Analysis: पाकिस्तान के खिलाफ एशिया पैसिफिक ग्रुप के कठोर कदम

Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: August 31, 2019, 10:25 PM IST
Analysis: पाकिस्तान के खिलाफ एशिया पैसिफिक ग्रुप के कठोर कदम
वैश्विक मंच पर एक बार फिर यह माना गया कि पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देने वाली गतिविधियों में संलिप्तता से खुद को अलग नहीं कर पाया है.

वैश्विक मंच पर एक बार फिर यह माना गया कि पाकिस्तान (Pakistan) आतंकवाद को प्रश्रय देने वाली गतिविधियों में संलिप्तता से खुद को अलग नहीं कर पाया है.

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  • Last Updated: August 31, 2019, 10:25 PM IST
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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान (Pakistani Prime Minister Imran Khan) और उनकी सरकार इन दिनों गहन संकट के काल से गुजर रही है. उनकी विश्वसनीयता पूरी तरह से दांव पर लग चुकी है. ऐसी स्थिति में उनके पास भारत (India) के विरुद्ध दुष्प्रचार करने के अलावा कोई उपयुक्त साधन शायद उपलब्ध नहीं है. ऐसी स्थिति में पाकिस्तान को एक करारा झटका लगा है, जिसमें वह अपनी गिरती हुई साख को बचाने में भी नाकामयाब साबित हुआ है.

वैश्विक मंच पर एक बार फिर यह माना गया कि पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय देने वाली गतिविधियों में संलिप्तता से खुद को अलग नहीं कर पाया है. जिसकी मांग बार-बार फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ), जो एक अंतरराष्ट्रीय मनी-लॉन्ड्रिंग निगरानीकर्ता है, करता आ रहा है. इसी के चलते जून 2018 में इसे ग्रे लिस्ट में शामिल किया गया था.

इस मामले में पाकिस्‍तान फेल
अब फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) के एशिया-पैसिफिक ग्रुप द्वारा इसके विरुद्ध कार्रवाई करते हुए इसे और भी डाउनग्रेड करते हुए पाकिस्तान को अपने मानकों को पूरा करने में विफलता के लिए बढ़ी हुई फॉलो-अप सूची (इनहेन्स्ड एक्सपीडिएट फॉलोअप लिस्ट जिसे ब्लैक लिस्ट के रूप में भी जाना जाता है) में रख दिया है. पाकिस्तान को 40 अनुपालन मानकों में से 32 के अनुपालन में असमर्थ पाया गया.

पाकिस्तान को 40 अनुपालन मानकों में से 32 के अनुपालन में असमर्थ पाया गया.


पाकिस्तान अपने कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद किसी भी एक पैरामीटर पर अपग्रेड करने के लिए 41 सदस्यीय प्लेनरी को सहमत कर पाने में असफल रहा. पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट करने का निर्णय एपीजी ने कैनबरा, ऑस्ट्रेलिया में अपनी बैठक के दौरान लिया जो वित्तीय और बीमा सेवाओं और क्षेत्रों में अपने सिस्टम के उन्नयन पर पाकिस्तान द्वारा पांच साल में की गई प्रगति के मूल्यांकन पर आधारित था. बैठक की शुरुआत में ही पाकिस्तान ने अपनी 27 सूत्रीय कार्ययोजना पर अनुपालन रिपोर्ट एफएटीएफ को सौंप दी थी. लेकिन, विभिन्न मापदंडों में अपनी ग्रेडिंग में उपयुक्त सुधार लाने में असमर्थ रहने पर पाकिस्तान को APG की बैठक में कोई समर्थन नहीं मिला.

