Opinion : पाकिस्तान को गर्त में ले जा सकता है भारत के साथ व्यापारिक संबंध तोड़ने का फैसला

इस तरह के प्रतिबंधों का भारत की तुलना में पाकिस्तान पर ही अधिक प्रभाव पड़ने की संभावना है. पाकिस्तान अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं के लिए भारत पर काफी हद तक निर्भर है.

Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 7:01 PM IST
Opinion : पाकिस्तान को गर्त में ले जा सकता है भारत के साथ व्यापारिक संबंध तोड़ने का फैसला
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान. (फाइल फोटो)
Santosh K Verma
Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 7:01 PM IST
भारत द्वारा अपने संविधान के अनुच्छेद 370 (Article 370) के प्रावधानों का हटाया जाना और जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन पाकिस्तान (Pakistan) के लिए गहरी चिंता का विषय बन चुका है. उसने इसके बाद अत्यंत गंभीर और राजनैतिक अपरिपक्वता से भरे निर्णय लिए हैं. जिस दिन यह बिल राज्यसभा (Rajya sabha) में रखा गया, पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने सीनेट और नेशनल असेम्बली का एक संयुक्त सत्र बुला लिया ताकि 'भारत के कदम के विरुद्ध संभावित रणनीति' बनाई जा सके.

पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय दुनिया भर के देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सामने 'भारत के द्वारा कश्मीर में किए जा रहे दुर्व्यवहार' का किस्सा बयान करने में लगा हुआ है. यहां तक कि जेद्दाह में इस्लामिक सहयोग संगठन का आपात अधिवेशन भी बुला लिया गया. बुधवार की रात प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा नेशनल सिक्योरिटी कमेटी के साथ बैठक के बाद पाकिस्तान ने भारत से राजनयिक संबंध सीमित करने और द्विपक्षीय व्यापारिक संबंध तोड़ने की घोषणा की है और भारत के उच्चायुक्त से तुरंत पाकिस्तान छोड़ने के लिए कह दिया गया है. भारत के साथ व्यापार संबंध समाप्त करने का निर्णय ऐसे समय आया, जब भारत के तुलनात्मक रूप से कम मूल्य के आयात उसकी बिगड़ती अर्थव्यवस्था को कुछ लाभ ही पहुंचा सकते थे.

व्यापार का आकार
भारत और पाकिस्तान पड़ोसी देश हैं और विश्व की जनसंख्या का लगभग 20 प्रतिशत इन दोनों देशों में निवास करता है. परन्तु इसके बाद भी दोनों देशों के मध्य व्यापार अत्यंत कम है. 2017-18 में दोनों देशों के बीच व्यापार केवल 2.4 अरब डॉलर का था, जो भारत के कुल वैश्विक व्यापार का 0.31 प्रतिशत और पाकिस्तान के वैश्विक व्यापार का लगभग 3.2 प्रतिशत था.

वर्तमान वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में भारत का पाकिस्तान को निर्यात 45.25 करोड़ डॉलर तथा आयात मात्र 71 लाख डॉलर का रहा है. पिछले सम्पूर्ण वित्तीय वर्ष में, पाकिस्तान को भारत से किया गया कुल निर्यात 2.06 अरब डॉलर रहा था, जबकि आयात 49.5 करोड़ डॉलर के स्तर पर थे. वर्तमान में पाकिस्तान द्वारा भारत को किए जाने वाले निर्यात में सीमेंट (7.83 करोड़ डॉलर), उर्वरक (3.49 करोड़ डॉलर), फल (11.28 करोड़ डॉलर), रसायन (6.04 करोड़ डॉलर) और चमड़ा और संबद्ध उत्पाद प्रमुख मदें हैं.


परन्तु इस व्यापार में अनौपचारिक व्यापार भी एक महत्वपूर्ण मद है जो सीधे भारत-पाकिस्तान के व्यापार लेखे का हिस्सा नहीं बनती. भारत और पाकिस्तान के मामले में, अनौपचारिक व्यापार के लिए भारत-यूएई-पाकिस्तान सबसे महत्वपूर्ण चैनल हैं. इस प्रक्रिया में, भारत और यूएई के बीच और पाकिस्तान और यूएई के बीच व्यापार रिकॉर्ड किया जाता है. लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच सीधे व्यापार रिकॉर्ड नहीं किया जाता है. पाकिस्तान से भारत को निर्यात की जाने वाली प्रमुख मदें हैं - ताजे फल, सीमेंट, खनिज और अयस्क, तैयार चमड़ा, कपास, उर्वरक, कपड़े और सूखे मेवे. भारत से निर्यात की मदों में रसायन, कपास, टमाटर, प्याज, प्लास्टिक उत्पाद, अनाज, चीनी, कॉफी, दवा और तांबा आदि शामिल हैं.

