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श्रीलंका के राष्ट्रपति को साधकर क्या हिंद महासागर में चीन को मात दे सकेगा भारत?

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Updated: November 20, 2019, 10:30 AM IST
श्रीलंका के राष्ट्रपति को साधकर क्या हिंद महासागर में चीन को मात दे सकेगा भारत?
श्रीलंका के नए राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे (दाएं) अपने बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के साथ

भारत ने कई बार श्रीलंका पर बढ़ते चीन के कर्ज पर चिंता जाहिर की. ऐसे में बड़ा सवाल है कि श्रीलंका न चाहते हुए भी आखिर क्यों धीरे-धीरे चीन के कर्ज-जाल में फंसता जा रहा है?

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  • Last Updated: November 20, 2019, 10:30 AM IST
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(उदय सिंह राणा)

नई दिल्ली. श्रीलंका में गोटबाया राजपक्षे (Gotabaya Rajapasksa) के नए राष्ट्रपति बनने के बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) ने सबसे पहले उन्हें फोन कर जीत की बधाई दी थी. ऐसा करते हुए जिनपिंग ये बखूबी जानते थे कि गोटबाया के राष्ट्रपति बनने के बाद भी बीजिंग से दोस्ताना व्यवहार रखने वाले उनके बड़े भाई महिंदा राजपक्षे के हाथ में ही सरकार की स्टियरिंग व्हील होगी. लेकिन, चीनी राष्ट्रपति के गोटबाया राजपक्षे को कॉल करने से ऐन पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने बाज़ी मार ली. पीएम मोदी ने गोटबाया राजपक्षे को ट्विटर पर राष्ट्रपति चुनाव जीतने की बधाई दी. वहीं भारत ने चीन से एक कदम आगे बढ़ते हुए श्रीलंका से रिश्ते बेहतर करने की कवायद भी कर ली. गोटबाया राजपक्षे के पद संभालने के एक दिन बाद ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर कोलंबो दौरे पर गए.

राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी उम्मीदवार गोटबाया राजपक्षे ने सत्तारूढ़ पार्टी के उम्मीदवार सजीत प्रेमदास को बड़े अंतर से हराते हुए ये जीत हासिल की है. गृह युद्ध काल में विवादित रक्षा सचिव रहे गोटबाया अपने बड़े भाई के चीन समर्थक विचारों से भी प्रभावित हैं. जब सिरिसेना-विक्रमसिंह सरकार एशियाई देशों और चीन समर्थक झुकाव वाले देशों के साथ संतुलित रिश्ता बनाने की कोशिशों में लगी थी, तब तत्कालीन महिंदा राजपक्षे ने इस संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश भी की थी. चीन के संदर्भ में देखें, तो इस देश ने महिंदा राजपक्षे के चुनावी कैंपेन में वित्तीय मदद की है. इस लिहाज से जाहिर है कि श्रीलंका का झुकाव चीन के प्रति होगा ही. ये भारत के लिए एक चिंता का विषय है.

महिंदा राजपक्षे के चुनावी कैंपन में चीन ने की थी फंडिंग

चीन ने महिंदा राजपक्षे के वक्त हुए चुनावों में जो फंडिंग की थी, श्रीलंका वो लोन चुका नहीं पाया. ऐसे में उसे चीन को हंबनटोटा पोर्ट (Hambantota port) 99 साल की लीज़ पर देना पड़ा. दरअसल, श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने जब भी अपने सहयोगी देश चीन से लोन और महत्वाकांक्षी बंदरगाह परियोजना हंबनटोटा के लिए वित्तीय मदद मांगी, तो चीन ने कभी उसके लिए इनकार नहीं किया. इसका नतीजा यह हुआ कि महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में श्रीलंका का कर्ज बढ़ता ही चला गया.

gotabaya
गोटबया राजपक्षे


भारत को चिंता क्यों?
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भारत ने कई बार श्रीलंका पर बढ़ते चीन के कर्ज पर चिंता जाहिर की. शिव नाडर यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस एंड गवर्नेंस से जुड़े जबिन जैकब बताते हैं, 'पड़ोसी देश श्रीलंका के बढ़ते कर्ज को लेकर भारत की चिंता स्वभाविक है. इस पड़ोसी देश में आर्थिक अस्थिरता कैसी भी हो, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भारत पर इसका असर जरूर दिखेगा.'

ऐसे में बड़ा सवाल है कि श्रीलंका न चाहते हुए भी आखिर क्यों धीरे-धीरे चीन के कर्ज-जाल में फंसता जा रहा है? इसके जवाब में जैकब बताते हैं, 'श्रीलंका इसलिए ऐसा करने में मजबूर हो रहा है कि चीन उसे राजनीतिक समर्थन दे रहा है. आर्थिक रूप से चीन कुछ देशों की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए दूसरे विकल्प मुहैया करा रहा है. श्रीलंका ऐसे विकल्प पाने वालों में टॉप देशों में शुमार है.'


श्रीलंका को लेकर कई दशक पहले बन गया था चीन का प्लान

1987-90 के दौरान श्रीलंका में इंडियन पीसकीपिंग फोर्स का नेतृत्व कर चुके रिटायर्ड कर्नल आर. हरीहरन बताते हैं, 'श्रीलंका को लेकर चीन का प्लान कई दशक पहले से बन रहा था. दो दशक से चीन श्रीलंका के जरिए हिंद महासागर में भारत की भू-रणनीतिक (Geo-Strategic) कोशिशों को कमजोर करने में जुटा है. महिंदा राजपक्षे की 2014 तक के कार्यकाल के दौरान चीन ने हिंद महासागर में अपना अच्छा खासा प्रभाव बना लिया था. सोची-समझी रणनीति के तहत चीन ने धीरे-धीरे श्रीलंका की अर्थव्यवस्था में फंडिंग के जरिए अपनी पकड़ बना ली. ऐसे में नए राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे के पास कुछ अलग करने के विकल्प थोड़ हैं. उन्हें भी अपने बड़े भाई की तरह मजबूरन चीन से अच्छे रिश्ते बनाए रखने पड़ेंगे. खासकर जब कोलंबो पोर्ट सिटी प्रोजेक्ट पूरा हो चुका है और इसे कारोबार के लिए खोला गया है.'

चीन के प्रभाव के बावजूद भारत के पास श्रीलंका से अच्छे रिश्ते बनाने और इस असंतुलन को संतुलित करने के कई अवसर हैं. लेकिन, इन मौकों को बड़ी सूझ-बूझ से भुनाने की जरूरत है. भारत को श्रीलंका के सामने अपनी छवि एक अच्छे पड़ोसी के रूप में स्थापित करना होगा. भारत को श्रीलंका से किए वादे भी समय पर पूरे करने होंगे. वहीं, चीन के व्यवहार को दरकिनार रखते हुए मानव अधिकारों को लेकर श्रीलंका के लिए कदम उठाने होंगे.

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First published: November 20, 2019, 9:48 AM IST
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