नस्लवाद, जेंडर, क्लास और कोविड, लगातार हिस्सों में बंटता जा रहा है अमेरिका

(प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर-AP)
(प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर-AP)

विशेषज्ञों का मानना है कि आज के समय में राजनितिक और सामाजिक तौर पर अमेरिका जिस तरह से विभाजित हो रहा है ऐसा इसके इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। एक ओर डोनाल्ड ट्रंप के समर्थक हैं, तो दूसरी और उनके विरोधी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 6, 2020, 3:05 PM IST
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वॉशिंगटन. अमेरिका (America )में राष्ट्रपति चुनाव (President Election) संपन्न हो चुके हैं और अब परिणामों का इंतजार है. फिलहाल डेमोक्रेटिक पार्टी (Democratic) के राष्ट्रपति उम्मीदवार जो बिडेन (Joe Biden) ने रिपब्लिक उम्मीदवार और मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) पर बढ़त बनाई हुई है. देश में कोरोनाकाल के साए में चुनाव संपन्न हुए हैं. वहीं, इस कारण कुछ मतदाताओं ने इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अपना वोट डाला है. अमेरिका में जाति, लिंग, वर्ग जैसे विभाजक मुद्दों के साथ-साथ अब कोविड-19 (Covid-19) ने राष्ट्रपति चुनाव में अहम भूमिका निभाई है. अमेरिका जैसे सुपरपावर देश में इन विभाजक मुद्दों के आधार पर चुनावी समीकरणों को बदला जाता रहा है. ऐसे में क्या यह स्थिति देश के भविष्य में घर कर जाएगी?

बराक ओबामा ने बदला अमेरिका का स्वरूप
बता दें कि साल 2004 में डेमोक्रेटिक पार्टी के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा (Barack Obama) ने अपने राजनितिक विचारों से खूब प्रसिद्धि पाई थी और उन्होंने हमेशा से देश की एकता पर बल दिया था. बराक ओमाबा अमेरिका को उदार, रूढ़िवादी, ब्लैक, व्हाइट, लेटिन और एशिया अमेरिका से नहीं बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका के नाम से पहचान देने के पक्ष में रहे हैं. वहीं जब साल 2009 में उन्होंने देश की सत्ता संभाली तो देशवासियों में देश के लिए एक मजबूत एकता की आस बंधी. यहां तक कि अमेरिका के कई मजबूत राष्ट्रपति भी देश को एक सूत्र में पिरौने का वो काम नहीं कर सके जो ओबामा ने कर दिखाया था. बराक ओबामा ने साल 2009 से 2017 तक देश की कमान संभाली थी.

इस आधार पर विभाजित हो रहा अमेरिका
विशेषज्ञों का मानना है कि आज के समय में राजनितिक और सामाजिक तौर पर अमेरिका जिस तरह से विभाजित हो रहा है ऐसा इसके इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ. इसका सबसे बड़ा उदाहण देश की मौजूदा स्थिति हैं जहां देश दो धड़ों में बंट चुका है. जिसमें एक तरफ ट्रंप के समर्थक हैं तो दूसरा धड़ा उनके खिलाफ खड़ा है. हालांकि देश में ऐसे विभाजन की स्थिति पहली बार नहीं देखी गई है. हां, लेकिन इतने बड़े स्तर पर देश का यह असंभावित विभाजन पहली बार देखा गया है. जहां देश की विचारधारा आर्थिक, राजनीतिक, जातिय, सामाजिक, शहरी और ग्रामीण, लिंग और वर्ग और यहां तक कि कोविड-19 के आधार पर अलग-अलग नजर आ रही है.



वैचारिक रूप से दोनों पार्टियों में बड़ा अंतर
इस विभाजन के यहां कुछ उदाहरण भी हैं. बता दें कि अमेरिका में अब राजनितिक दलों का ध्रुवीकरण हो रहा है. इस राष्ट्रपति चुनाव ने देश की सामाजिक दशा को धरातल पर लाकर रख दिया है. देश में अब ब्लू और रेड स्टेट की धारणा का साफ-साफ मंजर भी सामने आ गया है. राष्ट्रपति उम्मीदवार जो बिडेन ने अपने चुनावी अभियान में राष्ट्रीय एकता पर बल देने की बात कही है. उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव को 'राष्ट्र की आत्मा के लिए लड़ाई' की संज्ञा दी है. वहीं वैचारिक रूप से रिपब्लिकन पार्टी ने देश में व्हाइट और क्रिश्चियन राष्ट्र की पुरानी अवधारणा को कायम किया है. रिपब्लिकन पार्टी की विचारधारा देश में धर्मनिरपेक्ष के साथ-साथ प्रगतिशील और विभाजीय मानकों को फॉलो करती आई है.

डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्षकार पड़े अलग
यह अभी भी स्पष्ट है कि व्हाइट अमेरिकी मतदाताओं का बहुमत ट्रंप के साथ है. वहीं, अन्य अल्पसंख्यक-जातीय जैसे हिस्पैनिक मतदाता जो बिडेन के पक्ष में हैं. साल 2017 से ट्रंप ने आज भी इस पार्टी की विभाजिय धारणा की विचारधारा को नहीं बदला है. ऐसे में देश में डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्षकारों को नजरअंदाज किया गया है और प्रवासियों ने उनके रोजगार पर ढेरा डाल लिया है और वे चाहते हैं के देश में उनके लिए कोई बोलने वाला खड़ा हो. अमेरिकी कांग्रेस में भी एक विभाजन है. इसमें भी पहले की तुलना में तेजी से वैचारिक ध्रुवीकरण हुआ है.

अब देश में सरकारी विभाजन की भी स्थिति ने जन्म ले लिया है जो तब होता है जब एक पक्ष सीनेट और दूसरे प्रतिनिधि सभा को नियंत्रित करने लगता है. इसके विपरीत एकीकृत सरकार में दोनों सदनों और राष्ट्रपति के सहयोग के रूप में एक ही पार्टी कार्यकारी और विधायिका को नियंत्रित करती है, जिसमें कानून पारित करने के लिए राष्ट्रपति की आवश्यकता होती है.

अमेरिकी राजनीति में भारतीय का प्रवेश बढ़ा
अमेरिका शहरी और ग्रामीण रूप से भी धरातल पर बंट चुका है. जहां ट्रंप के धड़े में ग्रामीण आबादी खड़ी है तो वहीं डेमोक्रेटिक पार्टी का उपनगरीय और शहरी अमेरिका पर वर्चस्व कायम है. इतना ही नहीं देश बहुमत और अल्पसंख्यक की धारणा में भी टूट चुका है. क्योंकि अब भारतीय मूल के अमेरिकी और अन्य अल्पसंख्यक समूह भी अमेरिका की राजनीति में प्रवेश कर रहे हैं. बता दें कि अमेरिकी कांग्रेस में पांच भारतीय मूल के राजनेताओं ने अपनी मजबूत पकड़ बना रखी है.
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