एशिया पैसिफिक ग्रुप और फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स
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फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) एक अंतर-सरकारी निकाय है जिसे फ्रांस की राजधानी पेरिस में जी-7 समूह के देशों द्वारा 1989 में स्थापित किया गया था. इसका मुख्य कार्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग), सामूहिक विनाश के हथियारों के प्रसार और आतंकवाद के वित्तपोषण पर निगाह रखना है. वहीं दूसरी ओर मनी लॉन्ड्रिंग पर एशिया पैसिफिक ग्रुप एक अंतर-सरकारी संगठन है, जो एशिया प्रशांत क्षेत्र में मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवादी वित्तपोषण की रोकथाम के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों को लागू करने के लिए काम कर रहा है. एशिया पैसिफिक ग्रुप (एपीजी), फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) के एशिया सचिवालय से ही विकसित हुआ है जो 1995 में गठित किया गया था.

1997 में इस सचिवालय की समाप्ति के बाद 13 संस्थापक सदस्यों द्वारा एपीजी की स्थापना की गई. अमेरिका में 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमले के बाद, आतंकवादी वित्तपोषण का मुकाबला करने के लिए इस संगठन के कार्य का और भी विस्तार किया गया.

वर्तमान स्थिति में इस समूह में 8 पर्यवेक्षक राज्यों के साथ 41 राष्ट्र इसके सदस्य हैं और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक सहित कई पर्यवेक्षक संगठन इसमें शामिल हैं. एफएटीएफ के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रीय निकायों (एफएसआरबी) का एक बड़ा नेटवर्क है, जिसमें एपीजी क्षेत्रीय और सदस्यता के आकार दोनों ही दृष्टिकोण से सबसे बड़ा समूह है. एपीजी की गतिविधियों को सिडनी, स्थित मुख्यालय और सचिवालय द्वारा समन्वित और संचालित की जाती हैं.

एफएटीएफ पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद इत्यादि को की जाने वाली आर्थिक सहायता पर सतत नजर रखती आ रही है. (फाइल फोटो)


ब्लैक लिस्ट के कारण पाकिस्तान पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
एफएटीएफ पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद इत्यादि को की जाने वाली आर्थिक सहायता पर सतत नजर रखती आ रही है. एफएटीएफ ने पाकिस्तान को जून 2018 से लगातार ग्रे लिस्ट में रखा था और पाकिस्तान इसके बुरे प्रभावों को महसूस भी कर रहा है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में यह स्वीकार भी किया कि जून 2018 में ग्रे लिस्ट में डाले जाने के बाद से एक अप्रैल 2019 तक की स्थिति में पाकिस्तान को इससे लगभग 10 अरब अमेरिकी डॉलर्स का नुकसान उठाना पड़ा है.

इस समय पाकिस्तान ब्लैक लिस्ट में रखा जाने वाला तीसरा देश है. अन्य दो उत्तर कोरिया और ईरान हैं. काली सूची में होने के वर्तमान परिदृश्य में नुकसान के साथ-साथ, पाकिस्तान के भविष्य पर अत्यधिक दुष्प्रभाव पड़ने की पूरी संभावना है. इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पाकिस्तान के सम्पूर्ण अर्थतंत्र पर पड़ेगा.

पाक की अर्थव्‍यवस्‍था बहुराष्ट्रीय बैंकों द्वारा नियंत्रित
उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में विदेशी बैंकिंग तंत्र का वर्चस्व है और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से बहुराष्ट्रीय बैंकों द्वारा नियंत्रित की जाती है. 2017 पाकिस्तान के कुछ स्थानीय बैंकों में बड़े पैमाने पर हुए घालमेल के बाद बहुराष्ट्रीय बैंकों का वर्चस्व और भी बढ़ा है. ब्लैक लिस्ट होने के बाद अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर दबाव और भी बढ़ेगा जिससे संभावना है कि वह निवेशकों के दबाव के चलते पाकिस्तान से बाहर जा सकते हैं. इससे पाकिस्तान के वित्तीय तंत्र का बड़ा हिस्सा ठप्प भी हो सकता है.

ब्लैक लिस्ट में रखे जाने के गंभीर नुकसान हैं जैसे ऐसे देश को कर्ज देने में बड़ा जोखिम समझा जाता है.


