Opinion: जो बीमारी दुनिया भर से मिट गई, वो पाकिस्तान में क्यों बरकरार है?

पिछले साल पाकिस्तान में पोलियो के सिर्फ तीन मामले सामने आए थे. इस साल 10 जुलाई तक इस मुल्क में पोलियो के 32 मामले आ चुके हैं.

Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: July 27, 2019, 1:46 PM IST
Opinion: जो बीमारी दुनिया भर से मिट गई, वो पाकिस्तान में क्यों बरकरार है?
पिछले साल पाकिस्तान में पोलियो के सिर्फ तीन मामले सामने आए थे. इस साल 10 जुलाई तक इस मुल्क में पोलियो के 32 मामले आ चुके हैं.
Santosh K Verma
Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: July 27, 2019, 1:46 PM IST
बीसवी सदी चिकित्सा शास्त्र की प्रगति के दृष्टिकोण से अत्यधिक सफल कही जा सकती है. इस सदी में विभीषिका और महामारी माने जाने वाले अनेक रोगों के लिए निदान और उपचार खोजे गए. इनमें से कई तो विश्व के अधिकांश भागों से अब पुराना भयावह रूप खो चुकी हैं. जिनमें एक पोलियो भी है.

1988 में आरम्भ किए गए पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम को 31 वर्ष बीत चुके हैं. विश्व भर में लगभग 16 अरब डॉलर खर्च करने बाद हालांकि पोलियो पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया गया है, परन्तु कुछ भागों में यह अभी भी अस्तित्वमान है. यह उन कुछ कठोर चुनौतियों में से एक है, जिनका सामना आज पाकिस्तान कर रहा है. आज विश्व में केवल तीन देश ही ऐसे बचे हैं जहां पोलियो का अस्तित्व विद्यमान है, वे हैं- भारत के दो पड़ोसी देश पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान, साथ में अफ्रीकी महाद्वीप का देश नाइजीरिया.

हालांकि, 1994 में पाकिस्तान के पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम के प्रारंभ के बाद, 1990 के दशक की शुरुआत की तुलना में पाकिस्तान में पोलियो के मामलों में भारी गिरावट आई है. 1988 में वैश्विक पोलियो उन्मूलन अभियान की शुरुआत के समय पाकिस्तान में दर्ज 350,000 मामलों की तुलना में 2015 में 54 और 2016 में 19 मामले प्रकाश में आए, जिनकी संख्या 2017 में आठ और 2018 में 12 रह गई.

1970 के दशक में छह रोकथाम योग्य बीमारियों से मुकाबला करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा टीकाकरण का विस्तारित कार्यक्रम (ईपीआई) शुरू किया गया था. लगभग उसी समय 1974 में पाकिस्तान में पोलियो टीकाकरण अभियान शुरू हुआ. परन्तु पोलियो उन्मूलन के प्रयासों को आधिकारिक तौर पर 1994 में शुरू किया गया था. लेकिन पिछले दशक में टीकाकरण के 100 से अधिक दौर होने के बावजूद यह संक्रमण बना हुआ है.



इस साल पाकिस्तान में तेजी से बढ़े हैं पोलियो के मामले

2014 में पाकिस्तान में विश्व में पोलियो के सर्वाधिक मामले सामने आए थे. अक्टूबर 2015 तक इसने इस रिकॉर्ड को बनाए रखा. अब एक बार फिर पाकिस्तान में पोलियो ने अपनी प्रबल उपस्थिति दर्ज कराई है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अभी 10 जुलाई तक की स्थिति में इस वर्ष पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में पोलियो पक्षाघात के कुल 42 मामले सामने आए हैं, इनमें से पाकिस्तान में इस तरह के 32 मामले देखे गए, जिनकी संख्या पिछले वर्ष इन्हीं दिनों तक मात्र तीन तक सीमित थी. उल्लेखनीय है कि इन मामलों का सकेन्द्रण पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम सीमावर्ती जनजातीय क्षेत्रों में अधिक है. उल्लेखनीय है कि 2018 में पाकिस्तान में पोलियो के केवल 12 मामले प्रकाश में आए थे, वहीं 2017 में इनकी संख्या महज आठ ही थी.
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पाकिस्तान की नई सरकार ने इस साल की शुरुआत में, घोषणा की थी कि वह पोलियो उन्मूलन अभियानों को और भी अधिक तेज और और प्रभावी बनाने के लिए जून में अपने राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान को और अधिक प्रबलता से संचालित करेगी, साथ ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के कार्यालय ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि इस बार पोलियो टीकाकरण टीमों द्वारा अधिक मित्रवत दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश की जाएगी.

परिणामस्वरूप इस बार पोलियो टीकाकरण के आंकड़े उत्साहजनक रहे भी हैं. ग्लोबल पोलियो उन्मूलन पहल (GPEI) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में सिर्फ मई 2019 के महीने में 10.7 लाख से अधिक पाकिस्तानी बच्चों को टीका लगाया गया था. अभियान में मदद के लिए 260,000 फ्रंटलाइन कार्यकर्ता तैनात किए गए थे, जिसमें 2,100 सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल थे. टीकाकरण के प्रयासों को बच्चों और उनके परिवारों द्वारा 95 प्रतिशत स्वीकृति दर के साथ पूरा किया गया. 400 से अधिक "स्थायी पारगमन बिंदु" - जिला और राष्ट्रीय सीमाओं, बस स्टॉप, सड़कों और रेलवे स्टेशनों पर टीकाकरण प्रदान करने हेतु बनाए गए.

