10 महीने तक का समय मिलेगा. ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के पास विदेशियों के ट्रिब्यूनल में अपने बहिष्कार को चुनौती देने के लिए अधिकतम 120 दिन होंगे. यह पूरी प्रक्रिया भारत के सर्वोच्च न्यायालय की सतत निगरानी में और पूर्ण रूप से वस्तुनिष्ठ तरीके से संपादित की गई है. यह किसी विशेष जातीय समूह या समुदाय को लक्षित नहीं करती है. चूंकि भारत का पड़ोसी देश बांग्लादेश इस सबसे प्रभावित होगा तो उसे इस पूरी प्रक्रिया से अवगत कराया जा चुका है. उसे इस सबसे कोई परेशानी नहीं जो 3000 किलोमीटर दूर बैठे इमरान खान को महसूस हो रही है. 2018 में, बांग्लादेश के तत्कालीन सूचना मंत्री हसनुल-हक इनु ने स्पष्ट रूप से कहा था कि एनआरसी भारत का "आंतरिक मामला" है.

फिज़ूल में बीच में कूद रहे हैं इमरान
वहीं विदेश मंत्री एस जयशंकर (S Jaishankar) ने भी हाल ही में इस बात को दोहराया. उनके दावे का बांग्लादेश के विदेश मंत्री ए.के. अब्दुल मोमन ने भी समर्थन किया है. ऐसी स्थिति में इमरान खान का बीच में कूदना औचित्यहीन और राजनैतिक परिपक्वता से रहित कदम है जो उनकी निराशा और हताशा को ही अभिव्यक्त करता है.



पाकिस्तान धर्म के आधार पर अलग देश बना, पर इसने हमेशा जातीय पहचान को दबाने की कोशिश की, सिवाय पंजाबियों के जो 1947 के बाद से लगातार सत्ता संचालन के केंद्र में रहे. इस्लाम केवल एक छलावा बन कर रह गया जिसके नाम पर बरगलाकर शेष पाकिस्तान की जनता का शोषण किया जा सक़ता था. परन्तु जातीय वैशिष्ट्य की भावनाएं पाकिस्तान में सदैव प्रबल रही हैं, जो खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में उत्तर पश्चिमी सीमा प्रान्त (और अब खैबर पख्तून्ख्वा) के पश्तून या जीएम सईद जैसे नेताओं के नेतृत्व में जिए सिंध कौमी महाज़ द्वारा सिंध की स्वतंत्र अस्मिता को बचाए रखने के लिए चलाए जा रहे आंदोलनों में परिलक्षित होती हैं. हमेशा ही इस तरह के सारे आन्दोलनों के लिए उसने भारत को ही दोषी ठहराया है.

इस तरह अपनी डूबती नाव बचा रहे हैं इमरान
आज इमरान खान इस्लाम खतरे में है का नारा बुलंद कर अपनी डूबती नाव को वापस धारा में लाना चाहते हैं. परन्तु इमरान खान को शिनजियांग में चीन द्वारा वहां के उइघुर मुस्लिम समुदाय की प्रताड़ना दिखाई नहीं देती, जहां वह इस्लामिक तौरतरीके, पहनावे और यहां तक कि इस्लामिक नाम रखने तक से वंचित कर दिए गए हैं.

अब हाफ़िज़ सईद और मसूद अज़हर जैसे दुर्दांत आतंकियों और ऐसे ढेर कट्टरपंथियों को चीन के विरुद्ध एक शब्द बोलने का साहस नहीं होता क्योंकि लाल मस्जिद की घटना उन्हें दिन में तारे दिखाने के लिए पर्याप्त है. इमरान खान को लगता है कि क्रिकेट के मैदान की तरह यहां भी वह बॉल टेम्परिंग कर सकते हैं और इसके द्वारा अपने पक्ष में बेहतर परिणाम ला सकते हैं. पर यह केवल मतिभ्रम है और भ्रम का आकार भले ही बड़ा हो अवधि अत्यंत सीमित होती है.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं)

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए दुनिया से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: September 4, 2019, 9:20 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...