Analysis: पाकिस्तान का नया दोस्त बन रहा तुर्की, रक्षा से लेकर रसद तक में कर रहा है मदद

पाकिस्तान के लिए तुर्की लंबे समय से एक आदर्श आर्थिक और राजनीतिक मॉडल माना जाता रहा. पाकिस्तानी सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ ने भी मुस्तफा कमाल के धर्मनिरपेक्ष सुधारों और कठोर शासन के लिए सार्वजानिक रूप से प्रशंसा की.

News18Hindi
Updated: July 5, 2019, 10:27 AM IST
Analysis: पाकिस्तान का नया दोस्त बन रहा तुर्की, रक्षा से लेकर रसद तक में कर रहा है मदद
इमरान खान के साथ तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन
News18Hindi
Updated: July 5, 2019, 10:27 AM IST
(संतोष के वर्मा)
हाल ही में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफएटीएफ) की बैठक संपन्न हुई, जिसमें पाकिस्तान जो अभी एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में शामिल है, टास्क फ़ोर्स द्वारा निर्धारित प्रतिबद्धताओं को पूरा न करने के कारण ब्लैक लिस्ट में जाने वाला था. लेकिन, चीन और मलेशिया के साथ साथ पाकिस्तान के गहरी दोस्ती माने जाने वाले तुर्की के सहयोग से पाकिस्तान इसे टालने में कामयाब हो गया. इसके साथ साथ विविध अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर दोनों का घनिष्ठ सहयोग देखा जा रहा है.

पाकिस्तान और तुर्की के बीच संबंधों का एक लंबा दौर रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय से इनमें घनिष्ठता लगातार बढ़ी है. उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के स्वतंत्र होने के तुरंत बाद तुर्की ने इसे एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दे दी थी. पाकिस्तान के जनक मुहम्मद अली जिन्ना, मुस्तफा कमाल अतातुर्क के बड़े प्रशंसक थे. उन्हीं के आधुनिक तुर्की के मॉडल पर पाकिस्तान का निर्माण करना चाहते थे. लेकिन, सितंबर 1948 में उनकी मौत के बाद यह योजना अधूरी रह गई. हालांकि, दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक और भू-राजनीतिक संबंधों के कारण द्विपक्षीय संबंध तेजी से बढ़ने लगे.

ब्रिटेन की संसद ने बंटवारे पर मुहर लगाई फिर बंटने लगा ये देश


पाकिस्तान के लिए तुर्की लंबे समय से एक आदर्श आर्थिक और राजनीतिक मॉडल माना जाता रहा. पाकिस्तानी सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ ने भी मुस्तफा कमाल के धर्मनिरपेक्ष सुधारों और कठोर शासन के लिए सार्वजानिक रूप से प्रशंसा की. जिसके कारण पाकिस्तान के अंदर भी उन्हें इस्लामिक कट्टरपंथियों की आलोचना का भी शिकार होना पड़ा. लेकिन, इन संबंधों में तुर्की में राष्ट्रपति पद पर एर्डोगान के सत्ता में आने के बाद जो तेजी देखी गई, वो अभूतपूर्व है.


एर्डोगान 2014 में तुर्की के राष्ट्रपति बने. हालांकि, इससे पहले 2003 से 2014 के दौरान वह तुर्की के प्रधानमंत्री पद का दायित्व संभाल चुके थे, लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद तुर्की अंदरूनी और बाहरी कलेवर में परिवर्तन और प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगे. 2016 में एक असफल तख्तापलट के बाद पाकिस्तान द्वारा जिस सहयोग सद्भाव और एकजुटता का प्रदर्शन एर्डोगान के पक्ष में किया गया, उसने वर्तमान तुर्की सरकार के साथ पाकिस्तान के संबंधों को और भी मजबूत बनाने का काम किया.
Loading...


पाकिस्तान-तुर्की के आर्थिक रिश्ते?

अगर हम पाकिस्तान और तुर्की के आर्थिक संबंधों की बात करे, तो दोनों देशों के बीच व्यापार वृद्धि की ओर अग्रसर है. 2017 तक पाकिस्तान में तुर्की का निवेश 1 अरब डॉलर से अधिक हो गया है. तुर्की ने वहां कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं में निवेश किया है. जैसे मेट्रोबस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम का विकास. पाकिस्तान और तुर्की के बीच आर्थिक संबंधों की मजबूती का एक मुख्य आधार पाक-तुर्की स्ट्रेटेजिक इकनोमिक फ्रेमवर्क है. इस फ्रेमवर्क का उद्देश्य व्यापार और निवेश पर विशेष ध्यान देने के साथ द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग को बढ़ाना है.