प्रतिबन्ध के संभावित प्रभाव
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विदेश व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के प्रतिबंधों का भारत की तुलना में पाकिस्तान पर ही अधिक प्रभाव पड़ने की संभावना है. पाकिस्तान अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं के लिए भारत पर काफी हद तक निर्भर है और उसका प्रमुख आयात प्याज, टमाटर और रसायनों जैसी आवश्यक वस्तुएं हैं. पुलवामा के बाद पाकिस्तान में इन चीजों के लिए जो हाहाकार मचा था वह ज्ञात ही है. वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान से होने वाले आयात पर भारत इतना निर्भर नहीं है. पाकिस्तान को भारत की ज्यादा जरूरत है. तुलनात्मक तरीके से देखा जाए तो कपड़े या उर्वरक जैसी वस्तुएं भारत कहीं और से भी आसानी से आयात कर सकता है. वहीं अगर हम भारत से पाकिस्तान को किए जाने वाले निर्यात की बात करें तो भारत जिन चीजों का निर्यात पाकिस्तान को करता है, उनका दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में बड़ा बाज़ार है. इन चीजों को वहां आसानी से खपाया जा सकता है. भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार के विषय में यह भी एक उल्लेखनीय तथ्य है कि विभिन्न कारणों के चलते भारत और पाकिस्तान के बीच आयात और निर्यात 2014-15 से लगातार घट रहा है.

भारत-पाकिस्तान व्यापार पर आतंकवाद का प्रभाव
पुलवामा में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के काफिले पर जैश ए मुहम्मद के हमले के बाद भारत ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए थे, जिनमें एक था भारत सरकार द्वारा 18 अप्रैल 2019 से क्रॉस-एलओसी व्यापार को निलंबित किया जाना. अवैध हथियार, मादक पदार्थों और नकली मुद्रा को भारत में पहुंचाने के लिए पाकिस्तान-आधारित तत्वों द्वारा क्रॉस-एलओसी व्यापार मार्गों का दुरुपयोग किया जा रहा था.

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान इस समय बौखलाए हुए हैं। भारत के अनुच्छेद 370 खत्म करने बाद पाकिस्तान एक के बाद एक ऐसे फैसले ले रहा है, जो उसे गर्त में ले जा सकते हैं।


क्रॉस-एलओसी ड्यूटी-फ्री बार्टर ट्रेड जो उरी के सलामाबाद क्षेत्र को पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर के चोकोटी क्षेत्र से जोड़ने वाले मार्ग द्वारा होता था, को मार्च के प्रारंभ में ही बंद कर दिया गया था. 21 अक्टूबर, 2008 को जब भारत और पाकिस्तान के बीच क्रॉस-एलओसी व्यापार शुरू किया गया था, तो भारत की ओर से "विश्वास-निर्माण उपायों" (सीबीएम) के तहत आपसी विवादों को सुलझाने की दिशा में यह एक कदम भी था, परन्तु पाकिस्तान ने हमेशा ही इसका दुरुपयोग किया. उल्लेखनीय है कि भारत और पाकिस्तान के बीच क्रॉस-एलओसी व्यापार, सलामाबाद और चक्कन दा बाग़, जैसे दो केन्द्रों से संचालित किया जाता था.

पुलवामा के आतंकवादी हमले के बाद भारत ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया, वह था भारत द्वारा पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) का दर्जा वापस लेने का निर्णय, जिसके बाद भारत में सभी पाकिस्तानी सामानों के आयात पर 200 प्रतिशत से अधिक सीमा शुल्क लगने के बाद पाकिस्तान के भारत के साथ व्यापार को अत्यधिक नुकसान का सामना करना पड़ा था.


पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे भयंकर आर्थिक संकट से गुज़र रहा है. उसकी अर्थव्यवस्था के सारे प्रमुख संकेतक बताते हैं कि उसकी स्थिति किस हद तक जर्जर हो चुकी है. पाकिस्तान की जीडीपी की वृद्धि दर 3.3 प्रतिशत के स्तर पर आ चुकी है, जिसके और भी नीचे जाने की पूरी आशंका है. भारत की अर्थव्यवस्था के साथ इसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती. भारतीय अर्थव्यवस्था पाकिस्तान की तुलना में न केवल आकार बहुत बड़ी है बल्कि कहीं अधिक विवधता लिए हुए है, जो उसे जोखिम सहने में सक्षम बनाती है.

भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार 2,900 बिलियन डॉलर का है, जो पाकिस्तान से लगभग नौ गुना बड़ा है. भारत के 420 बिलियन विदेशी मुद्रा भंडार की तुलना में पाकिस्तान लगभग 17.4 बिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के साथ जीर्ण-शीर्ण स्थिति में है. इस स्थिति में जहां भारत छोटे-मोटे आघात सहने में सक्षम है, वहीँ दूसरी ओर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस स्थिति में आ चुकी है कि जरा सा झटका इसे धराशायी कर सकता है.

