OPINION: पाकिस्तान में महफूज़ नहीं हैं बच्चे, हैरान करने वाले हैं क्राइम से जुड़े ये आकंड़े

Cruel Numbers 2018 के नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के दस से अधिक बच्चे प्रतिदिन यौन उत्पीड़न का शिकार होते हैं. 2017 की तुलना में 2018 में इस तरह के मामलों में 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

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Updated: July 12, 2019, 11:16 AM IST
OPINION: पाकिस्तान में महफूज़ नहीं हैं बच्चे, हैरान करने वाले हैं क्राइम से जुड़े ये आकंड़े
पाकिस्तान में बच्चों के खिलाफ बढ़ रहे हैं अपराध. (सांकेतिक तस्वीर)
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Updated: July 12, 2019, 11:16 AM IST
(संतोष के वर्मा)

पाकिस्तान में अपराधों का ग्राफ लगातार बढ़ता ही जा रहा है. बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं. पाकिस्तान में बच्चों के साथ होने वाले अपराधों की बढ़ती हुई संख्या एक अत्यधिक चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है. बच्चों के यौन शोषण और बाल संरक्षण पर काम करने वाला गैर सरकारी संगठन साहिल पिछले दो दशकों से Cruel Numbers नाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित करता आ रहा रहा है. इसके लिए सामग्री, ऑनलाइन और मुद्रित समाचार पत्रों के माध्यम से एकत्र किए गए डेटा के साथ साथ, मुफ्त कानूनी सहायता के लिए साहिल के विभिन्न क्षेत्रीय कार्यालयों में आने वाले मामलों और इस के साथ साथ इस विषय पर काम करने वाले अन्य संगठनों द्वारा देखे और साझा किए जाने वाला मामलों से आती हैं.

यह रिपोर्ट पाकिस्तान के चारों प्रान्तों में प्रकाशित होने वाले 85 समाचार पत्रों में प्रकाशित इन विषयों से संबंधित समाचारों के विशद अध्ययन के आधार पर तैयार की गई है .

Cruel Numbers 2018 के नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के दस से अधिक बच्चे प्रतिदिन यौन उत्पीडन का शिकार होते हैं. 2017 की तुलना में 2018 में इस तरह के मामलों में 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इन आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018 में 3832 मामले प्रकाश में आये, जिनमें पीड़ितों में 55 प्रतिशत लड़कियां और 45 फीसदी बच्चे हैं.

साल 2018 के आंकड़ों के अनुसार, बालकों के लिए 6-10 वर्ष और 11-15 वर्ष का आयु वर्ग खतरे की सर्वाधिक जद में रहा है, जबकि बालिकाओं के लिए 0-5 वर्ष और 16-18 वर्ष आयु वर्ग इन अपराधों से सर्वाधिक प्रभावित रहा है. एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि 0-5 वर्ष की अवस्था के बच्चों के साथ अपराध के 2018 में 408 मामले देखने में आये, जो 2017 की तुलना में 141 प्रतिशत अधिक है. जब इस आयु वर्ग के खिलाफ 169 मामले देखने में आये थे. यह एक अत्यंत चिंताजनक स्थिति है.


अपराधों में सबसे ऊपर अपहरण

इस रिपोर्ट में बच्चों के खिलाफ  इन अपराधों को 31 श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है, जिनमें सबसे बड़ी संख्या अपहरण की है. इन बच्चों को मानव तस्करी, बंधुआ मजदूरी और व्यावसायिक यौन शोषण जैसे दलदल में धकेल दिया जाता है. 2018 में अपराधों में अपहरण के सर्वाधिक 923 मामले सामने आये. वहीं, अप्राकृतिक कृत्यों के 589 मामले दर्ज किये गए .
इसके साथ ही बलात्कार के 537, बच्चों की गुमशुदगी के 452, बलात्कार के प्रयास के 345, सामूहिक अप्राकृतिक कृत्य के 282, सामूहिक बलात्कार के 156 और बाल विवाह संबंधी 99 मामले दर्ज हुए. 2017 की तुलना में इस वर्ष अप्राकृतिक कृत्य के मामलों में 61 प्रतिशत और बलात्कार के मामलों में 15 प्रतिशत की तेजी देखी गई .

उल्लेखनीय है कि बच्चों के खिलाफ इन अपराधों में अपराधियों की निशानदेही कठिन हो जाती है. खासकर तब जब वह परिचितों के समूह से न हों. इन मामलों में 5628 शोषणकर्ताओं की पहचान कर ली गई इसमें वे भी शामिल हैं, जिन्होंने गिरोह के रूप में अपराध को अंजाम दिया. इस रिपोर्ट के अनुसार शोषणकर्ताओं में सर्वाधिक बड़ी संख्या परिचितों की ही रही है (3832 में से 1787 ). कुल 3702 मामलों में (कुल में से 130 बाल विवाह के मामलों को निकाल दिये गए हैं ) तो 1571 या 41 प्रतिशत मामले बंद स्थानों पर हुए जबकि 544 अर्थात 14 प्रतिशत मामलों में खुले स्थानों पर अपराध को अंजाम दिया गया. 1587 मामलों में जगह से संबंधित किसी भी तरह की जानकारी नहीं दी गई .