पत्नी आयशा के साथ इमरान खान


दोनों देशों के नेताओं का मानना है कि ये फ्रेमवर्क निवेश और व्यापार संबंधों के लिए व्यापक रणनीतिक नीति ढांचे के रूप में काम करेगा, जिसे एक उच्च स्तरीय रणनीतिक सहयोग परिषद समग्र मार्गदर्शन और दृष्टि प्रदान करेगी. इस फ्रेमवर्क का उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार की मात्रा को पांच गुना बढ़ाना है, जो 2018 में 900 मिलियन अमेरिकी डॉलर था. इसके साथ ही तुर्की और पाकिस्तान दोनों ही देश आर्थिक सहयोग संगठन के सदस्य और आठ विकासशील देशों के संगठन D-8 का हिस्सा हैं.

पाकिस्तान और तुर्की एक दुसरे से बड़े पैमाने पर व्यापारिक लेनदेन भी करते हैं. पाकिस्तानी के तुर्की को निर्यात में मुख्यत: कृषि उत्पाद जैसे चावल, तिल, चमड़ा, कपड़े, खेल के सामान और चिकित्सा उपकरण शामिल हैं. वहीं, दूसरी ओर तुर्की के पाकिस्तान को निर्यात में गेहूं, मसूर, डीजल, रसायन, परिवहन वाहन, मशीनरी और ऊर्जा उत्पाद शामिल हैं. तुर्की के कई प्राइवेट निगमों ने भी राजमार्गों, पाइपलाइनों और नहरों को विकसित करने वाली औद्योगिक और निर्माण परियोजनाओं में महत्वपूर्ण निवेश किया है। इसके साथ ही साथ दोनों देश तुर्की-पाकिस्तान मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं।


पाकिस्तान-तुर्की के सामरिक रिश्ते
दोनों देशों के सामरिक संबंधों का इतिहास भी पुराना है. दोनों राष्ट्र केंद्रीय संधि संगठन (CENTO) नामक शीतयुद्ध कालीन गठबंधन का हिस्सा थे. इसका लक्ष्य सोवियत संघ की दक्षिणी सीमाओं से सटे हुए मजबूत राज्यों की एक पंक्ति खड़ी करना था, और तब ही से इन दोनों देशों के बीच सैन्य संपर्क दृढ़ बना हुआ है. भारत के दो पडोसी देशों पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान दोनों के साथ तुर्की ने मजबूत सामरिक संबंध बनाने के लिए महतर प्रयास किये हैं.

एयर स्ट्राइक के बाद एयरस्पेस बंद करने से पाक को हुआ 688 करोड़ का नुकसान

इसका एक महत्वपूर्ण चरण त्रिपक्षीय अंकारा कोऑपरेशन प्रोसेस है, जिसकी शुरुआत फरवरी 2007 में तुर्की के तत्कालीन विदेश मंत्री अब्दुल्ला गुल की पाकिस्तान यात्रा के बाद हुई. इसके उद्देश्यों को और स्पष्टता गुल के ही बयान से मिलती है, जिसमें उन्होंने इस संगठन के विषय में कहा था कि "हम सभी भाई हैं, जिन्हें एक-दूसरे का समर्थन करने की आवश्यकता है, ताकि क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता आ सके."

तुर्की के साथ पाकिस्तान के संबंध का एक अन्य महत्वपूर्ण सहयोगी देश तुर्की का पडोसी अजरबैजान भी है, जिसके साथ पाकिस्तान के संबंधों में मधुरता आर्मेनिया की कीमत पर आती है. उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान ही दुनिया का वह एकमात्र देश है, जो आर्मेनिया के अस्तित्व को मान्यता नहीं देता. इसके साथ ही साथ पाकिस्तान और तुर्की दोनों देश भी नागोर्नो-करबाख के विवादित क्षेत्र पर अजरबैजान के दावों को मान्यता देते हैं.

पाकिस्तान तुर्की के बीच मतभेद के बिंदु
तुर्की और पाकिस्तान दोनों ने अफगानिस्तान पर सोवियत कब्जे के दौरान मुजाहिदीन युद्ध का समर्थन किया था. संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ उनकी नजदीकियां और कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा के प्रति उनके स्वाभाविक झुकाव, उन्हें तालिबान के नजदीक लाया, जो कि स्वयं एक पाकिस्तानी उत्पाद है. लेकिन तालिबान संबंधी कुछ मामलों में पाकिस्तान और तुर्की के मध्य संबंध तनावपूर्ण भी हुए. 1990 के दशक के उत्तरार्ध में जब नॉर्दर्न एलायंस तालिबान शासन के प्रतिरोध देना शुरू कर दिया. तब तुर्की ने नॉर्दर्न एलायंस की भारी मदद करनी शुरू कर दी थी, क्योंकि तुर्की और उजबेक एक समान विरासत का दावा करते हैं.


