OPINION: अब पाकिस्तान को नहीं मिलेगी अमेरिकी मदद!

पाकिस्तान को अमेरिकी सहायता की शुरुआत 1947 से ही हुई. अमेरिका पाकिस्तान को मान्यता देने वाले पहले देशों में था. अमेरिका की पाकिस्तान को सहायता सैन्य और असैन्य दोनों प्रकार की थी.

News18Hindi
Updated: July 15, 2019, 10:44 AM IST
OPINION: अब पाकिस्तान को नहीं मिलेगी अमेरिकी मदद!
20 जुलाई को अपने पहले अमेरिकी दौरे पर रवाना होंगे इमरान खान. (फाइल फोटो)
News18Hindi
Updated: July 15, 2019, 10:44 AM IST
(संतोष के. वर्मा)

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान 20 जुलाई को अमेरिका के अपने पहले दौरे पर रवाना हो रहे हैं जहां वह 22 जुलाई को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मिलने वाले हैं जिसकी पुष्टि व्हाइट हाउस ने कर दी है . व्हाइट हाउस की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि दोनों नेता आतंकवाद निरोधी अभियान, रक्षा, ऊर्जा और व्यापार के मुद्दों पर चर्चा करेंगे. पाकिस्तान के बुरे हालात और फारस की खाड़ी क्षेत्र में व्याप्त तनाव के चलते यह यात्रा महत्वपूर्ण मानी जा रही है. हालांकि इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह पहली अमेरिका यात्रा है, पर व्यक्तिगत रूप से भी इमरान लम्बे समय से अमेरिका जाने से बचते रहे हैं जिसका एक कारण यह भी था कि लम्बे समय से उनकी पार्टनर रही सीटा व्हाइट ने उन्हें एक कानूनी प्रक्रिया में खींच लिया था क्योंकि इमरान उनकी बेटी टायरिन के पितृत्व से इनकार कर रहे थे.



पिछले वर्षों में पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी व्यवहार में अपेक्षाकृत कठोरता दिखाई दे रही है. पिछले वर्ष सितम्बर माह में अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ की यात्रा के महज कुछ दिन पूर्व ही, अमेरिकी रक्षा विभाग ने 300 मिलियन डॉलर के पाकिस्तान को स्थायी सहायता की कटौती की घोषणा की थी. इससे पहले अमेरिका ने अगस्त माह की शुरुआत में पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता में 75 प्रतिशत तक की कटौती कर इसे 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर से 150 मिलियन डॉलर तक लाने की बात कही थी. इसके लिए अमेरिका के National Defence Authorization Act 2019 में स्पष्ट रूप से कहा कहा गया कि हक्कानी नेटवर्क या लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के खिलाफ कार्रवाई में पाकिस्तान की कोई आवश्यकता नहीं है और इसके साथ ही पाकिस्तान को देश में आतंकवादी गतिविधियों के लिए कोई प्रतिपूर्ति नहीं मिलेगी. यूएस सीनेट में यह बिल पिछले वर्ष 6 अगस्त को पारित हो चुका है .

ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि इस्लामाबाद ने अफगानिस्तान में 17 साल के युद्ध के दौरान तालिबान लड़ाकों को शरण ही प्रदान की है. उल्लेखनीय है कि इस तथाकथित Coalition Support Fund द्वारा दी जाने वाली सहायता को भी वर्ष 2018 की शुरुआत में उस वक्त निलंबित कर दिया गया था (अमेरिका ने पाकिस्तान की चीन में से बढती निकटता अफगान तालिबान और हक्कानी नेटवर्क जैसे आतंकवादी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल होने पर पाकिस्तान को 1.5 बिलियन अमरीकी डालर की सहायता रोक दी थी ) जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक ट्वीट में कहा था कि 2002 से पाकिस्तान को दी गई 33 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता के बदले अमेरिका को 'झूठ और छल' के अलावा कुछ भी नहीं मिला. पिछले साल राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में Enhanced Partnership with Pakistan Act of 2009 जिसे केरी-लूगर-बर्मन एक्ट के नाम से भी जाना जाता है, के तहत पाकिस्तान को प्रति वर्ष 1.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता दी जाती थी.



