Opinion: पाकिस्तान की विघटनकारी नीतियों का परिणाम है पश्तून तहफ्फुज़ मूवमेंट

पश्तून तहफ्फुज़ मूवमेंट (पीटीएम) की उत्पत्ति मेहसूद तहफ्फुज़ मूवमेंट (एमटीएम) में निहित है, जो मई 2014 में गोमल विश्वविद्यालय के महसूद जनजाति के आठ छात्रों द्वारा शुरू किया गया था.

Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: August 6, 2019, 1:28 PM IST
Opinion: पाकिस्तान की विघटनकारी नीतियों का परिणाम है पश्तून तहफ्फुज़ मूवमेंट
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान.
Santosh K Verma
Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: August 6, 2019, 1:28 PM IST
पाकिस्तान का विचार एक 'रोमांटिक कल्पना' की तरह था, जिसमें माना गया कि यह इस्लाम में विश्वास रखने वालों का होमलैंड होगा. परन्तु 1947 के कुछ ही दिनों बाद यह रोमांटिक आशावाद हवा होने लगा और कल्पना ने वास्तविकता की कठोर जमीन पर सर पटक कर दम तोड़ दिया. 1971 में भाषाई और जातीय एकता के आधार पर बांग्लादेश की स्थापना, इसके संस्थापकों के मुंह पर करारा तमाचा था जो पाकिस्तान के अन्दर किसी भी भाषाई और जातीय पहचान को बलपूर्वक नकारते रहे. केवल इसलिए कि यह एक 'बड़े वर्ग' के अहम् को ठेस पहुंचाती थी.

पाकिस्तान में अब यह भावनाएं फिर से प्रबल हैं और इस बार इनके वाहक सिन्धी और बलूचों के बाद इस देश के उत्तर-पश्चिम में सकेंद्रित पश्तून हैं, जिन्होंने अल्प समय में अपने आन्दोलन को देशव्यापी बना दिया है. आज पाकिस्तान में पश्तून आन्दोलन अपने चरम पर है. इसकी मांगें पूरी तरह से तर्कसंगत और तौर तरीके शांतिपूर्ण और अहिंसात्मक हैं.

एक शक्तिशाली नागरिक और मानवाधिकार आंदोलन ने भारी भीड़ खींचकर पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य स्थापना को चिंतातुर कर दिया है . असैन्य आबादी पर बड़े पैमाने पर सशस्त्र सैन्य कार्रवाई जो यहां व्यापक रूप से मौतें लेकर आई, वंचना, अपहरण और लोगों का बड़े स्तर पर विस्थापन ऐसी घटनाएं रही हैं, जिनसे जुड़ी स्थानीय पश्तून आबादी की चिंताएं स्वाभाविक रूप से उस आंदोलन के रूप में फलीभूत हुई हैं, जिन्हें आज PTM में साकार होता देखते हैं. आज पाकिस्तान में एक नारा अत्यधिक प्रचलन में है – 'ये जो दहशतगर्दी है, इसके पीछे वर्दी है' , सेना के प्रति एक आम पश्तून की भावना की अभिव्यक्ति है.

पश्तून तहफ्फुज़ मूवमेंट क्या है?

पश्तून तहफ्फुज़ मूवमेंट (पीटीएम) की उत्पत्ति मेहसूद तहफ्फुज़ मूवमेंट (एमटीएम) में निहित है, जो मई 2014 में गोमल विश्वविद्यालय के महसूद जनजाति के आठ छात्रों द्वारा शुरू किया गया था. सैन्य अभियानों से प्रभावित महसूद लोगों के अधिकारों के लिए अभियान चला रहे थे. अमेरिका के आतंक के विरुद्ध युद्ध में पाकिस्तानी सहभागिता के चलते उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में नागरिक जीवन का को भारी मात्रा में क्षति पहुंची थी. सेना द्वारा बलात अपहरण, नागरिकों पर अत्याचार और इस क्षेत्र से बारूदी सुरंगों को हटाना इसकी प्रारंभिक मांगें थीं.

imran khan
पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान के सामने काफी ऐसी चुनौतियां हैं, जो उन्हें विरासत में मिली हैं.