पाकिस्तान-तुर्की सैन्य सहयोग

वर्तमान में पाकिस्तान और तुर्की के बीच रक्षा सहयोग उनकी रणनीतिक साझेदारी में एक महत्वपूर्ण कारक है. इसकी सक्रिय शुरुआत 1988 में हुई जब दोनों देशों के बीच एक सैन्य सलाहकार समूह स्थापित किया गया था, जो दोनों देशों के बीच सैन्य प्रशिक्षण और रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में अनुभवों का नियमित आदान-प्रदान करने में सहायक है. 9/11 की घटना दोनों देशों के रणनीतिक सबंधों लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है, जब उन्होंने अपनी नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन किये. इसी क्रम में 2003 में एक उच्च-स्तरीय सैन्य संवाद की शरुआत हुई, जो पाक-तुर्क रक्षा संबंधों को सुविधाजनक बनाने वाला एक सक्रिय मंच है.

मध्य एशिया में तुर्की रक्षा उत्पादों का एक तेजी से बढ़ता हुआ बाज़ार है. पाकिस्तान की निर्भरता इस पर लगातार बढ़ती जा रही है. वर्तमान स्थितियों में पाक-तुर्क संबंध अपने चरम पर हैं. पाकिस्तान अन्य देशों की तुलना में तुर्की को एक अधिक विश्वसनीय रक्षा साझेदार मानता है, जिसने ज़रूरत के समय में पाकिस्तान का सदा साथ दिया है. 2018 में पाकिस्तान ने 1.5 अरब डॉलर के एक रक्षा सौदे को सम्पन्न किया, जिसमें तुर्की से 30 ATAK हेलीकॉप्टर खरीदे हैं. यह सौदा दोनों सहयोगियों के बीच अब तक का सबसे बड़ा रक्षा समझौता है. इसके साथ साथ 20 मिमी और 70 मिमी की गन्स और 76-रॉकेट प्रणाली भी पाकिस्तान को उपलब्ध कराये गए हैं.

सैनिकों की अदला-बदली
तुर्की के साथ पाकिस्तान का रक्षा सहयोग केवल रक्षा क्षमताओं के विकास और उत्पादों तक सीमित नहीं है. वास्तव में, पिछले एक दशक के दौरान, पाकिस्तान और तुर्की ने अपने द्विपक्षीय सैन्य शिक्षा विनिमय कार्यक्रम के तहत बड़ी संख्या में सैन्य अधिकारियों का आदान-प्रदान किया है. पिछले एक दशक के दौरान लगभग 1500 पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों ने तुर्की में प्रशिक्षण पाठ्यक्रम पूरा किया है.

इमरान खान के साथ तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन


पाकिस्तान-तुर्की का भारत विरोधी रुख
हालांकि, भारत और तुर्की के बीच राजनयिक संबंध हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से तुर्की की नीतियां जितनी अधिक पाक उन्मुख होती जा रही हैं, वह उसे उतना ही भारत के विपक्ष में खड़ा कर रही हैं. तुर्की ने हाल ही में कश्मीर स्वतंत्रता के लिए भारत-पाकिस्तान के बीच एक द्विपक्षीय समझौते में अपनी भूमिका के बारे में अधिक जोर देने जैसे विवादस्पद सुझाव दिए हैं, जिन्हें भारत अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मानता है और उन्हें सिरे से खारिज करता है.

फरवरी 2019 में पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत द्वारा किये गए सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान इमरान खान और एर्डोगान में लगातार चर्चा होती रही. साथ ही एर्डोगान ने भारतीय सैन्य अधिकारी विंग कमांडर अभिनंदन को छोड़ने के लिए खान के फैसले की प्रशंसा की थी. इस प्रकार इस संघर्ष में पाकिस्तान को कूटनीतिक बढ़त दिलाने का प्रयास किया. इसके साथ ही साथ आर्गेनाईजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन में भारत के खिलाफ सतत गुटबाजी करने में टर्की पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी है. तुर्की ने भारत के साथ अपने संबंधों को हमेशा पाकिस्तान के चश्मे से देखा. पाकिस्तान के साथ-साथ उसकी नीतियां भारत की तुलना में चीन के साथ तुर्की के संबंधों को प्राथमिकता देती है.

(लेखक जम्मू-कश्मीर स्टडी सेंटर से संबद्ध हैं)
First published: July 5, 2019, 8:56 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...