पंजाब का नंबर सबसे ऊपर 

अगर हम इन अपराधों का भौगोलिक आधार पर वर्गीकरण करें तो 2018 में जो 3832 मामले सामने आये हैं, जिनमें से सर्वाधिक 63 प्रतिशत मामले पंजाब से, 27 प्रतिशत सिंध से, 4 प्रतिशत खैबर पख्तून्ख्वा से , 3 प्रतिशत इस्लामाबाद राजधानी क्षेत्र से और 2 प्रतिशत मामले बलूचिस्तान से हैं. जहां अन्य क्षेत्रों में 2017 की तुलना में अपराधों की संख्या में वृद्धि हुई है. वहींं, दूसरी ओर बलूचिस्तान एक ऐसा क्षेत्र है जहां इनमें कमी देखी गई है.

2017 में जब यहां इस तरह के अपराधों के 139 मामले देखे गए थे, इसकी तुलना में 2018 में इनकी संख्या घटकर 98 रह गई. अपराधों की संख्या का इन प्रान्तों में संचार साधनों की पहुंच, पुलिस और थानों तक सुगम पहुंच और सामाजिक निषेधों से सीधा संबंध है.


अगर हम इन आंकड़ों को जिले के स्तर पर वर्गीकृत करें, तो पाकिस्तान के 4 प्रान्तों के 111 जिलों में हमे अत्यधिक भिन्नता देखने को मिलती है. उन अपराधों का सकेंद्रण कुछ जिलों में अत्यधिक देखने को मिलता है. इन 3832 मामलों के 41 प्रतिशत मामले केवल 10 जिलों में देखे गए हैं, जिनमे सर्वाधिक अग्रणी पाकिस्तान की सर्वशक्तिमान सेना का गढ़ रावलपिंडी हैं, जहां वर्ष 2018 में इस तरह के 235 मामले देखे गए हैं. इसके बाद मुल्तान (192 ) और फैसलाबाद (172 ) का स्थान है. इसके बाद वेहरी, लाहौर, कसूर, खैरपुर, शेखुपुरा, इस्लामाबाद और सियालकोट का स्थान आता है.

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शहरी क्षेत्रों  की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति खराब

शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति कहीं अधिक खराब है. कुल 3832 मामलों में से 2770 या 72 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में दर्ज किये गए हैं, वहीं 1062 या 28 प्रतिशत मामले शहरी क्षेत्रों में देखे गए हैं. 2017 में ग्रामीण क्षेत्रों में 76 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 24 प्रतिशत मामले देखे गए थे. ग्रामीण क्षेत्रो में संचार और यातायात के साधनों की कमी, पुलिस की तुलनातमक अनुपलब्धता स्थानीय शक्तिशाली और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का वर्चस्व इसके संभावित कारण हैं .

समाचारपत्रों की इन रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 86 प्रतिशत मामलों में पुलिस ने केस दर्ज किया है, जबकि 11 प्रतिशत मामलों में केस दर्ज होने की क्या स्थिति रही इस विषय में समाचार पत्रों में स्पष्ट रूप से कुछ भी कहा नहीं गया. इस वर्ष सामने आये 3832 मामलों में 2327 बाल यौन शोषण के मामले हैं, जिसमे अपहरण, बाल विवाह और बच्चों की गुमशुदगी के मामले शामिल नहीं हैं.

इनमे से 51 प्रतिशत मामलों में पीड़ित बालिकाएं हैं और 49 प्रतिशत में बालक. पिछले वर्ष 2017 की तुलना में इस वर्ष 2018 में बाल यौन शोषण के मामलों में 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. 2018 में अपहरण के 1064 मामले सामने आये जिनमे 79 प्रतिशत पीड़ित बालिकाएं थी और 21 प्रतिशत बालक. 2018 में बाल विवाह के 130 मामले सामने आये, जिनमें 85 प्रतिशत में बालिकाएं और 15 प्रतिशत में बालक प्रभावित हुए.



बालविवाह में सिंध सबसे ऊपर 

बाल विवाहों के मामले में सिंध की स्थिति सबसे खराब है, यहां बाल विवाह के कुल मामलों के 65 प्रतिशत मामले देखे गए हैं जबकि दूसरे नंबर पर पंजाब है, जहां इस तरह के मामलों का 33 प्रतिशत देखा गया है . इस तरह के 2-2 प्रतिशत मामले खैबर पख्तून्ख्वा और इस्लामाबाद राजधानी क्षेत्र में सामने आये हैं. स्पष्ट कानूनों के अभाव में बालविवाह पर रोक लगा पाना एक दुष्कर कार्य हो गया है.

यह एक स्थापित तथ्य है कि जो बच्चे इस तरह के खतरों का शिकार होते हैं, कई मामलो में उनके जीवन में कठिनाइयां आती हैं, क्योंकि उन्हें अपने जीवन के इस आघात से जूझना पड़ता है. हालांकि, कई बार बच्चे इसे पीछे छोड़ने में सक्षम हो जाते हैं, लेकिन इन सबके साथ संभव नहीं हो पाता, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है और यह प्रभाव उनके व्यवहार और उनके जीवन जीने के तरीके को प्रभावित करता है.


पाकिस्तान में जहां सामाजिक पिछड़ापन और दकियानूसी विचारधारा विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, इस तरह के अपराधों के लिए विशेष रूप से जिम्मेदार है. वहीं दूसरी ओर उपयुक्त कड़े कानूनों की कमी और उन्हें लागू कराने वाली प्रवर्तन एजेंसियों का नाकारापन इस समस्या को और भी अधिक विकराल बना देता है.

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