ये भी पढ़ें: पाकिस्तान में महफूज़ नहीं हैं बच्चे, हैरान करने वाले हैं क्राइम से जुड़े ये आकंड़े

पाकिस्तान को अमेरिकी सहायता के चरण
Loading...

पाकिस्तान को अमेरिकी सहायता की शुरुआत 1947 से ही हुई. अमेरिका पाकिस्तान को मान्यता देने वाले पहले देशों में था. अमेरिका की पाकिस्तान को सहायता सैन्य और असैन्य दोनों प्रकार की थी. अमेरिकी सहायता ने पाकिस्तान में अनेक नागरिक संस्थानों की आधारशिला रखी जैसे, इंस्टीट्यूट फॉर बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन, जिन्ना पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल सेंटर, सिंधु बेसिन प्रोजेक्ट, फैसलाबाद एग्रीकल्चर इंस्टिट्यूट (जो पाकिस्तान की हरित क्रांति के मार्ग को प्रशस्त करने वाला था ). 1960 और 1970 के दशक में, संयुक्त राज्य अमेरिका मंगला और तारबेला बांधों के निर्माण के लिए एक प्रमुख दानदाता था, जो उनके पूरा होने बाद पाकिस्तान के कुल बिजली उत्पादन का 70 प्रतिशत उपलब्ध कराते थे. 1980 के दशक और 1990 के दशक के शुरू में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने सिंध में गुड्डू पावर स्टेशन और लाहौर यूनिवर्सिटी फॉर मैनेजमेंट साइंसेज बनाने में मदद की, जिसे अब देश के शीर्ष बिजनेस स्कूलों में से एक माना जाता है.

इसके साथ ही साथ पाकिस्तान को अमेरिका से बड़ी मात्रा में सैन्य सहायता भी प्राप्त हो रही थी और पाकिस्तान 1955 तक SEATO और CENTO का सक्रिय सदस्य बन चुका था. 1954 के सुरक्षा समझौते ने संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को आर्थिक सहायता के रूप में 1954 से 1964 के बीच लगभग 2.5 अरब डॉलर और सैन्य सहायता के रूप में 700 मिलियन प्रदान करने के लिए प्रेरित किया. 1962 में पाकिस्तान को अमेरिकी सहायता अपने सर्वकालिक उच्च स्तर 2 अरब डॉलर तक जा पहुंची. 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तानी युद्धों के तुरंत बाद अमेरिकी सैन्य सहायता में गिरावट आई और 1979 में सीआईए की पुष्टि के बाद कि पाकिस्तान परमाणु बम के निर्माण में संलग्न है, तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने पाकिस्तान को सभी सहायता (खाद्य सहायता को छोड़कर) निलंबित कर दी थी. परन्तु अफगानिस्तान में सोवियत संघ के प्रवेश और उसके विरुद्ध मुजाहिदीन युद्ध ने स्थितियों को एकदम से उलट दिया. अब पाकिस्तान, सोवियत संघ के विरुद्ध युद्ध में अमेरिका का सबसे विश्वसनीय साथी बन गया और उसे प्रचुर मात्रा में सैन्य और असैन्य सहायता उपलब्ध कराई जाने लगी. इस एक दशक के दौरान पाकिस्तान को अमेरिका द्वारा लगभग 5 अरब डॉलर की सहायता उपलब्ध कराइ गई. परन्तु 90 के दशक की शुरुआत होते होते स्थितियां फिर परिवर्तित होने लगी. सोवियत संघ की अफगानिस्तान से वापसी हो चुकी थी और उसके विघटन ने भविष्य में उसकी इस क्षेत्र में प्रसार की संभानाओं को क्षीण कर दिया था. ऐसे में अमेरिका का पाकिस्तान के 'कुकृत्यो' पर निगाह पड़नी आवश्यक थी.



अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश द्वारा इस बात को प्रमाणित करने में असफल रहने पर कि पाकिस्तान के पास परमाणु अस्त्र नहीं हैं, प्रेसलर संशोधन द्वारा उसे बड़ी मात्रा में सहायता में कटौती कर दी, जो एक दशक तक जारी रही. 1993 में USAID का पाकिस्तान मिशन भी बंद कर दिया गया. इस दशक में अमेरिकी सहायता, आर्थिक सहायता के रूप में 429 मिलियन डॉलर और सैन्य सहायता के रूप में 5.2 मिलियन डॉलर के न्यूनतम स्तर पर आ गई और पाकिस्तानियों ने कड़वाहट से कहना शुरू कर दिया कि, संयुक्त राज्य अमेरिका ने उन्हें दशकों तक उपयोग करने बाद फेंक दिया है. 1998 में नवाज शरीफ सरकार द्वारा परमाणु परिक्षण और नाभिकीय शक्ति के वैश्विक प्रदर्शन के बाद सहायता में और भी व्यापक कटौतियां की गईं . परवेज़ मुशर्रफ द्वारा सत्ता पलट के बाद पाकिस्तान पर दबाब और भी बढ़ता जा रहा था और लोकतंत्र की पुन:स्थापना को सहायता की अनिवार्य शर्त बतया जा रहा था परन्तु अमेरिका में 9/11 की आतंकवादी घटना के पश्चात भाग्य की देवी एक बार फिर पाकिस्तान की ओर मुस्कराई .



तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश जूनियर ने आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक युद्ध की घोषणा की जिसके निशाने पर सबसे पहले अफगानिस्तान का तालिबान शासन आया. यह वही तालिबान था जिसको अमेरिका ने पाकिस्तान की सहायता से मुजाहिदीन वार के समय सोवियत संघ के विरुद्ध खड़ा किया था. इसी समय ओसामा बिन लादेन जो अल कायदा के संस्थापक के रूप में वैश्विक आतंकवाद का चेहरा बन चुका था अमेरिका के निशाने पर था और माना जाता था की वह अफगानिस्तान में शरण लिए हुए है और अफगानिस्तान को अपने इस पुराने विश्वस्त मुजाहिदीन की नजदीकियों की कीमत चुकानी पड़ी. इसी समय अमेरिका ने पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व को आतंकवाद के विरुद्ध अपने साथ आने का प्रस्ताव दिया जिसे पाकिस्तान ने एक बड़े बहुमत, जो तालिबान से सहानुभूति रखता था के विरुद्ध जाकर अमेरिका का हाथ थाम लिया. एक बार फिर 1980 का दशक लौट आया, पाकिस्तान को बड़ी मात्रा में सैन्य और असैन्य सहायता लुटाई जाने लगी. 2001 से 2009 के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक बार फिर अपनी वित्त पोषण प्रतिबद्धताओं को मजबूत किया, और अफगानिस्तान के साथ उसके विषम सीमावर्ती इलाकों में पाकिस्तान द्वारा सैन्य गतिविधियों के संचालन के लिए सहायता, प्रतिपूर्ति और सैन्य सहायता के बदले करीब 9 अरब डॉलर उपलब्ध कराये और 3.6 अरब डॉलर की आर्थिक और राजनयिक पहलों को वित्त पोषित किया.

2002 से 2009 के बीच कुल अमरीकी सहायता का 70 प्रतिशत सुरक्षा सम्बन्धी मामलों के लिए व्यय किया गया जिसका सीधा असर भारत जैसे उसके पडोसी देशो में आतंकवाद के प्रसार के लिए भी पाकिस्तान द्वारा प्रयुक्त किया गया. जैसा कि 1980 और 90 के दशक में हुआ था. सितंबर 2009 में कांग्रेस द्वारा केरी-लूगर-बर्मन एक्ट (केएलबी), जिसे 2009 के Enhanced Partnership with Pakistan Act of 2009 के रूप में भी जाना जाता है, द्वारा पांच साल के लिए एक नया, 7.5 बिलियन डॉलर का सहायता पैकेज पारित किया गया और अक्टूबर 2009 में राष्ट्रपति ओबामा द्वारा हस्ताक्षरित कर दिया गया हालांकि इसमें जिसमें इस धन को परमाणु प्रसार के लिए इस्तेमाल किए जाने, आतंकवादी समूहों का समर्थन करने, या पड़ोसी देशों में हमलों के लिए भुगतान करने के लिए स्पष्ट रूप से निषेध किया गया था .