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टीकाकरण के विरुद्ध समानांतर अभियान!

जहां एक ओर महत्वपूर्ण प्रयास किए गए, वहीं दूसरी ओर इसके विरोध में अभियान ने भी जोर पकड़ा. सोशल मीडिया पर झूठी अफवाहें तक फैलाई गईं कि वैक्सीन से बेहोशी के दौरे शुरू हो गए हैं. यहां तक कि इसने दर्जनों बच्चों की जान ले ली है. कई रूढ़िवादी और अति-वादी धार्मिक समूहों ने जनता से अपने शिशुओं को टीकाकरण नहीं करने के लिए कहा और पोलियो कार्यक्रम के बारे में विभिन्न मीडिया साधनों के द्वारा गलत धारणाएं साझा कीं.

यहां तक कि हिंसा को भी बढ़ावा दिया, जिसमे पोलियो अभियान चलाने वाले पोलियो कार्यकर्ताओं के साथ-साथ पुलिस कर्मी भी मारे गए. इसका प्रभाव यह हुआ कि कई परिवारों ने अपने बच्चों को टीका लगवाने से इनकार ही कर दिया. पाकिस्तान में यह ट्रेंड बढ़ता जा रहा है. इस वजह से टीकाकरण की गिरती दरें चिंताजनक स्थिति तक पहुंचती जा रही हैं. इस साल पाकिस्तान में लगभग 4 करोड़ बच्चों का टीकाकरण किया गया पर इस दशक के शुरुआत में जहां लगभग 40,000 मामलों में पोलियो टीकाकरण से इनकार किया गया था, वहीं दूसरी ओर यह संख्या अब 120,000 तक पहुंच गई है, जो एक चिंताजनक तथ्य है.



पाकिस्तान में टीकाकरण के अवरोधक

पाकिस्तान में पोलियो उन्मूलन के लिए टीकाकरण की दर कम रही है. कई कारक इसके अवरोध बने हुए हैं. इनमें सर्वाधिक प्रमुख कारण कट्टरपंथी इस्लामिक अवधारणाएं हैं, जो टीकाकरण को इस्लाम विरोधी बताने तक से भी नहीं चूकती. तहरीक ए तालिबान द्वारा लगातार यह अफवाहें फैलाई गईं कि इन दवाओं में सूअर की चर्बी और अल्कोहल मिलाया गया है, जिनका प्रयोग इस्लाम में निषिद्ध है.

पाकिस्तान के FATA, खैबर पख्तुनख्वा और बलूचिस्तान के दुर्गम और खतरनाक इलाकों में पोलियो टीकाकरण के लिए दलों को पहुंचाना और कार्य सम्पादित करना अत्यधिक दुष्कर कार्य है. 2011 में ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए चलाए गए अभियान “ऑपरेशन नेपच्यून स्पीयर” की भूमिका के रूप में एक टीकाकरण अभियान चलाकर ओसामा बिन लादेन का डीएनए सैंपल लेकर उसके एबटाबाद स्थिति घर में उसकी उपस्थिति की पुष्टि करने के प्रयास ने तमाम आतंकी संगठनों को इस प्रकार के अभियानों का विरोध करने का एक मौका दे दिया. अनेक बार इन क्षेत्रों में पोलियो टीकाकरण दलों पर हमले और कार्यकर्ताओं की हत्याओं के समाचार सुर्ख़ियों में बने रहे हैं.

पाकिस्तान की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली सार्वजनिक क्षेत्र के कमजोर वित्त पोषण, एक गैर-विनियमित निजी क्षेत्र और सरकारी पारदर्शिता की कमी से ग्रस्त रही है. इस वजह से यह सभी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को सीमित करती है. हालांकि पोलियो उन्मूलन पहल अच्छी तरह से वित्त पोषित है, लेकिन यह कमजोर सार्वजनिक आधारभूत संरचना के माध्यम से संचालित की जाती है. ऐसा तमाम अवसरों पर हुआ है जब पाकिस्तान में पोलियो उन्मूलन समिति के सदस्यों ने इस अभियान का समर्थन करने वाले संगठनों के उत्तरदायित्व के बारे में चिंताओं और संदेह को सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया है. पाकिस्तानी बच्चों में व्यापक कुपोषण, रोगों से लड़ने की कमजोर क्षमता पोलियो टीकाकरण की प्रभावकारिता को कम करने के कारक बने हुए है.