पिछले साल 13 जनवरी 2018 को पुलिस मुठभेड़ में चार कथित तालिबान आतंकवादियों के साथ एक उभरते मॉडल नकीबुल्लाह महसूद की हत्या ने पश्तून समुदाय के आक्रोश को चरम पर पहुंचा दिया. इस घटना के विरोध में इस आन्दोलन के नेता मंज़ूर पश्तीन ने डेरा इस्माइल खान से MTM के सदस्यों के एक छोटे से समूह के साथ पश्तून लॉन्ग मार्च की घोषणा की जिसे FATA और खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के पश्तून-बहुसंख्यक क्षेत्रों से होकर इस्लामाबाद पहुंचना था. मीडिया कवरेज की कमी के बावजूद, मार्च बढ़ता गया और पीड़ित परिवारों के सदस्य हजारों की संख्या में इसमें शामिल हुए.
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मूलत: पश्तून तहफ्फुज़ मूवमेंट (PTM) पाकिस्तान में एक जमीनी स्तर की नागरिक पहल के रूप में शुरू हुआ आंदोलन है. इसका मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान में दूसरे सबसे बड़े जातीय समूह पश्तून समुदाय की दुर्दशा को उजागर करना है, जिसका कुल आबादी में लगभग सोलह प्रतिशत भाग है.


पश्तून आन्दोलन का विकास
बीसवीं सदी के आखिरी वर्षों में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान शासन की स्थापना और अल कायदा के बढ़ते प्रभाव के बाद 2001 में, जब अमेरिका में 9/11 की आतंकवादी घटना हुई, जनरल परवेज मुशर्रफ के सैन्य नेतृत्व में पाकिस्तान, अमेरिका के नेतृत्व वाले ऑपरेशन एन्डयोरिंग फ्रीडम का अनुगामी बन गया. पाकिस्तान के कबायली इलाके अल-कायदा के उग्रवादियों के प्रभाव में आ गए थे जो इस युद्ध का मुख्य रणक्षेत्र बन गया, जिससे जन-धन की बड़ी क्षति झेलनी पड़ी.

2009 में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की अगुवाई वाली सरकार ने स्वात जिले में एक शांति समझौते को मंजूरी दी, जो खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के मलकंद डिवीजन में शरिया कानून को मान्यता देता था. यह एक बेहद विवादास्पद कानून था, जिसने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को इस इलाके में अपना शासन स्थापित करने का अवसर दे दिया. जब यह समझौता भंग हो गया तो आतंकवादियों के विरुद्ध इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किए गए, जिनसे बड़ी संख्या में न केवल पश्तूनों का विस्थापन हुआ, बल्कि सेना द्वारा एक नए तरह का नेरेटिव स्थापित किया जाने लगा. इसके तहत पश्तूनों को आतंकवादियों का पर्याय बनाने के प्रयास किए जाने लगे. सेना के मीडिया विंग द्वारा प्रायोजित फिल्मों और टेलीफिल्मों द्वारा पश्तूनों के नकारात्मक चित्रण को लगातार प्रचारित किया जाने लगा.

2014 में, पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल पर एक भीषण हमले के बाद, जिसमें टीटीपी हमलावरों द्वारा 144 छात्रों और शिक्षकों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, इस क्षेत्र पर पाकिस्तानी सेना के आतंक का दौर आरम्भ हुआ. तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल राहिल शरीफ ने वजीरिस्तान में एक सैन्य अभियान शुरू किया, जिसकी चपेट में इस क्षेत्र की समस्त पश्तून जनजातियां आ गईं. इस ऑपरेशन ने 'अच्छे तालिबान' बनाम 'बुरे तालिबान' की नीति के अंत को चिह्नित किया. इसके साथ शुरू हुआ अपहरण, हिरासत में हत्याओं और यातनाओं का भयानक दौर जिसमें लगभग दस लाख लोग विस्थापित हुए. इनमें से कुछ आईडीपी शिविरों में बस गए जबकि कुछ लोग कराची और अन्य शहरों में चले गए.


