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Panjshir Attack: तालिबान के साथ मिलकर लड़ रहे हैं पाकिस्तानी, पंजशीर में मिले आईडी कार्ड दे रहे गवाही

Panjshir Attack: तालिबान के साथ मिलकर लड़ रहे हैं पाकिस्तानी, पंजशीर में मिले आईडी कार्ड दे रहे गवाही

पंजशीर में हुई तालिबान के लड़ाकों की मौत के तार इस्लामाबाद से जुड़ते हैं. (प्रतीकात्मक- Reuters)

पंजशीर में हुई तालिबान के लड़ाकों की मौत के तार इस्लामाबाद से जुड़ते हैं. (प्रतीकात्मक- Reuters)

Taliban-Pakistan Relations: पाकिस्तान भले ही तालिबान को समर्थन देने की बात से इनकार करे, लेकिन पंजशीर में हुई तालिबान के लड़ाकों की मौत के तार इस्लामाबाद से जुड़ते हैं.

  • News18Hindi
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    इस्लामाबाद. तालिबान के काबुल (Kabul) पर नियंत्रण के बाद दुनिया की नजरें अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच संबंधों पर टिकी हुई हैं. दोनों देशों के बीच धार्मिक, सांस्कृतिक और जातीय जुड़ाव भी है. यहां तक की अफगान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने दोनों देशों को ‘कभी अलग न होने वाले दो भाई’ भी बताया था. हालांकि, तालिबान के नियंत्रण के बाद अफगान-पाक संबंधों में नया मोड़ आया है. कुछ रिपोर्ट्स में यह कहा जा रहा था कि पाकिस्तान के समर्थन के बगैर तालिबान शायद काबुल तक नहीं  पहुंच पाता. साथ ही खबरें ये भी हैं कि पाकिस्तान की सेना ने पंजशीर (Panjshir) पर हमले में भी तालिबान की मदद की है. अब एक नजर दोनों राष्ट्रों के रिश्तों पर-

    पाकिस्तान का तालिबान को समर्थन
    कई जानकारों ने कहा है कि पाकिस्तान की ISI अफगानिस्तान में तालिबान का समर्थन कर रही है. 1980 में सोवियत के खिलाफ मुजाहिद्दीन की शुरुआत से ही पाकिस्तान, अफगान मुजाहिद्दीन के समर्थन में अमेरिका के साथ खड़ा रहा. सोवियत बलों के खिलाफ हुई जीत के बाद तालिबान अफगानिस्तान में सबसे ताकत सैन्य समूह के रूप में उभरा और थोड़े समय के लिए मुल्क पर शासन भी किया. 9/11 हमले के बाद जब अमेरिका ने तालिबान को निशाना बनया, तो पाकिस्तान ही विद्रोही समूह के लड़ाकों के लिए पनाहगाह बना था. पुरानी अफगान सरकार ने आरोप लगाया है कि तालिबान को पाकिस्तान से आर्थिक और सैन्य मदद मिलती थी.

    एक अहम बात यह भी
    जिहादी आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान को मजबूत सहयोगी के तौर पर नहीं देखता. भारत और अमेरिका समेत कई देश लंबे समय से पाकिस्तान पर तालिबान और आतंकी संगठनों को मदद पहुंचाने के आरोप लगा रहे हैं, जबकि कुछ इस बात से इनकार करते हैं. दो दशकों से तालिबान का समर्थन करने के चलते पाकिस्तान उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जिन्होंने औपचारिक रूप से उनकी सरकार को मान्यता दी है.

    15 अगस्त को काबुल पर कब्जा करने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था कि समूह ‘गुलामी की बेड़ियों को तोड़ रहा है.’ साथ ही इस्लामाबाद भारत के खिलाफ अफगानिस्तान को अपने रणनीतिक सहयोगी के तौर पर भी देखता है. यही कारण है कि वह काबुल में नई सरकार को अपनाने के लिए तैयार हैं.

    तालिबान के साथ लड़े पाकिस्तान के सैनिक?
    भले ही पाकिस्तान तालिबान को समर्थन देने की बात से इनकार करे, लेकिन पंजशीर में हुई तालिबान के लड़ाकों की मौत के तार इस्लामाबाद से जुड़ते हैं. टाइम्स नाउ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पंजशीर घाटी पर कब्जा करने के लिए पाकिस्तान के सैनिक भी तालिबान के साथ मिलकर लड़ रहे थे. पंजशीर की तरफ से हुई जवाबी हमले में मारे गए पाकिस्तानी सैनिक के पास से एक आईडी कार्ड बरामद हुआ है, जो सहयोग का सबूत देता है. कथित रूप से वह आईडी कार्ड पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद वसीम के नाम का था. इससे एक दिन पहले ही पेंटागन ने दावा किया था कि उनके पास इस बात को सत्यापित करने के कोई सबूत नहीं है कि पाकिस्तानी तालिबान के साथ लड़ रहे थे.


    पाकिस्तान को भी है तालिबान का डर?

    अफगानिस्तान में तालिबान का आना पाकिस्तान के लिए पूरी तरह से अच्छी खबर नहीं है. तहरीक-ए-तालिबान के चलते पाकिस्तान में कुछ गुटों ने सरकार का विरोध किया है. पाकिस्तान सरकार के कुछ लोगों का मानना है कि तालिबान के बढ़ने और कोई भी गलत कदम टीटीपी को मजबूत कर सकता है. द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टीटीवी पाकिस्तान के खिलाफ भी खतरनाक साबित हुई है, क्योंकि इसके मुख्य उद्देश्यों में ‘शरिया कानून लागू करना’, अफगानिस्तान में अमेरिका और NATO बलों से लड़ना और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ जिहाद करना शामिल है.

    पश्चिम के साथ पाकिस्तान के खराब होते रिश्ते
    बीते कुछ सालों में पाकिस्तान के संबंध खासतौर से अमेरिका समेत पश्चिमी देशों के साथ खराब हुए हैं. राष्ट्रपति जो बाइडेन ने शीर्ष पद संभालने के बाद पाक पीएम खान से फोन पर बात करने से भी इनकार कर दिया था. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के पूर्व सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल एचआर मैकमास्टर ने कहा था कि अगर पाकिस्तान ने जिहादी समूहों को समर्थन देना बंद नहीं किया, तो उसे ‘परायाह राज्य’ माना जाना चाहिए. परायाह का मतलब उस देश से होता है, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अलग-थलग देखा जाता है.

    कथित रूप से उन्होंने कहा था, ‘हमें दिखावा करना बंद करना होगा कि पाकिस्तान एक साझेदार है.’ उन्होंने कहा था, ‘पाकिस्तान इन ताकतों को रखने, ट्रेनिंग देने और जिहादी आतंकवादियों को अपनी विदेश नीति का हिस्सा बताकर इस्तेमाल करना जारी रखकर हमारे दुश्मन राज्य की तरफ बर्ताव कर रहा है.’

    Tags: Afghanistan, Kabul, Pakistan, Panjshir, Taliban

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