राजनीतिक परिवर्तन और पोलियो

यह एक विचित्र परन्तु महत्वपूर्ण तथ्य है कि पाकिस्तान में राजनैतिक परिवर्तन का पोलियो के मामलों में वृद्धि से सीधा सम्बन्ध रहा है. उल्लेखनीय है कि जिन वर्षों में पाकिस्तान में आम चुनाव आयोजित किए गए, उसके बाद पोलियो के मामलों में वृद्धि देखी गई. उदहारण के लिए पाकिस्तान में 2013 के आम चुनावों के बाद, 2014 में पोलियो के मामलों की संख्या बढ़कर 306 हो गई, जो 2015 में 54, 2016 में 20 और 2017 में केवल आठ तक सीमित रह गई. वर्तमान वर्ष भी इसी प्रवृत्ति को दोहराता हुआ प्रतीत होता है. 2018 भी चुनावी वर्ष रहा जहां पोलियो के मामले फिर से 12 तक बढ़ गए. और अब 2019 के पहले छह महीनों के भीतर, देश भर में पोलियो के 32 मामले दर्ज किए जा चुके हैं.

इसका प्रमुख कारण आम चुनावों से पहले की तैयारियों में भी निहित है. पाकिस्तान में चुनाव कराने और नई सरकार को सत्ता हस्तांतरित करने के लिए एक कार्यवाहक सरकार बनाई जाती है, जिस प्रक्रिया में चार महीने से अधिक का समय लगता है. यह समय कई बार गहन अराजकता का होता है, जहां नौकरशाहों और स्वास्थ्य अधिकारियों को अक्सर नए दायित्व के लिए स्थानांतरित कर दिया जाता है. इसका खामियाजा पोलियो कार्यक्रम उन्मूलन कार्यक्रम को भुगतना पड़ता है.



अंतरराष्ट्रीय प्रसार के खतरे और भारत

20 वीं सदी के मध्य तक पोलियो एक वैश्विक समस्या बनी हुई थी, जिसे इस सदी के अंत तक आते आते काबू कर लिया गया. वायरस भौगोलिक और राजनैतिक सीमाओं से बंधे हुए नहीं हैं. किसी भी स्थिति में इसके लिए देश को अछूता रख पाना लगभग असंभव ही है. सऊदी अरब जैसा देश भी पाकिस्तान के पोलियो ग्रस्त होने से चिंतित है, क्योंकि प्रतिवर्ष हज के दौरान लाखों पाकिस्तानी सऊदी अरब में प्रवेश करते हैं. ऐसी स्थिति में वह न केवल पाकिस्तान को इस हेतु आर्थिक सहायता ही उपलब्ध कराता है, बल्कि राजनीतिक दबाव का प्रयोग भी करता है. पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य विनियमों (आईएचआर) द्वारा ऐसे राज्य के रूप में इंगित किया गया है, जो डब्ल्यूपीवी 1, सीवीडीपीवी 1 या सीवीडीपीवी 3 (WPV1, CVDPV1 or CVDPV3) से संक्रमित है और जिसके साथ इन संक्रमणों के अंतरराष्ट्रीय प्रसार के संभावित जोखिम भी हैं.

यद्यपि भारत 2014 में पूर्णत: पोलियो मुक्त घोषित किया जा चुका है, परन्तु पाकिस्तान में पोलियो का अस्तित्व भारत के लिए भी चिंता का विषय बना हुआ है. पाकिस्तान किस तरह से पड़ोसी देशों में पोलियो प्रसार के लिए ख़तरा बना हुआ है इसे ईरान के उदाहरण से समझा जा सकता है. ईरान में पोलियो का आखिरी मामला 1997 में देखा गया था. तब से यह देश पोलियो के मामलों से मुक्त हो चुका था परन्तु अब वहां वाइल्ड पोलियो वायरस का प्रसार देखा गया है जो पाकिस्तान के कराची से ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थानांतरित हुआ है.

पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी कराची अब वायरस के प्रसार का प्रमुख केंद्र बन चुकी है. जब पाकिस्तान के साथ स्थितियां सामान्य करने की बात आती है तो सीमाओं पर आवागमन सुगम बनाना भी इसका एक अंग होता है, ऐसी स्थिति में भारत को भी कुछ उपाय करने आवश्यक हैं, जिनसे इसके फिर से भारत में प्रवेश के अवसर उपलब्ध न हो सकें.

आज पाकिस्तान में निरक्षरता, धार्मिक रूढ़िवादिता, संघर्ष और गंभीर असुरक्षा पोलियो के अस्तित्व का प्रमुख कारण बने हुए हैं. पाकिस्तान की सरकार और सम्बद्ध एजेंसियों को यह समझने की आवश्यकता है कि बिना इन रुकावटों को दूर किए पोलियो उन्मूलन की राह दुश्वार ही रहेगी. ऐसी स्थिति में पाकिस्तान की नई सरकार को असफलताओं से सीख लेने की जरूरत है कि वह यदि वास्तव में “नया पाकिस्तान” बनाना चाहती है तो उसे अपनी प्राथमिकताओं में परिवर्तन लाने ही पड़ेंगे. अन्यथा अशिक्षित कुपोषित और रोगग्रस्त आबादी ही पाकिस्तान की पहचान बनी रहेगी और विकास एक दिवास्वप्न बन कर रह जाएगा.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं )

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First published: July 27, 2019, 1:46 PM IST
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