2015 में जब इनका प्रत्यावर्तन शुरू हुआ और विस्थापित परिवारों ने वापस अपने घरों की ओर लौटना शुरू किया, तो उन्हें उजड़े हुए गांवों और तबाह घरों के सिवा कुछ न मिला. सेना की अमानवीयता इस हद तक रही कि इस क्षेत्र से बारूदी सुरंगों को हटाना भी जरूरी नहीं समझा फलस्वरूप बड़ी संख्या में लोग मारे गए और स्थायी रूप से विकलांग हो गए. आतंकवाद के विरुद्ध अभियान के नाम पर नागरिकों की हत्या जारी रही. यही अत्याचार पश्तून तहफ्फुज़ मूवमेंट की पृष्ठभूमि की रचना करता है.

मीडिया और सोशल मीडिया
पाकिस्तान की सेना ने इस आन्दोलन को अलग-थलग करने के लिए गैर कानूनी तरीकों से कवरेज रोकने के प्रयास किए हैं. पाकिस्तान के प्रेस कानून और पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक अपराध अधिनियम 2016 (PECA) जैसे कानूनों के दुरुपयोग द्वारा सरकार और सेना ने इस बात का भरपूर इंतजाम करने की कोशिश की कि लोगों तक इस आन्दोलन से सम्बन्धित कोई भी समाचार या सूचना न पहुंच सके.

Imran khan
इमराख खान के पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने के बाद भी पिछली सरकारों जैसा हाल है. इमरान खान भी पाकिस्तान के लिए कोई बड़ा और साहसिक कदम नहीं उठा सके हैं.


रेडियो मशाल को पीटीएम की गतिविधियों को कवर करने के लिए प्रतिबंधित और अवरुद्ध कर दिया गया. यह एक पश्तो भाषा का रेडियो ब्रॉडकास्टर है, जिसे अमेरिका द्वारा वित्त पोषित किया गया था. वॉयस ऑफ अमेरिका की उर्दू भाषा की वेबसाइट, दीवा को अक्टूबर 2018 में छिटपुट रूप से अवरुद्ध कर दिया गया था और फिर दिसंबर 2018 में पूर्ण रूप से बंद कर दिया. यह मुख्य रूप से अफगानिस्तान के पास के सीमा क्षेत्रों में पश्तो-बोलने वाले दर्शकों के लिए बनाई गई थी. इसके अलावा पीटीएम की स्थानीय रैलियों को कवर करने वाले पत्रकारों के खिलाफ, पुलिस में अनेक धाराओं में मामले दर्ज किए गए.

देश का उर्दू मीडिया जहां इस आन्दोलन के खिलाफ लगातार विषवमन करने में लगा हुआ है. वहीं अंतरराष्ट्रीय मीडिया में कुछ अनुकूल कवरेज के साथ पाकिस्तान के अंग्रेजी भाषा के समाचार पत्रों और स्वतंत्र पत्रिकाओं से थोड़ा बहुत समर्थन प्राप्त होता है.


ऐसी स्थिति में आंदोलन के लिए सोशल मीडिया का उपयोग और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि यह रेडियो, टेलीविजन चैनलों और ऐसे ही मुख्यधारा के अन्य साधनों का एक विकल्प प्रदान करता है. इस आन्दोलन के प्रचार प्रसार का अधिकांश भाग, बैठक, रैली या गतिविधि सोशल मीडिया के द्वारा ही कवर और प्रसारित होती है. इस आन्दोलन के एक प्रमुख सूत्रधार और पाकिस्तान की नेशनल असेम्बली के सदस्य अली वजीर का स्पष्ट मानना है कि इस आन्दोलन का आधार सोशल मीडिया पर टिका हुआ है. अगर सोशल मीडिया नहीं होती तो ये आन्दोलन भी नहीं होता. यह इस आन्दोलन में सोशल मीडिया के महत्व का दृष्टान्त है. सोशल मीडिया PTM के संदेश को फैलाने के लिए एक राजनीतिक उपकरण है. इस प्रक्रिया में राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एक पूरी नई पीढ़ी को प्रशिक्षित किया है.