भारत-पाकिस्तान व्यापार : कल और आज
1947 में पाकिस्तान के स्वतंत्र राष्ट्र बनने के साथ ही भारत के साथ व्यापार सम्बन्धों का प्रारंभ हुआ. 1948-49 में पाकिस्तान के 70 प्रतिशत से अधिक व्यापारिक लेन-देन भारत के साथ थे, जबकि उस समय भारतीय निर्यात का 63 प्रतिशत हिस्सा अकेले पाकिस्तान को जाता था. परन्तु 1949 के उत्तरार्ध से भारत-पाक व्यापार संबंधों में तेजी से गिरावट आई. 1958 में पाकिस्तान में सैन्य तानाशाही का प्रारंभ हुआ और आंतरिक समस्याएं बढ़ने लगीं. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय से यह व्यापार पूरी तरह रोक दिया गया, जिसमें पाकिस्तान की ही अग्रणी भूमिका थी. यह रोक 1974 तक जारी रही, जब शिमला समझौते के बाद शुरू हुए वार्तालाप के क्रम में 30 नवंबर 1974 को एक व्यापार प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए गए और 7 दिसंबर 1974 से व्यापार पुन: आरम्भ हुआ.

1988 में जनरल जिया उल हक की मौत के बाद पाकिस्तान में लोकतान्त्रिक सरकार आई. इससे पहले दिसम्बर 1985 में सार्क की स्थापना हो चुकी थी जो दक्षिण एशिया के देशों में घनिष्ठ व्यापारिक संबंधों का समर्थक था. जुलाई 1989 में, पाकिस्तान ने 322 भारतीय वस्तुओं के आयात पर सहमति व्यक्त की. हालांकि भारत-पाकिस्तान को 1976 से ऐसी सुविधाएं देता आ रहा था. व्यापार में एक महत्वपूर्ण चरण दिसंबर 1995 में संपन्न दक्षिण एशियाई अधिमान्य व्यापार व्यवस्था (SAPTA) से आया जिसने क्षेत्र में एक एकीकृत व्यापार व्यवस्था शुरू की.


भारत ने 1996 में पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशनल (एमएफएन) का दर्जा दिया. उसी वर्ष, पाकिस्तान ने अपनी सकारात्मक सूची को 600 वस्तुओं तक बढ़ा दिया, जो भारत से कानूनी रूप से आयात की जा सकती हैं. 2003 में भारत का ट्रेड कॉम्प्लीमेंट्री इंडेक्स (टीसीआई) 50 प्रतिशत था, जबकि भारत के साथ पाकिस्तान का TCI केवल 14 प्रतिशत था. आज भी यह इंडेक्स भारत के पक्ष में ही झुका हुआ है जो यह स्पष्ट करता है कि इस द्विपक्षीय व्यापार में पाकिस्तान की भारत पर निर्भरता कहीं अधिक है. इसलिए इस व्यापार के बंद होने का नुकसान भी स्वाभाविक रूप से उसे ही ज्यादा उठाना पड़ेगा.

वर्तमान में पाकिस्तान में खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं. पाकिस्तान की लगभग आधी आबादी इस बढ़ती महंगाई के कारण दो वक्त का खाना जुटाने में मुश्किलों का सामना कर रही है. ऐसी स्थिति में भारत से सस्ते आयात को बंद करना पाकिस्तान की जनता पर दोहरी मार साबित हो सकती है.


आटा और चीनी जैसी रोजमर्रा की चीजों का जबरदस्त अभाव पाकिस्तान की सरकार पर सवाल खड़े कर रहा है. पुलवामा के बाद जब पाकिस्तान से MFN का दर्जा वापस लिया गया था तब भी इस निर्णय से पाकिस्तान के छोटे व्यापारी वर्ग को भारी मात्रा में नुकसान सहना पड़ा था. इस वर्ष पाकिस्तान में कृषि की हालत खस्ता है. कपास, कपड़ा और तैयार वस्त्र पाकिस्तान के वैश्विक निर्यात का बड़ा हिस्सा हैं. इस बार पाकिस्तान में कपास उत्पादन 18 प्रतिशत तक गिरा है और उसे अब अपने सबसे लाभदायक व्यापार, यूरोपियन यूनियन को कपड़े और तैयार वस्त्र का निर्यात करने में भारत के सस्ते कपास की आवश्यकता थी. इसके लिए सौदे भी हो रहे थे परन्तु अब यह मौक़ा समाप्त हो चुका है. राज्य जब अपने कृत्रिम अहं और दंभ को तुष्ट करने के लिए अपनी जनता के जीवन और उसके हितों को दांव पर लगा दे तो यह कदम उसे केवल विनाश के गर्त की ओर ही ले जाते हैं जो आज पाकिस्तान के साथ हो रहा है. दिवालियेपन की कगार पर खड़े पाकिस्तान के लिए भारत के प्रति द्वेषपूर्ण रवैया उसके लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है. लोकतान्त्रिक सरकार का इस तरह से योजनाबद्ध पतन, पाकिस्तान में सैन्य शासन की आसन्न दस्तक भी हो सकती है.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं)

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First published: August 8, 2019, 6:54 PM IST
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