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वैज्ञानिकों ने किया चमत्कार, पहली बार पूरी तरह ठीक हुई HIV पीड़ित महिला

वैज्ञानिकों ने किया चमत्कार, पहली बार पूरी तरह ठीक हुई HIV पीड़ित महिला

अबतक 3 मरीज हो चुके हैं ठीक (सांकेतिक तस्वीर- आभार @Thewired)

अबतक 3 मरीज हो चुके हैं ठीक (सांकेतिक तस्वीर- आभार @Thewired)

इस नई तकनीक में मरीज की पहले कीमोथेरेपी की जाती है ताकि कैंसर कोशिकाओं को खत्म किया जा सके. उसके बाद डॉक्टर विशेष जेनेटिक म्यूटेशन वाले व्यक्ति से स्टेमसेल लेकर उसे मरीज के शरीर में ट्रांसप्लांट करते हैं. शोधकर्ताओं का मानना है कि इस ट्रांसप्लांट के बाद मरीजों में एचआईवी के प्रति रोधक क्षमता विकसित हो जाती है

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    सालों से वैज्ञानिक लाइलाच बीमारी एचआईवी (HIV) के इलाज के तरीके को ढ़ूंढ रहे थे, मगर उन्हें कामयाबी हासिल नहीं हो पा रही थी. अब एचाआईवी ग्रसित मरीजों के लिए एक नई उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है. अमेरिका के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई तकनीक खोज निकाला है, जिससे इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आए मरीज को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है. जी हां, इस नई तकनीक से वैज्ञानिकों ने अबतक तीन एचआईवी पीड़ित मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज किया है. हाल ही में जिस मरीज का इलाज किया गया है, वो एक महिला है, जो इस तकनीक से ठीक होने वाली दुनिया की पहली महिला मरीज बन गई हैं.

    स्टेम सेल ट्रांसप्लांट से हुआ कमाल

    न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने यह कमाल स्टेम सेल ट्रांसप्लांट (Stem Cell Transplant) तकनीक के माध्यम से किया है. इसके तहत वैज्ञानिको ने महिला के गर्भनाल यानी अम्बिलिकल कॉर्ड के खून का प्रयोग किया गया. बोन मैरो ट्रांसप्लांट में जिस तरह स्टेम सेल को डोनर से अधिक मिलाने की जरूरत पड़ती है वैसे इस नई तकनीक में नहीं पड़ती है.

    वैज्ञानिकों के मुताबिक, जो एचआईवी पीड़ित हैं उनके लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट बेहतर विकल्प नहीं है. ऐसे मरीजों के लिए यह तरीका खतरनाक साबित होता है. लिहाजा, इससे उन्हीं मरीजों का इलाज किया जाता है जो कैंसर से पीड़ित हैं और साथ ही इलाज का दूसरा तरीका न बचा हो. यानि सबसे आखिर में इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है.

    पहले 2 मरीजों का हो चुका है इलाज

    पुरी दुनिया में अबतक एचआईवी के दो ही ऐसे मामले थे, जिनमें इस तकनीक से इलाज करने में कामयाबी मिली थी. टिमोथी रे ब्राउन नाम का मरीज, जो ‘द बर्निल पेशेंट’ ने नाम से पॉपुलर हुए, इस इलाज से तकरीबन 12 सालों तक जानलेवा वायरस से बचे रहे. वर्ष 2020 में उनकी मौत कैंसर से हुई. वहीं एडम कैस्टिलेजो नामक मरीज का भी इलाज 2019 में सफलतापूर्वक किया गया था. वैसे दोनों मरीजों में ही बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया था.

    नई तकनीक से बढ़ी संभावना

    महिला का इलाज करने वाली टीम में शामिल डॉक्टर कोएन वैन बेसियन का कहना है कि अम्बिलिकल कॉर्ड ब्लड के आंशिक तौर पर मिलने वाली खासियत के कारण ऐसे मरीजों के लिए सही दाता यानी डोनर तलाश करने की संभावना अधिक बढ़ जाती है. लिहाजा स्टेम सेल की इस नई तकनीक से एचआईवी के मरीजों को काफी मदद मिलेगी.

    जो महिला एड्स से ठीक हुई हैं, उसके माता-पिता श्वेत-अश्वेत थे. कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के एड्स विशेषज्ञ डॉ. स्टवीन डीक्स का कहना है कि मरीज का मिश्रित नस्ल और महिला होना, वैज्ञानिक रुप से महत्वपूर्ण फैक्टर है. उनका मानना है कि अम्बिलिकल कॉर्ड कमाल की चीज होती है. इसके सेल्स और कॉर्ड ब्लड में कुछ ऐसी जादुई चीज  होती है, जिससे ऐसे मरीजों के लिए बेहतर साबित होता है.

    ऐसे हुआ इलाज

    ठीक होने वाली महिला कई बीमारियों से पीड़ित थीं. साल 2013 में पहली बार उसे एचआईवी होने का पता चला. फिर 4 साल बाद जांच में पता चला कि वह ब्लड कैंसर की शिकार हो गई हैं. फिर महिला के ब्लड कैंसर का इलाज हैप्लो-कार्ड ट्रांसप्लांट के माध्यम से किया गया. सौभाग्य से आंशिक तौर पर मेल खाने वाले डोनर से कॉर्ड बल्ड लिया गया. इलाज के दौरान उसकी एक नजदीकी रिश्तेदार ने महिला की इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए अपना खून दान किया. साल 2017 में महिला का आखिरी ट्रांसप्लांट हुआ. मौजूदा वक्त में वह महिला ब्लड कैंसर से पूरी तरह ठीक हो चुकी हैं. साथ ही एचआईवी का इलाज भी बंद हो गया. अब वह पूरी तरह से ठीक हैं.

    Tags: Science news

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