आन्दोलन के प्रभाव
पीटीएम के कई महत्वपूर्ण प्रभाव आज दिखाई देने लगे हैं. मूवमेंट का सबसे बड़ा प्रभाव इस बात से परिलक्षित होता है कि इसने पाकिस्तान की सिविल सोसाइटी के बीच राजनीति और नागरिक अधिकारों में सेना की भूमिका और नॉन स्टेट एक्टर्स का समर्थन करने की राज्य-नीति को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है. दबे क़दमों कई प्रमुख राजनैतिक दल अप्रत्यक्ष रूप से ही सही इस बात का समर्थन करते नज़र आ रहे हैं. पूर्व प्रधान मंत्री नवाज शरीफ, जिन्हें पद से अयोग्य घोषित किया गया और जेल में डाल दिया गया था, नागरिक स्वायत्तता के लिए एक अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं. कुछ ऐसा ही बिलावल भुट्टो के साथ भी देखा जा रहा है.

अभी हाल ही में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन खैबर-पख्तूनख्वा (केपी) और संघीय रूप से प्रशासित जनजातीय क्षेत्रों (फाटा) के प्रांतों के विलय के रूप में देखने में आया है, जिसे इस आंदोलन के लिए एक बड़ी सफलता माना जा सकता है. इसके साथ ही साथ इस क्षेत्र में अंग्रेजों के समय से लागू कुख्यात फ्रंटियर क्राइम रेगुलेशन (एफसीआर) को हटाने में इस आन्दोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसने लम्बे समय से इस क्षेत्र को अराजकता के सागर में डुबाए रखा.

'दा संग आज़ादी दा' एक पश्तून कविता का अंश है, जिसका अर्थ होता है 'यह किस तरह की आजादी है?', जो आज पूरे पाकिस्तान में उत्पीड़ित लोगों और पश्तून आन्दोलन के समर्थकों के परिवारों के लिए एक आवाज़ बन गया है. पश्तून आन्दोलन जिस गति से बढ़ रहा है, वह सरकार और सेना के लिए चिंता का विषय बन चुका है. इससे निपटने के लिए वह उत्पीड़न का सहारा ले रहा है, जिसके तहत इन कार्यकर्ताओं पर झूठे मुकदमे लादे जा रहे हैं और देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर हमला हो रहा है. मोहसिन डावर और अली वज़ीर जैसे असेम्बली के सदस्यों को गिरफ्तार किया जा रहा है और उनके नाम एक्ज़िट कंट्रोल लिस्ट (ईसीएल) में डाल दिए गए हैं. गुलालाई इस्माइल जिनके नाम देशद्रोह के मुकदमे दर्ज करा दिए गए हैं और वे 'गायब' हैं.


जैसा पाकिस्तान की आदत है, वह अपनी हर समस्या, जो प्राय: उनकी मूर्खतापूर्ण नीतियों का दुष्परिणाम होती हैं, के लिए भारत को ही दोषी ठहराना शुरू कर देते हैं. पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता डीजी आईएसपीआर, आसिफ गफूर कई मौकों पर बयान दे चुके हैं कि पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट को भारतीय और अफगान खुफिया सेवाओं से धन प्राप्त होता है. पाकिस्तान बार-बार भारत और अफगानिस्तान को अपने राष्ट्र के भीतर जातीय-राष्ट्रीय भावनाओं को भड़काने के लिए दोषी ठहराता रहता है.

एक राष्ट्र के रूप में इसने हमेशा इस्लाम और उर्दू को राज्य के विभिन्न समूहों के बीच एक विभाजक के रूप में पेश किया है और अपने ही लोगों की जातीय और भाषाई विविधता की अनदेखी की है. राजनीतिक अधिकारों की मांग के लिए जातीय-भाषाई पहचान का कोई दावा, चाहे वह बलूच हो, बंगाली या पश्तून, पाकिस्तान में सदैव आपत्तिजनक और राज्य के विचार के खिलाफ माना गया है. पाकिस्तान के पश्तून बहुल इलाकों की हालत बांग्लाभाषी पूर्व पाकिस्तान से समानता दिखाती है. यह संकेत पूर्व पाकिस्तान ने भी दिए थे परन्तु शक्ति के बल से दमन में विश्वास रखने वाले तत्कालीन शासकों ने जो गलतियां की थीं, वही आज भी दोहराई जा रही हैं. ऐसे में क्या इतिहास स्वयं को फिर से दोहराएगा? यह इस समय का प्रश्न है.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं)
First published: August 6, 2019, 1:20 PM IST
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