सहायता किस मद में?

2002 से, अमेरिका ने सीएसएफ के तहत पाकिस्तान को 14.573 अरब डॉलर दिए हैं. सीएसएफ भुगतान पिछले 15 वर्षों के दौरान पाकिस्तान को कुल अमेरिकी भुगतान का 43.65% हिस्सा था. 2002 से दी जाने वाली अमेरिकी सहायता का एक बड़ा हिस्सा विदेशी सैन्य वित्त पोषण कार्यक्रम के तहत दिया गया है जो लगभग 3.8 अरब डॉलर था इसके अलावा पाकिस्तान काउंटर इंसरजेंसी फंड और काउंटर इंसरजेंसी कैपेबिलिटी फंड के तहत 2.35 अरब डॉलर का योगदान दिया गया . तीसरा बड़ा हिस्सा 911 मिलियन डॉलर था, जिसे अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय नारकोटिक्स नियंत्रण और कानून प्रवर्तन कार्यक्रम के तहत दिया था.



कटौती का दौर

तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो 2014 से, अमरीकी सहायता 1.6 अरब डॉलर प्रतिवर्ष हो गई जो 2002 और 2013 के बीच प्रति वर्ष औसत 2.3 अरब डॉलर थी. इसमें गठबंधन सहायता निधि (सीएसएफ) की प्रतिपूर्ति शामिल है. बराक ओबामा के समय से ही इसमें कटौतियां की जाती रही हैं परन्तु ट्रम्प के आने के बाद इस पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. पाकिस्तान की चीन से बढती नजदीकियां भी इसका एक प्रमुख कारण है. एक अमेरिकी थिंक टैंक के अनुसार 1951-2011 के दौरान पाकिस्तान को 67 अरब डॉलर की सहायता उपलब्ध कराइ गई जो कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बन गई . वर्तमान में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही है और ऐसे में उसे अभी जिस धन की दरकार है वह अंतरर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से प्राप्त करने की राह में अमेरिका एक बड़ा रोड़ा बना हुआ है, और अब जबकि मुद्रा कोष धन देने को तैयार हुआ है तो साथ ही साथ पाकिस्तान पर ढेरों कठोर शर्तों का पुलिंदा लाद दिया है. इमरान खान का अमेरिका के प्रति अब तक का रुख कुशल राजनेता की तरह नहीं रहा है. परन्तु दक्षिण और पश्चिम एशिया में स्थितियां तेजी से बदल रही हैं . पाकिस्तान के पडोसी ईरान और अमेरिका में तनाव चरम पर है जिसमे पाकिस्तान का घनिष्ठतम सहयोगी सऊदी अरब अमेरिका के साथ है. इन तमाम भू-राजनैतिक स्थितियों के चलते अंतरर्राष्ट्रीय संबंधों में नए समीकरण बन रहे हैं. अमेरिका के साथ संबंधों के विषय में पाकिस्तान को व्यावहारिक दृष्टिकोण से सोचना होगा साथ ही साथ पाकिस्तान और उसके नेताओं को अब ये समझ लेना चाहिए कि 'चार्ली विल्सन' का दौर बीत चुका है और मुफ्त के धन से पाकिस्तान की समृद्धि और शक्ति सम्पन्नता के सपने देखना निहायत ही मूर्खता पूर्ण सिद्ध होगा.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)

ये भी पढ़ें: क्या चीन के हित साधने के लिए प्रदूषण का केंद्र बन रहा है पाकिस्तान?
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...