ब्लैक लिस्ट में रखे जाने के गंभीर नुकसान हैं जैसे ऐसे देश को कर्ज देने में बड़ा जोखिम समझा जाता है. इसके कारण अंतरराष्ट्रीय कर्जदाताओं ने पाक को आर्थिक मदद और कर्ज देने में कटौती की है. यह भी संभव है कि अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पाकिस्तान को सहायता देने के अपने फैसले की समीक्षा करे. इससे जहां एक ओर पाकिस्तान की सरकार को आर्थिक सहायता प्राप्त होने में दिक्कत होगी, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान की कम्पनियों की लाइन ऑफ़ क्रेडिट, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों द्वारा रोकी जा सकती है. कुल मिलाकर पाकिस्तान का वैसा ही बहिष्कार किया जा सकता है जैसा ब्लैकलिस्टेड होने के बाद ईरान और उत्तरी कोरिया का हुआ.

ब्‍लैक लिस्‍ट होने का पाक पर पड़ेगा ये असर
ब्लैक लिस्ट होने से पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे धन के अंतरण की लागत में तेजी आएगी, जिससे उसकी विदेशों से होने वाली वास्तविक प्राप्तियों में भी कमी आती है. ब्लैकलिस्ट होने के बाद पाकिस्तान के लेन-देन की बहुस्तरीय जांच होगी. नतीजतन, विदेशी प्रेषण में कमी आएगी और वित्तीय संस्थान डॉलर और यूरो इत्यादि में लेनदेन करने से बचेंगे जिससे अंतत: विदेशी मुद्रा के प्रेषण में कमी आ सकती है.

विदेशी मुद्रा लेनदेन में कमी के कारण पूरी अर्थव्यवस्था पाकिस्तानी रुपये पर निर्भर हो सकती है जो खुद ही गिरावट की मार झेल रहा है और अब अवमूल्यन के कारण डॉलर की जबरदस्त मांग के चलते पाकिस्तान के घरेलू बाजार में अगले कुछ महीनों में पाकिस्तानी रुपया अगर और भी तेजी से नीचे गिरता है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी. वर्तमान बिगड़ती आर्थिक स्थिति में पाकिस्तान इस आघात से कैसे निपटता है यह विचारणीय प्रश्न है, क्योंकि वह अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने के उपायों पर ध्यान देने के बजाय भारत को युद्ध में घसीटने की धमकियां देने में अधिक व्यस्त है.

आर्थिक दृष्टिकोण से हट कर एक और महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि इससे पाकिस्तान की एक 'ठग राष्ट्र' होने की मान्यता को बल प्रदान किया है.


पाक का गैर जिम्‍मेदार व्‍यवहार
आर्थिक दृष्टिकोण से हट कर एक और महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि इससे पाकिस्तान की एक 'ठग राष्ट्र' होने की मान्यता को बल प्रदान किया है. अब पाकिस्तान पूरी तरह से गैर जिम्मेदार परमाणु शक्ति की तरह व्यवहार कर रहा है और खुले आम नाभिकीय युद्ध की धमकी दे रहा है. यह पूर्ण रूपेण संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद् के संज्ञान में है. वहां वह चीन के भरोसे सदैव के लिए उत्पात नहीं मचा सकता. वहीं दूसरी ओर उसकी अव्यावहारिक नीतियां उसे उत्तर कोरिया की श्रेणी में लेकर जा रही हैं जहां विश्व के देश उसके साथ अपने सम्बन्धों पर पुनर्विचार करने को बाध्य होंगे.

प्रतिबंधों पर पाकिस्तान का रुख
पाकिस्तान की सरकार और मीडिया जोर-शोर से इस बात का खंडन करता रहा कि एफएटीएफ की ओर से ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है और यह केवल भारत का दुष्प्रचार है. लेकिन, जब स्थितियां स्पष्ट हुईं तो एपीजी द्वारा पाकिस्तान के विरुद्ध उठाए गए इस कदम के लिए भी पाकिस्तान ने भारत को ही दोषी ठहराया है. जिस समय एपीजी की कैनबरा में बैठक चल रही थी, उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत पर पाकिस्तान को ब्लैक लिस्टेड करने के लिए प्रयास करने का दोषी ठहराया. उन्होंने कहा, 'हमने भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए वास्तव में कड़ी मेहनत की. लेकिन उन्होंने हमारी स्थिति का शोषण किया. उन्होंने पुलवामा हमले का उनके चुनावों के लिए उपयोग किया. वे हमें वित्तीय कार्रवाई बल द्वारा ब्लैक लिस्टेड करने के लिए भी पैरवी कर रहे हैं.'

एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल जो एफएटीएफ की 27-सूत्रीय कार्ययोजना के कार्यान्वयन का आंकलन और विश्लेषण कर रहा है, ने पाकिस्तान के संघीय मंत्री हम्माद अजहर के समक्ष यह मामला उठाया भी था.


अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का रहा विश्‍लेषण
साथ ही इमरान खान ने भारत पर कश्मीर मुद्दे से दुनिया का ध्यान हटाने के लिए पुलवामा आतंकवादी हमले के समान 'युद्ध जैसी' स्थिति बनाने का भी आरोप लगाया. उल्लेखनीय है पाकिस्तान ने स्वयं को इस परिस्थिति से बचाने के लिए उपाय भी किए. लेकिन, इस महीने की शुरुआत में, अमेरिका ने पाकिस्तान से फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) के सुरक्षा उपायों का विस्तार करने का आग्रह किया था. अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक क्षेत्रों में 27-सूत्रीय कार्य योजना के कार्यान्वयन पर धीमी प्रगति पर अपनी चिंताओं को प्रकट भी किया था. एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल जो एफएटीएफ की 27-सूत्रीय कार्ययोजना के कार्यान्वयन का आंकलन और विश्लेषण कर रहा है, ने पाकिस्तान के संघीय मंत्री हम्माद अजहर के समक्ष यह मामला उठाया भी था.

यह अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल इस साल जून में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की फ्लोरिडा में हुई बैठक के दौरान और उसके बाद से पाकिस्तान द्वारा की गई प्रगति के प्रयासों, और उपायों का स्वतंत्र मूल्यांकन करने के लिए पाकिस्तान के दौरे पर था. लेकिन, प्रयासों में ईमानदारी का अभाव अंततः पाकिस्तान को उसकी उपयुक्त जगह ले ही गया.

वर्तमान में एपीजी की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान अपने कानूनी और वित्तीय प्रणालियों के लिए 40 मानकों में से 32 को पूरा करने में विफल रहा है. इसके अलावा टेरर फंडिंग के खिलाफ सुरक्षा उपायों के लिए 11 मापदंडों में से 10 को पूरा करने में पाकिस्तान विफल साबित हुआ है. लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अब पाकिस्तान के लिए आगे कठिन समय आ चुका है. एफएटीएफ की 27-पॉइंट एक्शन प्लान की 15 महीने की समयावधि इसी साल अक्टूबर में खत्म हो रही है और इसके अनुपालन में चूक होने पर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स पाकिस्तान के विरुद्ध कड़े रक्षोपाय ला सकती है.

ब्लैक लिस्ट होने के चलते अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक और यूरोपीय संघ जैसे पाकिस्तान के प्रमुख आर्थिक सहायता प्रदाता पाकिस्तान की वित्तीय साख को और नीचे रख गिरा सकते हैं. ऐसे में वित्तीय संकट से जूझ रहे पाकिस्तान की स्थिति और खराब हो सकती है. इस समय वह ऋणों के ब्याज भुगतान तक के लिए धन जुटा पाने में असमर्थ साबित हो रहा है और दिवालिया घोषित होने की कगार पर खड़ा हुआ है. वहीं 5 अगस्त को भारतीय संसद के कदम के बाद वह लगातार युद्धोन्माद से ग्रस्त है. जहां एक ओर पाकिस्तान के आर्थिक रूप से ठप्प होने के संकेत दे रहा है वहीं वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक नेतृत्व की घोर असफलता इस देश को एक बार फिर सैन्य शासन और गृह युद्ध जैसी स्थिति में ले जा सकती हैं.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं)

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First published: August 31, 2019, 10:25 PM IST
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